फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Two plus two, need to Geo-politics

दो जमा दो, भू-राजनीति की जरूरत

Fri, 07 Sep 2018 07:08 PM IST
प्रदीप कुमार
प्रदीप कुमार Updated Fri, 07 Sep 2018 07:08 PM IST
विज्ञापन
Two plus two, need to Geo-politics
दो जमा दो संवाद

अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो और रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण से दूरगामी संबंधों व एक-दूसरे के हितों को प्रभावित करने वाले मसलों पर वार्ताएं अपेक्षाओं के अनुरूप रहीं। भविष्य के लिए महत्वपूर्ण संकेत भी मिले। दलगत राजनीति से ऊपर उठकर देखें, तो टू प्लस टू बातचीत ने भारत की विदेश नीति के स्थायी मूलाधारों और उन पर टिकी निरंतरता को रेखांकित किया। अंतरराष्ट्रीय सबंधों में कोई एकतरफा खेल नहीं होता और फैसले उभयपक्षीय हितों के दायरे में करने होते हैं। इस कसौटी पर भारत की स्वायत्तता उतनी ही अक्षुण्ण है, जितनी संभव हो सकती है। एक बड़ा पैमाना यह है कि चीन और पाकिस्तान की ओर से वर्तमान एवं संभावित चुनौतियों का सामना करने में कोई कूटनीतिक कदम भारत के लिए कितना मददगार होने जा रहा है। इस नजरिये से यह बातचीत परमाणु समझौते के बाद एक नए अध्याय की शुरुआत मानी जा सकती है।


loader
 
कई दुविधाओं को पार करते हुए भारत ने कम्युनिकेशंस कांपेटिबिलिटी ऐंड सिक्युरिटी एग्रीमेंट (कॉमकासा) पर दस्तखत कर दिए। इसके तहत उच्चकोटि की सैन्य टेक्नोलॉजी हासिल की जा सकेगी। अति सुरक्षित कोडयुक्त संचार प्रणाली अमेरिका से मिल सकेगी। इसे भेदना अन्य किसी के लिए मुमकिन न होगा। भारत और अमेरिका सामरिक महत्व की गुप्त सूचनाएं साझा कर सकेंगे। मिसाल के लिए, हिंद महासागर में मौजूद चीनी नौसेना की ओर से अंडमान स्थित, परमाणु अस्त्रों से लैस, सामरिक कमान के लिए कोई खतरनाक गतिविधि होती है, तो भारत उससे समय रहते सचेत हो सकेगा। पाकिस्तान में चीन की सैनिक गतिविधियों की बेहतर निगरानी हो सकेगी। अमेरिका से अभी तक अनुपलब्ध अत्याधुनिक हथियार मिलने का रास्ता खुल जाएगा। जाहिर है, इन सबकी किसी न किसी रूप में कीमत भी चुकानी पड़ेगी।

पाम्पियो से वार्ता की शुरुआत में सुषमा स्वराज ने कहा, 'हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत और अमेरिका के विचारों के मिलनबिंदु पर हमने गौर किया है।' उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र को सबके लिए खुला और स्वतंत्र रूप में देखता है, जिसमें 'आसियान' देशों की केंद्रीय भूमिका है। जवाब में पाम्पियो ने कहा, 'समुद्रों और वायु मार्गों की स्वतंत्रता हमें सुनिश्चित करते रहना चाहिए और समुद्री विवादों को शांतिपूर्ण तरीके से हल किया जाना चाहिए।' स्वाभाविक रूप से चीन को मिर्ची लगेगी। भारत के लिए इसकी अहमियत इस घटना से समझिए-कुछ वर्ष पहले वियतनाम ने भारत की एक तेल कंपनी को अपने सार्वभौम तटवर्ती क्षेत्र में तेल की खोज का ठेका दिया था। चीन की दादागीरी के कारण इस समझौते पर अमल नहीं हो पाया। चीन पूरे दक्षिण चीन सागर क्षेत्र पर अपना अधिकार जताते हुए इस बात पर भी अड़ा है कि इसके ऊपर हवाई मार्ग के इस्तेमाल के लिए उसकी पूर्व अनुमति लेनी होगी। यह 21 वीं शताब्दी की 'गनबोट डिप्लोमेसी' है। इसका एकजुट मुकाबला होना ही चाहिए।
 
रूस से एस-400 मिसाइल सिस्टम की खरीद जटिल मुद्दा है। भारत सरकार दो टूक कह चुकी है कि इसे छोड़ा नहीं जा सकता। अमेरिका भारत की बाध्यता को समझता है। इसीलिए वार्ता के दौरान संकेत मिले कि अमेरिका रूस से आयात पर प्रतिबंध  लगाने वाले कानून 'काट्सा' से भारत को बचाने पर विचार करेगा। एस-400 पर अमेरिकी दबाव सफल होने की संभावना नगण्य है, क्योंकि मोदी सरकार पर आक्रामक हमलों का विपक्ष को अच्छा मौका मिल जाएगा और चुनावी साल में वह इससे बचना चाहेगी। भारतीय कूटनीति का इतिहास रहा है कि 'आपत्तिजनक' समझौतों के बावजूद सामरिक स्वायत्तता और विदेश नीति के संचालन में आजादी बरकरार रखी गई है। भारत ने अपने हित में चीन पर जासूसी निगाह रखने के लिए अमेरिकी को नंदा देवी पर परमाणु पैक लगाने की सुविधा दी, तो सोवियत संघ के साथ संधि भी की। आशा की जाए, विदेश नीति की यह मेधा बलवती बनी रहेगी।
 
दूसरा पेचीदा मुद्दा है ईरान से तेल का आयात। अमेरिका ने ईरान पर एकतरफा प्रतिबंध लगाए हैं। भारत की पहली प्रतिक्रिया यह थी कि वह केवल संयुक्त राष्ट्र की ओर से लगे प्रतिबंधों को मानता है। भारत अपने कुल आयातित तेल का दस फीसदी ईरान से प्राप्त करता है और उसके तेल शोधक कारखाने इस पर निर्भर हैं। पाम्पियो ने नई दिल्ली में कहा कि हर देश की तरह हमने भारत को भी बता दिया है कि चार नवंबर 2018 के बाद ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लागू हो जाएंगे, लेकिन जहां मुनासिब होगा, हम छूट पर विचार भी करेंगे। बात सिर्फ की तेल की नहीं है। ईरान के चाबहार बंदरगाह से अफगानिस्तान तक जाने का रास्ता है। अफगानिस्तान में उत्तरी मोर्चे की फतह में भारत का योगदान ईरान के सहयोग बिना संभव न होता।
    
भारत और अमेरिका, दोनों को पारस्परिक आवश्यकता है। भारत का स्वार्थ यह है कि चीन-पाकिस्तान दुरभिसंधि की काट अमेरिका के साथ बिना व्यावहारिक नहीं। भारत को अपनी आंकाक्षाएं पूरी करने के लिए जो उच्चस्तरीय सैनिक-असैनिक टेक्नॉलजी चाहिए, उसका एकमात्र स्रोत अमेरिका है। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भी अमेरिका का साथ चाहिए। अमेरिका की मजबूरी यह है कि दक्षिण एशिया, प्रशांत और हिंद महासागर में अमेरिकी हितों की रक्षा में भारत का सहयोग अपरिहार्य है। भारत के समक्ष चुनौती अमेरिका से विशेष संबंध रखने के साथ ही रूस और चीन से भी अच्छे संबंधों की है। एक हद से आगे बढ़ने पर चीन खामोश नहीं बैठेगा।

भारत को फौजी साज-ओ-सामान की सप्लाई और अन्य आर्थिक संबंधों में रूस का भी हित है, पर रूस-चीन-पाकिस्तान सहयोग के खतरों की अनदेखी भारत नहीं कर सकता। याद रखना चाहिए कि सोवियत संघ से संधि और गहरे सामरिक संबंधों के बाद भी भारत ने कई मौकों पर मास्को को निराश किया। 1962 के पराभूत भारत ने कश्मीर घाटी के विभाजन के अमेरिकी प्रस्ताव को हिकारत से ठुकरा दिया था। आज का भारत बुनियादी तौर पर भिन्न है। भारत की अपराजेय आंतरिक शक्ति पर भरोसा रखना चाहिए। 

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed