फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   tunnels in Himalayas important for humans also better than roads from environment silkyara tunnel

पर्यावरण: विकास विरोधी नहीं हैं सुरंगें, सड़कों से बेहतर हैं 'अंदर' के रास्ते

Dr. Anil Prakash Joshi डॉ. अनिल प्रकाश जोशी
Updated Fri, 08 Dec 2023 07:48 AM IST
विज्ञापन
सार
सिलक्यारा हादसे के बाद से उत्तराखंड को आपदाओं के लिए कुख्यात बनाने की कोशिशें हो रही हैं, जबकि सुरंगें मनुष्य के लिए न केवल महत्वपूर्ण रही हैं, बल्कि पर्यावरण की दृष्टि से भी सड़कों से बेहतर हैं। पर्यावरणविदों को हिमालय को समझना है, तो उन्हें अपने खेमों की फिक्र छोड़ जमीन पर उतरना होगा।
 
loader
tunnels in Himalayas important for humans also better than roads from environment silkyara tunnel
उत्तरकाशी सिलक्यारा सुरंग - फोटो : amar ujala

विस्तार

उत्तराखंड आपदाओं और हादसों के लिए कुख्यात बना दिया गया है। केदारनाथ और जोशीमठ के बाद सिलक्यारा की सुरंग ने सारी दुनिया का ध्यान एक बार फिर खींचा। ऊपर से यह भी है कि यहां विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों की एक लंबी कतार भी है, जो इस तरह की घटनाएं होने पर अपने तीर कमान पर चढ़ाए रखते हैं। सिलक्यारा की सुरंग ने देश-दुनिया में बड़ी बहस की शुरुआत कर दी। 41 मजदूरों का उस सुरंग में फंसना एक ऐसी पीड़ा का विषय था, जिसने देश को झकझोर दिया था। उनकी सुरक्षित वापसी देश के लिए बड़ी राहत थी। इसके बाद अब सुरंगों पर चर्चा ने जोर पकड़ा है।



इस तरह की आपदाओं में कई तरह के नए-पुराने प्रसंग खड़े कर दिए जाते हैं, जिससे हम घटना के मूल बिंदुओं से भटक जाते हैं। सिर्फ सबक लेने की बात नहीं होती। घटना के वैज्ञानिक विश्लेषण में पड़े बगैर आधे-अधूरे विचारों को थोप देने की प्रवृत्ति दिखती है। सुरंगों को लेकर अपना ही इतिहास खंगाल लें, तो शायद अनावश्यक बोलने की जरूरत नहीं रहेगी। आदम जाति का इतिहास इस बात का साक्षी है कि गुफाएं हमारे लिए पहले चरण के आवास बने थे और अगर गुफा आर-पार हो गई, तो सुरंग का ही रूप ले लेती थी।


अगर हम अपनी पुरानी सभ्यता में चले जाएं, तो राजाओं के जमाने से ही सुरंगों का बहुत बड़ा महत्व था। अपने ही देश में नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में सुरंगें युद्ध से लेकर सुरक्षा तक में काम आती थीं। अब हमास और इस्राइल के युद्ध को ही देख लें, किस तरह से हमास ने सुरंगों में एक बड़ा राज खड़ा किया है। असल में 18वीं शताब्दी से ही दुनिया में यातायात के लिए सुरंगों को बड़ा रास्ता बनाया गया।

खासतौर से स्कैंडिनेविया या पश्चिमी देशों में सुरंगों से ही सड़कों का जाल बिछा। वहां सुरंगों को ज्यादा सुरक्षित माना जाता है और यह सच भी है। अपने ही देश में देख लें। देहरादून-दिल्ली के मार्ग में स्थित डाट काली मंदिर में बनी सुरंग अंग्रेजों की देन है। इसका सही से अता-पता हो या न हो, लेकिन यह 1800-1900 के आसपास में बनी है, जो आज तक पूरी तरह सुरक्षित है और उसके साथ ही उसी पहाड़ में दो और सुरंगें बनाई गईं, जो ट्रैफिक से निजात पाने के लिए जरूरी थीं। कच्चे-पक्के पहाड़ों में सुरंगों से नुकसानों की चर्चा में यह भी संज्ञान में ले लेना चाहिए कि डाट काली वाली सुरंग शिवालिक पर्वत श्रेणी में बनी है, जो हिमालय का सबसे नया पहाड़ है। मतलब इन सुरंगों में बेहतर दर्जे के निर्माण कार्य हुए हैं।

इतना ही नहीं, उत्तराखंड में ही रुद्रप्रयाग के पास केदारनाथ जाने वाली सुरंग सबसे बड़ा उदाहरण है, जिसकी पारिस्थतिकी सिलक्यारा जैसी है। असल में पर्यावरण की दृष्टि से अगर देखा जाए, तो सड़कों की तुलना में सुरंग इसलिए बेहतर हैं, क्योंकि एक किलोमीटर की सुरंग कई किलोमीटर के जंगल और सड़क के नुकसान से पारिस्थितिकी को बचाती है। फिर सुरंग में ऊपर के वन सुरक्षित भी रहते हैं और उन पर ज्यादा विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता।

दुर्भाग्य यह है कि विशेषज्ञ व पर्यावरणविद् सुरक्षित शहरी स्थानों व खुद के लिए तमाम सुविधाओं से लैस रहकर जब प्रकृति को बचाने की बात करते हैं, तो फिर बात खपती नहीं है। सिलक्यारा की घटना निर्माण प्रक्रिया में निहित दोषों का परिणाम है। सुरंग में आगे बढ़ते हुए पीछे का हिस्सा सुरक्षित करते चलना चाहिए था, जिसमें बड़ी चूक हुई। साथ ही,  इस तरह की घटनाओं से बचने के लिए सुरंगों में समानांतर सुरक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए थी, जो निर्माण करने वाली कंपनी की जवाबदेही का हिस्सा होना ही चाहिए।

इन मुद्दों पर बात न कर, हम उस पहलू को नहीं छूते, जो घटना से लिया हुआ सबक होता। सिलक्यारा की सुरंग के बारे में विशेषज्ञों के दल ने बड़ा खुलासा किया कि यह एक जलागम क्षेत्र था। अब विशेषज्ञों को शायद यह पता नहीं है कि पूरा पहाड़ ही अपने आप में एक जलागम क्षेत्र है, जो वर्षा के पानी को दिशा देते हुए नदियों तक ले जाता है। वहीं दूसरी तरफ, विशेषज्ञ इस बात से भी चूक गए कि सिलक्यारा सुरंग के ऊपर जो भी वन हैं, वे चीड़ के जंगल हैं और इन जंगलों की भारी कमी यही मानी जाती है कि वे वर्षा के पानी को नहीं सोखते, इसीलिए चीड़ को विरोध झेलना पड़ता है। गौरतलब है कि जहां-जहां वन होते हैं, वहां इनकी जड़ें चट्टानों को भेदकर अपने लिए मिट्टी बनाती हैं। वनों के नीचे उनकी जड़ें चट्टानों को मिट्टी में परिवर्तित कर देती हैं, इसीलिए वे वन टिके रहते हैं। सिलक्यारा में भी वन चट्टानों को भेदकर मिट्टी बना चुके थे और ये मिट्टी सुरंग के अंदर छत में पक्का काम न होने के कारण गिर पड़ी।

असल में सुरंग में ज्यादा महत्वपूर्ण निर्माण-शैली व तकनीक होती है, क्योंकि सुरंग के भीतर चट्टानों जैसी मजबूती दी जाती है, ताकि सुरंग पूरी तरह सुरक्षित रहे। हिमालय क्षेत्र में विशेषज्ञ भरे-पड़े हैं, फिर भी यह सबसे ज्यादा आपदा झेल रहा है और उसका कारण शायद यही है कि हम भ्रमित रहते हैं। हम ऐसी घटनाओं में एक ही पहलू को बार-बार दोहरा कर अपनी विशेषज्ञता या पर्यावरण के प्रति चिंता को झलकाने की कोशिश करते हैं।

इस तरह के विशेषज्ञों व पर्यावरणविदों को सब कुछ त्याग कर पहाड़ व वनों में रहकर आंदोलनों को धार देनी चाहिए। क्योंकि ठाट-बाट, सुविधाओं, मोबाइल, मोटरों के बीच आंदोलन न तो पनपते हैं और न ही जमीनी होते हैं। बेहतर समझ के लिए उन वंचितों के बराबर में खड़ा होना होगा, जो तथाकथित विकास में अपना हिस्सा चाहते हैं। हम उन पश्चिमी पर्यावरणविदों की तरह न बनें, जो अपने विकास के लिए दूसरों के हिस्से के विकास की बलि चढ़ाने की जिद में हैं।

विकसित देशों के पर्यावरणविदों की यही शैली है कि वे अपने हिस्से के सुख को भोगने के बाद विकासशील देशों को पर्यावरण की शिक्षा देते हैं और यह भी कहते पाए जाते हैं कि हमने गलती की है, लेकिन आप इसे न दोहराएं। इसलिए अब ज्यादा सवाल इन्हीं बातों को लेकर होने चाहिए कि हम किस तरह से विकास व पारिस्थितिकी में समन्वय रखें। हिमालय में एकमत की कमी है। हम दो खानों में बंटे हैं। एक वर्ग विरोध में है और दूसरा पक्ष में है। दुर्भाग्य है कि हम विकल्प की तरफ जाने से कतराते हैं, क्योंकि हमें अपने-अपने खेमों को जिंदा जो रखना है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed