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हमारे 'टाइम' की बात
प्रकाश पुरोहित
Updated Thu, 01 Nov 2012 10:15 PM IST
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हमारे टाइम में ऐसा नहीं होता था! कॉलेज में क्लास चल रही है, दो-चार डैडी किस्म के मुस्टंडे वहां आते, पूरी क्लास पर नजर फेरते और फिर किसी एक की तरफ इशारा कर देते, तो वह खड़ा हो जाता। ‘यह तुम्हारा सीआर है आज से’, और पूरी क्लास उसे मन से सीआर मान लेती।
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कोई झगड़ा-टंटा नहीं होता, प्रचार नहीं होता और न ही चुनाव कैंसल होते। डेमोक्रेटिक ढंग से छात्र संघ चुनाव करवाने की हिदायत का इस तरह पालन किया जाता था। ऐसे-ऐसे सीआर देखे हैं मैंने कि जिनका नाम सिवा हाजिरी रजिस्टर के कोई नहीं जानता था। बरसों-बरस इसी ढंग से शांतिपूर्वक छात्र संघ चुनाव करवाए जाते रहे।
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ऐसे भी वाकये हुए कि एमए का छात्र यदि अपने दोस्त-भाई से मिलने बीए की कक्षा में चला गया और उसी समय चुनाव संपन्न करवाने वाली गैंग आ गई और उसका चेहरा जम गया, तो उसे वहीं सीआर बना दिया गया। वह बेचारा तो खैर क्या बोलता, पूरा कॉलेज भी यही मान लेता था कि वह बीए में ही पढ़ रहा है।
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यहां कहने या कुछ करने की गुंजाइश रखी ही नहीं जाती थी! यदि गैंग गलती से दूसरी बार उस क्लास में चली जाती, तो भी अपना काम रोकती नहीं थी। या तो हो सकता है कि उसी को फिर से सीआर बना दें या वह नहीं नजर आया, तो किसी और को बना दिया। या तो पहला वाला खुद-ब-खुद अपने को सीआर मानना बंद कर देता था या अदल-बदल कर दोनों काम चला लेते थे!
राजनीतिक पार्टियां भी थीं उन दिनों कॉलेजों में, मगर वहीं हाथ मारती थीं, जहां सरकार के खर्च से कॉलेज चलते थे। सरकारी कॉलेजों में रोज सिर फूटते थे और प्राइवेट कॉलेजों के आसपास श्मशान जैसी शांति रहती थी! क्योंकि जो सीआर तय करते थे, वही अपनी गैंग में से बारी-बारी से अध्यक्ष और पदाधिकारी बना दिए जाते थे। तब वहां यह गैंग पढ़ाई के अलावा बस यही काम करती थी और बाकी बच्चे पढ़ाई के सिवा कुछ भी करते पकड़े जाते, तो आगे से पढ़ने लायक भी नहीं रह पाते। चुनाव कब हो जाते थे, पता ही नहीं चलता था।
मगर शहर को यह खबर रहती थी कि कॉलेज के चुनाव हो गए हैं। वैसे सरकारी कॉलेज न होते, तो यह अफवाह भी नहीं उड़ती। मगर बाद में सरकारी और गैरसरकारी कॉलेज का फर्क ही नहीं रहा। और अब आप देख ही रहे हैं कि चुनाव जब होंगे, तब होंगे, खबरें आने लगी हैं। हमारे टाइम में ऐसा नहीं होता था!