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साहब दुल्हनियां दिलवाएंगे
राजेंद्र शर्मा
Updated Mon, 14 Jul 2014 07:02 PM IST
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कौन कहता है कि अच्छे दिन नहीं आ रहे। कुंवारों के लिए तो इससे अच्छे दिन हो ही नहीं सकते। उनके लिए टीवी का नहीं, बीवी का ऑफर है। वह भी मामूली से वोट के दाम में। नेताजी ने कभी खून के बदले आजादी दिलाने का ऑफर किया था। अब धनखड़ साहब ने उससे भी सस्ता ऑफर पेश कर दिया है-तुम कमल पर वोट दो, हम तुम्हें दुल्हन दिलाएंगे।
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पर बेचारे कुंवारों के अच्छे दिनों के हजार दुश्मन हैं। धनखड़ साहब के ऑफर का मुकाबला करते नहीं बन रहा, तो विरोधी उनके ऑफर पर ही झगड़ा खड़ा करने पर तुल गए हैं। इनकी मानें, तो दुल्हन दिलाने का और वह भी बाहर की दुल्हन दिलाने का ऑफर ही गलत है। क्यों भाई? नेताजी राशन का वायदा करें, साइकिल का वायदा करें, लैपटॉप का वायदा करें, टीवी का वायदा करें, तो ठीक। पर धनखड़ साहब बीवी का वायदा करें, तो गलत। यह तो न्याय नहीं है।
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धनखड़ साहब का ऑफर डेमोक्रेसी को मजबूत करने वाला ऑफर है। ऐसी डेमोक्रेसी किस काम की, जिसमें कुंवारों के अच्छे दिनों का ऑफर तक नहीं हो। आखिर, यह एक वंचित तबके का मामला है। समाज के किसी तबके की आकांक्षाओं की अनदेखी कर डेमोक्रेसी मजबूत नहीं हो सकती। फिर डेमोक्रेसी का मतलब एक ही जगह कवायद करते रहना नहीं, आगे बढ़ना भी है। पब्लिक कब तक मिक्सर या साइकिल, लैपटॉप या टीवी के बीच ही चुनाव करती रहेगी। कुछ और मिले, तो डेमोक्रेसी आगे चले। कुंवारों के लिए बीवी से जरूरी कुछ नहीं हो सकती।
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इसमें हरियाणा-यूपी वगैरह में लड़कियों की कमी जैसे बाहरी मुद्दे घुसाने की कोशिश कोई नहीं करे। इज्जत के लिए लड़कियों को घटाने का मतलब यह तो नहीं कि इन इलाकों के लोगों का घर बसाने का अधिकार किसी से कम हो जाता है। लड़कियां कम हैं, इसीलिए तो बाहर से आपूर्ति की जरूरत है। मांग की ओर आपूर्ति का प्रवाहित होना ही प्रकृति का नियम है। धनखड़ साहब ने सिर्फ वोट के दाम में दुल्हन दिलाने का ही तो वायदा किया है। दिलवाएंगे, धनखड़ साहब दुल्हनिया दिलवाएंगे!