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विश्लेषण: बयानबाजी, अफवाहें और भय का सूचकांक, सूचनाओं की अधिकता से फोकस में हो रही कमी

Tue, 14 May 2024 05:31 AM IST
Shankar Ayair शंकर अय्यर
Updated Tue, 14 May 2024 05:31 AM IST
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सार
नोबेलजयी हर्बर्ट साइमन ने एक बार कहा था कि सूचनाओं की अधिकता फोकस की कमी पैदा करती है। साइमन द्वारा प्रतिपादित इस सिद्धांत (अधूरी जानकारी का प्रभाव और परिणामों पर प्रभाव) की उत्पत्ति सार्वजनिक नीति निर्माण से हुई थी और यह नियम चुनाव प्रचार पर भी लागू होता है।
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Uncertainty in stock market regarding pre-calculations of Lok Sabha election 2024 results
मतदान। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

लोकसभा चुनाव के मद्देनजर अटकलों का बाजार गर्म है। बयानबाजी और अफवाहों की बाढ़ से विशेषज्ञ भी संदेह और घबराहट में हैं। पिछले बृहस्पतिवार को बेंचमार्क सेंसेक्स 1,000 अंकों से ज्यादा गिर गया और शेयर बाजार के भय का सूचकांक (भारत वीआईएक्स अस्थिरता सूचकांक) अप्रैल के बाद बढ़ गया और इस हफ्ते 19 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। सोमवार को गृहमंत्री अमित शाह ने निवेशकों को आश्वस्त करते हुए कहा कि 'चार जून के बाद बाजार में तेजी आने वाली है।'



यह घबराहट अपरिहार्य है। आंकड़ों पर निर्भर नागरिक, कॉरपोरेट दिग्गज और निवेश बैंकर अफवाहों और विरोधी टिप्पणियों पर बारीक नजर रखने के लिए स्पीड-डायलिंग और गूगल कर रहे हैं। लोकसभा सीटों की कई गणनाओं को लेकर बाजार चिंतित है। मुख्य रूप से ध्यान कर्नाटक, महाराष्ट्र और बिहार पर है, जहां 116 सीटों में से अकेले भाजपा ने पिछली बार 65 सीटें जीती थीं। क्या भाजपा इसे दोहरा सकती है? यदि इन राज्यों में पार्टी को नुकसान हुआ, तो क्या वह आंध्र प्रदेश, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में उसकी भरपाई कर लेगी? कॉरपोरेट जगत बिहार की सीटों पर नीतीश के प्रभाव के असर को लेकर चर्चा कर रहा है। वे महाराष्ट्र में भाजपा की सीटों के नुकसान का आकलन कर रहे हैं। क्या उत्तर प्रदेश में जातीय गणित का फैलाव और अफवाहों का प्रसार वास्तविक है? वे गुजरात में संभावित नुकसान की सुगबुगाहट, राजस्थान में चार-पांच सीटों पर अनिश्चितता और दिल्ली में केजरीवाल के प्रभाव के बारे में भी जानना चाह रहे हैं। उन्हें इस बात को लेकर हैरानी हो रही है कि क्या कर्नाटक में मोदी की गारंटी पर कांग्रेस की गारंटी भारी पड़ रही है।


सितंबर, 2023 में एक वरिष्ठ निवेश बैंकर ने हवा में एक सवाल उछाला था कि क्या भाजपा के सत्ता में न लौटने का कोई खतरा है? पटना में विपक्षी गठबंधन बनने के बाद यह कठिन पहेली सामने आई थी। दस साल के शासन के खिलाफ सत्ता विरोधी रुझान हमेशा चुनौतीपूर्ण होता है। लेकिन किसी रुझान के लिए यह बहुत जल्दबाजी थी।

उसके कुछ महीने बाद राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने सारे संदेहों को खत्म करते हुए जीत हासिल की। फिलहाल भाजपा की अगुवाई में राजग की 2019 की जीत को याद करना उपयोगी होगा। राजग गठबंधन ने गुजरात की सभी 26, महाराष्ट्र की 48 में से 41, बिहार की 40 में से 39, कर्नाटक की 28 में से 25, राजस्थान की 25 में से 24, मध्य प्रदेश की 29 में से 28 और छत्तीसगढ़ की 11 सीटों में से नौ पर जीत हासिल की थी। मोदी के जादू ने 50 फीसदी से अधिक वोटों के साथ  इन राज्यों में 2014 के 136 सीटों को 2019 में 224 कर दिया था और हिंदी पट्टी में जीत से उन महत्वपूर्ण 200 सीटों पर जीत की संभावना थी, जहां भाजपा का कांग्रेस के साथ सीधा मुकाबला था। फरवरी 2024 में भाजपा ने अपने गढ़ में 'अबकी बार 400 पार' का नारा दिया था। इसके पीछे अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा को लेकर उत्साह था और समान नागरिक संहिता के वादे ने भाजपा के मूल मतदाताओं को सक्रिय कर दिया था। इसे कल्याण कार्यक्रमों के लाभार्थियों के एक बड़े जनाधार की नींव पर तैयार किया गया था और 2047 तक ‘विकसित भारत’ के वादे के अनुरूप बनाया गया था। निवेश-आधारित विकास पर ध्यान देने से शेयर बाजार के सूचकांक नई ऊंचाइयों पर पहुंच गए, जिससे निवेशक समुदाय रोमांचित हो गया। लेकिन मई आते-आते सीटों में कमी की बातें होने लगीं। आखिर बीच के इन हफ्तों में ऐसा क्या बदलाव हुआ, जिसने नए सवालों को प्रेरित किया?

प्रचार अभियान की रणनीति में बदलाव को लेकर सट्टेबाजों और आम जनता में काफी हैरानी है। पहले चरण में कम मतदान की आशंका के बाद भाजपा ने पहचान की राजनीति पर ध्यान केंद्रित किया, जिसके चलते बड़े पैमाने पर ध्रुवीकरण हुआ है। केजरीवाल ने अपने प्रचार अभियान के दौरान उत्तराधिकारी के सवाल को उछाल दिया, जिस पर सुगबुगाहट जारी है। संघ परिवार के साथ भी मतभेद की बातें बार-बार उठ रही हैं। यह धारणा भी विवादास्पद है कि मोदी सरकार ने आरएसएस की प्रमुख आकांक्षाओं को पूरा किया है। सट्टेबाजों, सर्वेक्षणकर्ताओं और सियासी पंडितों  के बीच बहस यह है कि क्या कहानी और रणनीति में बदलाव भाजपा के मूल मतदाताओं को मजबूत करेगा और/या इधर-उधर डोलने वाले मतदाताओं को भाजपा से अलग कर देगा। यकीनन इन लोगों के सवाल मतदान के इरादे के बारे में कम और बाजार की स्थिति के बारे में ज्यादा हैं। निश्चित रूप से अभी तक किसी ने किसी बड़े उलटफेर की भविष्यवाणी नहीं की है। सबसे खराब स्थिति की परिकल्पना यह है कि लोकसभा चुनाव का नतीजा 2014 की सीटों के करीब होगा।

हालांकि इससे इन्कार नहीं किया जा सकता है कि तेज हमले समर्थकों और विरोधियों के बीच भाजपा के कमजोर पड़ने की धारणा तैयार कर रहे हैं। दलगत राजनीति और पार्टी के भविष्य से अलग जैसी बयानबाजियां हो रही हैं, वे चुनाव प्रचार की गुणवत्ता के बारे में चिंता पैदा करती हैं। भारत सबसे बड़ा लोकतंत्र है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में 96 करोड़ से ज्यादा मतदाता अपनी पसंद की सरकार चुनने के पात्र हैं। इनमें से 1.8 करोड़ लोग पहली बार मतदान कर रहे हैं, जो अपने भविष्य के लिए एक दृष्टिकोण तलाश रहे हैं। कल ही चौथे चरण के तहत 96 लोकसभा सीटों के लिए मतदान संपन्न हुआ है। इससे पहले 285 निर्वाचन क्षेत्रों में पहले ही मतदान हो चुके हैं। सैद्धांतिक रूप से चुनाव प्रचार प्रतिस्पर्धी बाध्यताओं और विरोधी संकटों की दुविधा के समाधान के बारे में होता है। इसके बजाय सभी पार्टियां प्रचार के दौरान दावे-प्रतिदावे और खुलासे-खंडन कर रही हैं। नारों के शोर ने मतदाताओं का उत्साह बढ़ाने में शायद ही मदद की हो।

नोबेलजयी हर्बर्ट साइमन ने एक बार कहा था कि सूचनाओं की अधिकता फोकस की कमी पैदा करती है। साइमन द्वारा प्रतिपादित इस सिद्धांत (अधूरी जानकारी का प्रभाव और परिणामों पर प्रभाव) की उत्पत्ति सार्वजनिक नीति निर्माण से हुई थी और यह नियम चुनाव प्रचार पर भी लागू होता है। इस बार चुनाव प्रचार की गुणवत्ता और बहस की प्रकृति ने मतदाताओं को हैरान कर दिया है, जिसमें उन्हें उनकी ही पसंद बताई जा रही है।  

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