विज्ञापन

ग्राम प्रधान बदल सकते हैं तस्वीर

Subhash Chandra Kushwahaसुभाष चंद्र कुशवाहा Updated Sat, 23 May 2020 09:17 AM IST
विज्ञापन
खेत में काम करता एक किसान
खेत में काम करता एक किसान - फोटो : PTI
ख़बर सुनें
लॉकडाउन के साथ शहरों से गांव की ओर मजदूरों के पलायन की कथा-व्यथा हम देख रहे हैं। वे मुश्किलों में भीड़-भाड़ के साथ गांवों में आए हैं। एक-दूसरे के साथ, एक साथ साठ-सत्तर की संख्या में आए हैं। बिना किसी सोशल डिस्टेंसिंग के वे हफ्तों यात्रा में साथ रहे हैं। पूर्वांचल के एक-एक गांव में चालीस से लेकर दो सौ तक मजदूर लौटे हैं। लौटे हुए 95 प्रतिशत मजदूर अपने घरों में ही रह रहे हैं।
विज्ञापन

उनके घरों के दरवाजों पर क्वारंटीन का लाल रंग का एक पोस्टर चिपका दिया जा रहा है, जिससे पता चले कि अमुक घर में मजदूर आए हैं। उन्हें परिवार से अलग रहने और गांव में न घूमने की हिदायत दी गई है। हर गांव में एक सुरक्षा निगरानी समिति बनी हुई है, जिसमें आशा एवं आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, ए.एन.एम., लेखपाल, कोटेदार और प्रधानाध्यापक को शामिल किया गया है।
ग्राम प्रधान इस समिति का सचिव है। देखा जाए, तो ग्रामप्रधान ही गांव में मौजूद है और उसी के जिम्मे प्रवासी मजदूरों की निगरानी है। इन मजदूरों का तीन-तीन दिन पर बुखार नापा जाना है और देखना है कि उनमें खांसी या जुकाम के लक्षण तो नहीं दिख रहे। ऐसे लक्षण दिखते ही जिला मुख्यालय को सूचित करना है।
यह व्यवस्था पूरी तरह प्रभावी हो, तो निश्चय ही करोना संक्रमण को रोका जा सकता है, मगर यह होगा कैसे? गांव का प्रशासन सिर्फ ग्राम प्रधान के जिम्मे है। ग्राम प्रधानों का जो वर्ग चरित्र आज बन चुका है, वह कतई समाज सेवा की भावना का नहीं है। यही कारण है कि निगरानी समितियों के बावजूद गांवों में तेजी से संक्रमण बढ़ता दिखाई देने लगा है।

गांवों में दो तरह का स्वरूप दिखाई दे रहा है। एक तो निम्न जाति के मजदूर तो घरों में या स्कूलों में रहने को राजी हो जाते हैं, मगर कहीं-कहीं दबंग और सवर्ण जाति के मजदूरों पर दबाव काम नहीं कर रहा। दूसरा, ग्राम प्रधान गांवों में सख्ती करने की मानसिकता में नहीं हैं। ग्राम प्रधानों का चरित्र इतना प्रभावी नहीं रहा कि लोग उनकी बातें मानें।

स्कूलों में बनाए गए क्वारंटीन केंद्रों पर पांच प्रतिशत से ज्यादा मजदूर नहीं रह रहे हैं। वह भी केवल दिन में। रात में वे अपने घरों में देखे जा सकते हैं। अपने घरों में रह रहे मजदूरों का हर तीन दिन में एक बार बुखार नापने का काम होना चाहिए। यह काम गांवों में आशा वर्कस द्वारा होना है, मगर इसमें भी ग्राम प्रधान कितना रुचि लेते हैं, बात तभी बनेगी।

गांवों को सैनिटाइज कराने का काम भी किया जाना है और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन भी, मगर कई कारणों से ऐसा हो पाना असंभव है। कुछ गांव बेहद तंग गलियों वाले हैं। अगर एक छोटे से घर में दस से पंद्रह मजदूर आ चुके हों, तो वे कहां रहेंगे और सोशल डिस्टेंसिंग का क्या होगा? गर्मी के मौसम में मजदूरों को अलग रखने की समुचित व्यवस्था ग्राम प्रधानों की विशेष रुचि से ही संभव है।

ग्राम प्रधानी का चुनाव करीब है। ऐसे में गांव आए मजदूरों को ग्राम प्रधान नाराज नहीं करना चाहते। ऐसे में गांवों का प्रशासन बिना बाहरी हस्तक्षेप के सुदृढ़ नहीं हो सकता। कुछ ही प्रधान ऐसे हैं, जो अपने स्तर से मास्क उपलब्ध कराने में रुचि ले रहे, ज्यादातर सरकारी सहायता न मिलने का रोना रो रहे हैं। 

त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था ने गंवई आदर्श, सरलता, सामाजिकता, संवेदना को नष्ट कर एक ठस, असभ्य, हिंसक और स्वार्थी समाज की स्थापना की है। इसने कुछ ऐसी स्थापनाएं दी हैं, जिनसे मुक्त होना आसान नहीं। पहला तो यही कि पंचायती राज व्यवस्था के बारे में आम ग्रामवासी की धारणा बन चुकी है कि यह प्रधान द्वारा सरकारी धन की लूट के लिए बनी, नियंत्रण मुक्त संस्था है।

ऐसे में ग्राम प्रधानों से कोरोना काल में सामाजिक सेवा में बढ़-चढ़कर भाग लेने की अपेक्षा संभव नहीं। गांवों का जिला मुख्यालय से दूर होना और वहां प्रशासन की निरंतर पहुंच न होना, समस्या को बढ़ाएगा। कोरोना के डर से सेक्रेटरी और लेखपाल भी प्रधानों पर निर्भर हो गए हैं। अब जब एक महामारी गांवों को अपने गिरफ्त में लेती जा रही है, तब ग्रामीण प्रशासन की संरचना की समीक्षा जरूरी हो गई है। तभी हम गांवों को कोरोना जैसी आपदाओं से बचा पाएंगे।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Spotlight

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Election
  • Downloads

Follow Us