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आखिर किसके हाथों खेल गए वैदिक
शशांक
Updated Thu, 17 Jul 2014 07:53 PM IST
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हाफिज सईद से पत्रकार वेद प्रताप वैदिक की मुलाकात का प्रसंग ऐसे समय में छिड़ा है, जब नई सरकारें फूंक-फूंककर पड़ोसियों से रिश्ते सहज बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही थीं। इन दोनों की बातचीत किसी मुकाम तक पहुंचने का पड़ाव नहीं है। बल्कि इस मुलाकात से उन प्रयासों पर पानी फिरता दिख रहा है, जिनमें पड़ोसी देश के नेताओं को दिल्ली बुलाकर हम प्रसन्नता महसूस कर रहे थे।
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वैदिक बेशक केंद्र सरकार की ओर से इस मुलाकात के लिए न भेजे गए हों, पर पाकिस्तान को राय बनाने से कौन रोक सकता है! यह बातचीत भारत के लिए दिक्कत पैदा कर गई। वह बहुत कमजोर सूचनाओं के साथ पाकिस्तान गए। वह अक्सर पाकिस्तान-अफगानिस्तान जाते रहे हैं। कहा जाता है कि पाकिस्तान में उनके लेख अनुवाद करके प्रकाशित होते रहे हैं। इसी कारण उन्हें यह भरोसा हो गया कि वह स्थितियों को बदल सकते हैं। पर उनका दांव उल्टा पड़ गया। यह नहीं कह सकते कि वह आईएसआई के हाथ खेल गए या अपने पाकिस्तानी मित्रों के, पर कोई न कोई संदेश तो उनके पास आया होगा।
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इस मुलाकात पर सवाल उठने स्वाभाविक थे। कांग्रेस इस मुलाकात के पीछे सरकार की मंशा देख रही है। जबकि भाजपा भी मुलाकाती को फटकार लगा रही है। भारतीय दूतावास पर भी सवाल उठ रहे हैं। ज्यादा गंभीर बात यह है कि वैदिक की भाव-भंगिमा में पत्रकार के बजाय एक राजनयिक का अंदाज क्यों होना चाहिए था। यह नहीं हो सकता कि आप किसी ऐसे व्यक्ति से मिलें, जिसे दुनिया ने आतंकी घोषित किया हो, और आपकी बातचीत राह खोलने वाली दिख रही हो। यह काम दूसरों का है। इसके लिए सरकारें हैं, सेना है। अगर कभी किसी की मदद ली भी जाती है, तो उसकी एक प्रक्रिया होती है। मानना मुश्किल है कि आतंक के खिलाफ कड़े कदम उठाने की बात करती एनडीए सरकार समाधान के लिए ऐसा रास्ता चुनेगी।
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हमारी सरकार के लिए स्वाभाविक था कि वह किसी ऐसी बातचीत में अपनी भूमिका नकारती। उच्चायोग से रिपोर्ट मांगकर इसकी तह में जाने की कोशिश भी की गई है। इस तरह के मसले सनसनीखेज पत्रकारिता के लिए नहीं हैं। इस मुलाकात को खुफिया विभाग की विफलता भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इंटेलीजेंस यह नहीं कहता कि क्या कीजिए और क्या नहीं। वह केवल यह बताता है कि आपने क्या किया। भारतीय पत्रकार को अपनी उत्सुकता दबाते हुए यह सोचना ही चाहिए था कि आखिर मुलाकात क्यों करनी चाहिए। यह भी देखा जाना चाहिए था कि पाकिस्तान ने हाफिज सईद को लेकर क्या रवैया अपनाया है और भारतीय जनमानस उन्हें किस तरह देखता है। इसका मंथन करते हुए अगर कोई हाफिज सईद के साथ वार्ता की मेज पर होता, तो उसका होमवर्क भी अलग होता। चूंकि वह नहीं था, इसलिए उस पत्रकार का पाकिस्तान अपने हित में उपयोग करने लगा है। उसके हवाले से कहलवाया जा रहा है कि एक भारतीय ने पाकिस्तान आकर कश्मीर की आजादी का समर्थन किया है। क्या वैदिक अब पूरी ऊर्जा इसका खंडन करने में लगाएंगे?
लेखक पूर्व विदेश सचिव हैं