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टाइम मशीन: जापानी थाली में अमेरिकी चावल, ट्रंप के 'टैरिफ चक्रव्यूह' ने तोड़ दिया एक संकल्प
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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप
- फोटो :
एएनआई (फाइल)
विस्तार
जापान के लोग हैरत में हैं! ट्रंप ने वह कर दिखाया है, जो रिचर्ड निक्सन और रोनाल्ड रीगन तक नहीं कर सके। ट्रंप ने जापानी ऑटोमोबाइल के लिए बाजार खोलने या भारी टैरिफ के बदले जापान से उसकी सबसे कीमती चीज ले ली। आखिर वह चीज क्या है? विदेशी चावल न खाने का संकल्प। कितने आए और चले गए, मगर जापानी थाली में विदेशी चावल कभी नहीं पहुंचा। जापानी कहते रहे हैं-सुशी का निवाला तो कोशिहिकारी से ही बनेगा। अकीताकोमाची खा लेंगे, हितोमेम्बोर में भी स्वाद है, हिनोहिकारी तो ठंडा भी चल जाएगा, पर अमेरिकी लांग ग्रेन राइस कभी नहीं!!!
ट्रंप की धमकी के आगे टूट गया यह संकल्प। अब जापान विश्व व्यापार संगठन वाले कोटे के तहत अमेरिकी चावल का ड्यूटी फ्री आयात करेगा। ट्रंप ने इसी पर मजबूर किया है प्रधानमंत्री शिगेरु इशिबा को। जापान की राजनीति के लिए विदेशी चावल को चबा-पचा पाना आसान नहीं होगा। उनकी सियासत वैसे ही डांवाडोल है। अतीत में विदेशी चावल रोकने के लिए जापान को अपने यहां उत्पादन घटाना पड़ा, महंगाई बढ़ानी पड़ी, मगर विदेशी भात नहीं खाया गया। टाइम मशीन का इंजन गुर्रा रहा है। आइए, विराजिए अपनी सीट पर। हम आपको ले चलते हैं उस दौर में, जब जापान ने अमेरिकी चावल को रोका था। क्या पता, ट्रंप उसी का बदला ले रहे हों! टाइम मशीन के फ्लाइट पाथ पर 1980 का साल सेट हो गया है। हम टोक्यो के करीब पहुंच रहे हैं। आपके नीचे चावल के खेत हैं। मंदिर में कोमे यानी चावल की बालियां चढ़ाने के बाद लोग गा रहे हैं- कोमे हमारा ‘गोहान’ है-हमारा भोजन, हमारी आत्मा। एक कविता गूंजती है : चावल के खेत हवा में नाचते हैं, आत्मा को जोड़ते हैं। यह 1980 की शुरुआत है। जापान की अर्थव्यवस्था दुनिया को चुनौती दे रही है। टोयोटा, सोनी, और तोशिबा अमेरिकी बाजारों पर छाए हुए हैं। अमेरिका का व्यापार घाटा बढ़ रहा है। राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन जापान पर चावल बाजार खोलने का दबाव डाल रहे हैं। जापान के प्रधानमंत्री नोबरु ताकेशिता ने मना कर दिया है। रीगन ने जापान के इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर पर टैरिफ लगा दिए हैं। आप ट्रंप युग से आ रहे हैं। इस माहौल का ‘देजा वू’ महसूस करिए। शाम का झुटपुटा है। टाइम मशीन टोक्यो में जापान के कृषि, वन और मत्स्य मंत्रालय (एमएएफएफ) की छत पर उतर रही है। कोई आवाज नहीं होनी चाहिए। उस हॉल की खिड़की पर कान और आंख लगाइए। सूट-बूट वाले नौकरशाह चिंतित कागजों से उलझे हैं। बैठक शुरू हो चुकी है। एमएएफएफ के मंत्री टोमियो यामामातो गरज रहे हैं, ‘चावल हमारा गर्व है! शिंटो मंदिरों में इसे देवताओं को चढ़ाया जाता है। सम्राट हर साल ‘नीनामेसाई’ अनुष्ठान में चावल अर्पित करते हैं। अमेरिकी चावल इसे अपवित्र कर देगा!’
कृषि मंत्री यामामोतो एक दस्तावेज दिखा रहे हैं, जिसमें गेंतान का जिक्र है। यह 1970 के दशक में शुरू हुआ, ताकि जापानी कृषि को चावल की जगह अन्य फसलों के लिए प्रेरित किया जा सके। यह सफल नहीं हुआ। 1980 के दशक में जब रीगन जापान के चावाल बाजार का दरवाजा पीट रहे थे, तो वहां चावल का उत्पादन जरूरत से ज्यादा था। गौर से सुनिए, मंत्री यामामातो अधिकारियों को बता रहे हैं कि हम उत्पादन घटाएंगे। अमेरिका को यह दिखाया जाएगा कि हमारे यहां चावल महंगा है और अगर उनका चावल आया, तो उस पर 778 फीसदी टैरिफ लगेगा।
हम वाशिगटन जा रहे हैं। 1995 का साल है। जापान और अमेरिका के बीच लंबी वार्ताएं चली हैं। जापान ने उत्पादन घटाकर अपने बाजार में चावल की महंगाई और कमी पैदा कर दी है। वाशिंटन में कृषि मंत्रालय में बैठक चल रही है, जिसमें अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि क्लेटन यूटर झुंझलाकर बता रहे हैं, जापान सरकार किसानों को चावल न उगाने के लिए सब्सिडी देती है। वे गेहूं, सोयाबीन, या चारा फसलें उगाते हैं, या खेत खाली छोड़ते हैं। किसानों को नुकसान दिखाते हुए जापान ने आयात की संभावना को खत्म कर दिया। 1994 में, जीएटीटी वार्ताओं (बाद में डब्ल्यूटीओ) के तहत, माइकल कांटोर की अगुवाई में जापान ने 7,00,000 टन विदेशी चावल का कोटा स्वीकार किया गया, और वह भी बांग्लादेश और श्रीलंका में सहायता के रूप में भेज दिया गया। यूटर गुस्से में कहते हैं, ‘यह धोखा है! हमारा चावल एशिया में डंप हो रहा है!’ वह बता रहे हैं कि जापानी अखबार विदेशी चावल को कीटनाशकों से भरा और कोशिहिकारी से कमतर बताते हैं। किसान चावल के खेतों के चारों ओर विरोध कर रहे हैं। जापान की थाली में अमेरिकी चावल पहुंच नहीं पाया है। अब हम वर्ष 2019 में व्हाइट हाउस के सामने हैं। यह डोनाल्ड ट्रंप का पहला कार्यकाल है। ट्रंप ने जापान के साथ व्यापार घाटे को खत्म करने के लिए ऑटो टैरिफ की धमकी दी है। अमेरिकी निर्यात बाजार गंवाने के डर से शिंजो आबे एक ‘मिनी डील’ पर सहमत हो गए हैं, जिसमें 70,000 टन अमेरिकी चावल का कोटा शामिल है। दस्तखत करते हुए आबे के फोन पर टोक्यो से किसान आंदोलन की सूचनाएं आ रही हैं।
शिंजो आबे के पास एक प्लान है। ज्यादातर आयातित चावल खाद्य प्रसंस्करण में जाता है। आबे की पार्टी एलडीपी के ग्रामीण वोट सुरक्षित रहते हैं। अब टाइम मशीन 2025 में लौट आई है। ट्रंप ने जापान के साथ एक मेगा ट्रेड डील घोषित कर दी है। इस बार ट्रंप पहले से बड़ी जीत के साथ उभरे हैं। जापान ने अमेरिकी चावल, कारों, और अन्य कृषि उत्पादों के लिए बाजार खोल दिया है। जापानी निर्यात पर 25 फीसदी के बजाय 15 फीसदी टैरिफ लगेगा, और ऑटो टैरिफ भी 15 फीसदी पर सेट हुआ। जापान ने 550 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता भी जताई। जापान के मुख्य व्यापार वार्ताकार रयोसेई अकीजावा आठ बार वाशिंगटन गए थे, मगर ट्रंप चावल का बाजार लेकर ही माने। यह साल जापान में चावल की महंगाई का है। कीमतें करीब 101 फीसदी बढ़ी हैं। गर्मी के कारण फसल मारी गई है। प्रधानमंत्री इशिबा को लगता है कि सस्ते अमेरिकी चावल से कीमतें घटेंगी, तो विदेशी चावल का उतना विरोध नहीं होगा। थोड़े से चावल के बदले अगर जापान को अमेरिकी ऑटो बाजार में बढ़त मिलती है, तो इसमें बुरा क्या है! तो क्या इस बार भी जापान इस चावल को कहीं दूसरी जगह भेज देगा?
जापानी असमंजस में हैं। चावल उनका दिल है। उन्हें लगता है कि 1980 की चाल अब काम नहीं करेगी। कोशिहिकारी कोमे तो राजा है, लेकिन इस बार अमेरिकी लांग ग्रेन चावल थाली में आ ही जाएगा। टाइम मशीन अब टोक्यो में अपनी यात्रा खत्म करती है। फिर मिलेंगे अगले सफर पर...