उत्तर प्रदेश बहुत कुछ तय करेगा
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वर्ष 2017 में नरेंद्र मोदी के सामने दो प्रमुख चुनौतियां हैं-उत्तर प्रदेश जीतना और अर्थव्यवस्था को फिर से गति देना, जिसकी रफ्तार नोटबंदी को ठीक से नहीं संभालने के कारण सुस्त पड़ गई है। उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत स्वाभाविक रूप से प्रधानमंत्री के लिए ईंधन का काम करेगी, ताकि वह 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए मूड बना सकें। हालांकि प्रधानमंत्री इतने मजबूत हैं कि अपने मन-मुताबिक कदम उठाने में सक्षम हैं। अर्थव्यवस्था के लिहाज से भी उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत राजनीतिक स्थिरता का संकेत देगी, जिससे प्रधानमंत्री का हाथ मजबूत होगा और निवेशकों में भी भरोसा जगेगा, हालांकि प्रधानमंत्री निवेशकों का भरोसा जीतने के लिए अन्य कदम भी उठाएंगे। यही वजह है कि इस वर्ष बजट का बेसब्री से इंतजार किया जा रहा है। उद्योग जगत को उम्मीद है कि मोदी आयकर और कॉरपोरेट कर में कटौती की घोषणा करेंगे, ताकि समर्थन जुटा सकें।
विमुद्रीकरण को जिस तरह बिना तैयारी और योजना के लागू किया गया, उससे खासकर किसानों, दिहाड़ी मजदूरों, लघु एवं मध्यम दर्जे के उद्योग, व्यवसायियों और महिलाओं पर बहुत बुरा असर पड़ा, जिसे खुद प्रधानमंत्री ने नए वर्ष की पूर्वसंध्या पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में स्वीकार किया। ये वही समूह हैं, जिनकी मुश्किलें खत्म करने के लिए प्रधानमंत्री रियायत देने कोशिश कर रहे हैं। इस वर्ष जिन पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं, उनके नतीजे बताएंगे कि नोटबंदी ने मोदी और भाजपा की लोकप्रियता पर कितना असर डाला है।
राजनीतिक स्तर पर मोदी ने विमुद्रीकरण को अमीरों पर नकेल कसने वाला और गरीबों की मदद करने वाला कदम बताया,ताकि उनकी रॉबिनहुड वाली छवि मजबूत हो सके। उनकी यह कवायद इंदिरा गांधी के गरीबी हटाओ कार्यक्रम के बराबर था, जिसने उन्हें जननेता बना दिया और सीधे जनता तक पहुंचने में सक्षम बनाया। मोदी भी भाजपा के पारंपरिक जनाधार से आगे जाने की कोशिश कर रहे हैं। वह व्यवसायियों (जिन्हें उन्होंने नोटबंदी से नाराज किया), ऊंची जातियों और शहरी मध्यवर्ग वाली पार्टी के जनाधार को विस्तृत कर गरीबों और वंचित समूहों तक, जिसमें दलित और अत्यंत पिछड़ी जातियां भी शामिल हैं, पहुंचना चाहते हैं। आने वाले वर्ष में वह 2019 की तैयारी के दौरान इन समूहों को रियायत देकर उनका समर्थन हासिल कर सकते हैं। हालांकि अर्थशास्त्री पूछेंगे कि इसके लिए पैसा आएगा कहां से? ऐसे में उन्हें जहां तनी हुई रस्सी पर चलना होगा, वहीं अपने उस जादुई कौशल का प्रदर्शन करना होगा, जिसके तहत वह मार्केटिंग, भावनात्मक अपील और पीआर का इस्तेमाल करते हैं।
उत्तर प्रदेश का चुनाव मोदी के लिए किसी और की तुलना में ज्यादा महत्वपूर्ण है। उत्तर प्रदेश का नतीजा ही तय करेगा कि राष्ट्रपति भवन में अगले पांच वर्षों के लिए कौन बैठेगा। उत्तर प्रदेश में भाजपा की विफलता का मतलब होगा, भाजपा की कीमत पर क्षेत्रीय ताकतों का उदय, जिससे भाजपा एवं मोदी की लोकप्रियता में गिरावट आने लगेगी। फिर पार्टी के भीतर और संघ में विरोध के स्वर उठ सकते हैं। इससे भाजपा और संघ परिवार में फिर से यह चर्चा शुरू हो सकती है कि भले 2014 एक अपवाद हो, पर भाजपा केवल हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण से ही जीत सकती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि विमुद्रीकरण का दर्द उत्तर प्रदेश के चुनाव में किस तरह से छलककर सामने आता है।
यह समझ से बाहर है कि मुलायम सिंह यादव जैसे अनुभवी नेता ने कैसे अपनी पार्टी को टूटने दिया, खासकर तब, जब पार्टी के विधायक, मंत्री और पार्टी की जमीनी स्तर की संरचना पूरी तरह से उनके बेटे और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पक्ष में खड़ी थी। मुलायम को अखिलेश को समाजवादी पार्टी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश करना चाहिए था और उन्हें उम्मीदवारों के चयन का अधिकार देकर पार्टी में स्पष्ट संदेश देना चाहिए था कि अगर सपा भविष्य में सत्ता में आती है, तो पार्टी और सरकार को स्वरूप देने के लिए उनके पास स्वतंत्र शक्तियां होंगी। यही वजह है कि कई लोग अखिलेश भैया को दूसरा मौका देना चाहते हैं, ताकि वह विकास के एजेंडे को पूरा कर सपा में सुधार जारी रख सकें। इससे पार्टी को अपने पारंपरिक वोट बैंक-मुस्लिम और यादवों से बाहर, खासकर युवाओं और महिलाओं का वोट मिल सकता है। मुलायम सिंह शिवपाल यादव को फिलहाल प्रतीक्षा करने के लिए राजी कर सकते थे। जिस तरह मुलायम सिंह ने बार-बार अपना पैंतरा बदला, उससे इसकी पुष्टि नहीं होती कि अपने बेटे को उत्तराधिकार की लड़ाई जीतने में मदद करने के लिए उन्होंने ऐसा किया। यदि समय की कमी और पार्टी के दोनों समूहों की तरफ से दावे-प्रति दावे के कारण सपा का चुनाव चिह्न साइकिल जब्त कर लिया जाता है, जैसा कि हो सकता है, तो मुलायम और अखिलेश, दोनों को परेशानी हो सकती है। आज बड़े पैमाने पर अखिलेश को लोगों की सद्भावना हासिल है। पर पार्टी में दरार के कारण अगर सपा टूट जाती है, तो उत्तर प्रदेश में मुख्य मुकाबला भाजपा और बसपा के बीच हो सकता है, जिसमें भाजपा को फायदा हो सकता है।
जब तक अखिलेश को कोई दूसरा चुनाव चिह्न नहीं मिल जाता, तब तक उनके उम्मीदवारों को निर्दलीय के रूप चुनाव लड़ना पड़ सकता है। ऐसे में, क्या जनता परिवार (सपा, रालोद, जनता दल यूनाइटेड) का सपना उत्तर प्रदेश में अखिलेश के नेतृत्व में साकार हो सकता है, जो कांग्रेस से भी तालमेल कर सकता है और इन दलों में से किसी एक के मौजूदा चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ सकता है? ऐसा हो सकता है, पर चुनाव में बहुत दिन शेष नहीं रह गए हैं।
इस समय तो प्रदेश में सत्तारूढ़ सपा में जारी भूकंपीय झटके ने नरेंद्र मोदी को मुस्कराने का मौका दे दिया है। निश्चित रूप से उत्तर प्रदेश का चुनाव और केंद्रीय बजट इस नए वर्ष में दो महत्वपूर्ण क्षण होंगे।