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समान नागरिक संहिता: प्रगतिशील समाज के लिए जरूरी पहल, इसमें निहित हैं व्यापक हित

Wed, 07 Feb 2024 07:21 AM IST
Harbansh Dixit हरबंश दीक्षित
Updated Wed, 07 Feb 2024 07:21 AM IST
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सार
समाज के व्यापक हितों के मद्देनजर समाज के पंथनिरपेक्ष हित चिंतकों को आगे बढ़कर समान नागरिक संहिता की दिशा में पहल करने की जरूरत है, ताकि हम एक प्रगतिशील समाज बन सकें।
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Uttarakhand UCC bill necessary initiative for progressive society, Uniform Civil Code in interests of country
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

उत्तराखंड सरकार ने विधानसभा में समान नागरिक संहिता विधेयक पेश किया है। जानकारी के अनुसार, इसमें सभी नागरिकों के कल्याण के लिए एक जैसे कानून का प्रस्ताव है। हलाला तथा तीन तलाक जैसी अमानवीय प्रथाओं को प्रतिबंधित कर दिया गया है। सभी धर्मों की तलाकशुदा महिलाओं के लिए समान रूप से भरण-पोषण की व्यवस्था की गई है। सभी लड़कियों के विवाह की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष कर दी गई है। लिव-इन संबंधों के कारण अक्सर विवाद और हिंसा की खबरें आती रहती हैं। इससे निपटने के लिए उनका पंजीकरण अनिवार्य कर दिया गया है। बहुपत्नी प्रथा को समाप्त करके सभी के लिए केवल एक विवाह का नियम प्रस्तावित है।



संविधान के अनुच्छेद 44 में समान नागरिक संहिता की स्पष्ट व्यवस्था के बावजूद सरकारें इस दिशा में आगे कदम बढ़ाने से हिचकती रहीं। संविधान का अनुच्छेद 44 सबसे अधिक दुष्प्रचारित हिस्सों में से एक है। इस उपबंध के साथ बहुत अन्याय हुआ है। इसमें देश के सभी नागरिकों के लिए एक जैसा कानून बनाने की बात कही गई है। इसमें सरकार से अपेक्षा की गई है कि वह लिंग, क्षेत्र, भाषा की परवाह किए बगैर सभी के लिए एक जैसा कानून बनाए, जो मानवीय गरिमा का सम्मान करे, उसे सुरक्षा बोध दे और सभ्य समाज के मानकों पर खरा भी उतरे।


दुर्भाग्यवश अनुच्छेद 44 की इस पवित्र मंशा को आगे बढ़ाने, उस पर तार्किक बहस करने के बजाय उसे सांप्रदायिक रूप देकर अछूत बना दिया गया। सुप्रीम कोर्ट का आग्रह बेकार गया। यह दस्तूर आज भी कायम है।

संविधान निर्माताओं ने महसूस किया कि विवाह और भरण-पोषण से जुड़े मामलों का संबंध किसी पूजा-पद्धति से नहीं है, बल्कि इसका संबंध इंसानियत से है। निःसंतान व्यक्ति यदि किसी बच्चे को गोद लेकर अपनी वंश-परंपरा को आगे बढ़ाना चाहता है या उससे उसको सुरक्षा बोध का एहसास होता है, तो उससे किसी पूजा-पद्धति की अवमानना कैसे हो सकती है? यदि किसी कानून से किसी महिला को सामाजिक सुरक्षा मिलती है या पति से अलग होने या पति के नाराज होने के बाद उसे दर-बदर भटकने के बजाय गुजारे-भत्ते की व्यवस्था की जाती है, तो इसमें उसका धर्म कहां से आड़े आता है? महिला-पुरुष के वैवाहिक संबंधों में यदि समानता सुनिश्चित की जाती है, तो इससे किसी भी सभ्य समाज को शर्मिंदगी नहीं, अपितु गर्व होना चाहिए।

आजादी के बाद हिंदू विधि में व्यापक परिवर्तन किए गए। हिंदू विवाह अधिनियम द्वारा बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाया गया। पति-पत्नी को विवाह-विच्छेद करके सम्मानपूर्वक एक-दूसरे से अलग रहने का अधिकार दिया गया। महिलाओं को भरण-पोषण का अधिकार दिया गया। पिता की संपत्ति में बेटियों को भी अधिकार देने की परंपरा शुरू हुई। संतान को गोद लेने के मामलों में भी पति के एकाधिकार को तोड़ते हुए महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने की कोशिश की गई। हिंदू कानून में किए गए सुधारों में मानवाधिकारों और समानता के सिद्धांतों की तरजीह दी गई। पर वोट बैंक खिसकने की स्वार्थी सोच के कारण दूसरी जगहों पर ऐसा नहीं हो सका और उन्हें बेहतरी के मौके से लगातार वंचित रखा गया।

आधुनिक सोच का लाभ दूसरे मतावलंबियों को भी हासिल हो, इसके लिए अदालतें लगातार कोशिश करती रही हैं। मोहम्मद अहमद खान बनाम शाहबानो मामले (1985) में सुप्रीम कोर्ट ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यह खेद का विषय है कि अनुच्छेद 44 में तय राज्य की जिम्मेदारी अब निर्जीव शब्द समूहों का संग्रह बनकर रह गई है। अदालत ने कहा कि मुस्लिम समाज को इस मामले में पहल करने की जरूरत है, ताकि प्रगति की दौड़ में वे दूसरों से पीछे न रहें। हैरानी की बात यह है कि शाहबानो के जिस मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट ने लोगों से आगे बढ़ने की पहल का आह्वान किया, उसके दुष्प्रचार ने समान नागरिक कानून की पहल को सबसे मर्मांतक चोट पहुंचाई। उसके बाद सरला मुद्गल तथा लिली थॉमस जैसे कई प्रकरणों में सर्वोच्च न्यायालय ने समान नागरिक कानून के नहीं होने के दोषों को उजागर करते हुए इसका तुरंत क्रियान्वयन करने का निर्देश दिया।

वैवाहिक मामलों में वैयक्तिक विधि के दुरुपयोग से विचलित होकर अदालत ने कहा कि अब तो इसका दुरुपयोग कानून को धोखा देने के लिए होने लगा है। जब वैवाहिक साथी से छुटकारा पाना हो, तो कुछ समय के लिए अपना धर्म बदलकर दूसरी शादी कर ली, क्योंकि दूसरे धर्म से जुड़े कानून में उसे मान्यता दी गई है। उसके बाद अपनी मर्जी से तलाक देकर उस महिला से छुटकारा पा लिया, क्योंकि उस धर्म का कानून इसकी इजाजत देता है। सुप्रीम कोर्ट और कई विद्वानों ने इसी कमी की ओर बार-बार इशारा किया, पर हमारे राजनीतिक नेतृत्व के ऊपर इसका कोई असर नहीं पड़ा। प्रो ताहिर महमूद ने अपनी पुस्तक मुस्लिम पर्सनल लॉ (1977) में तथा न्यायमूर्ति एमएच बेग ने इम्पैक्ट ऑफ सेक्यूलरिज्म (1973) में भी संविधान के अनुच्छेद 44 को अमली जामा पहनाने का आह्वान किया, किंतु शाहबानो प्रकरण के दुःस्वप्न से अब भी कोई उबरने को तैयार नहीं है।

समाज के व्यापक हितों के मद्देनजर समाज के पंथनिरपेक्ष हित चिंतकों को आगे बढ़कर इस दिशा में पहल करने की जरूरत है, ताकि हम एक प्रगतिशील समाज के रूप में एकजुट हो सकें।

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