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टुंडा, भटकल और हड्डी

Wed, 18 Sep 2013 07:55 PM IST
सुधीर विद्यार्थी
सुधीर विद्यार्थी Updated Wed, 18 Sep 2013 07:55 PM IST
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Tunda, bhatakal and Haddi

साधो, इस व्यंग्य का शीर्षक यह नहीं है, जो लिखा गया है। मैं खोजते-खोजते थक गया, सो टुंडा, भटकल और हड्डी से काम चला रहा हूं। दरअसल, मेरे शब्दकोश में ये तीनों नए-नए आए हैं, इसलिए इनका इस्तेमाल करना मेरी विवशता है। ये तीनों पकड़े गए आतंकियों के नाम हैं। पर मुझे इन नामों से आतंक का बोध नहीं होता। टुंडा देखने में भला दिखता है, भटकल सीधा-सादा और हड्डी... अरे, यह तो मेरे बचपन का नाम है। दुबला-पतला था, सींकिया, सो मुहल्ले वाले मुझे हड्डी कहने लगे थे। पिता मेरा दाखिला कराने स्कूल ले गए, तो मास्टर से कहा कि यह न पढ़े, तो इसकी हड्डी काट देना।

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मेरे पास सिर्फ हड्डियां थीं। सुनकर मेरी रूह कांप गई। आज इन खूंखार आतंकवादियों के चेहरे देखकर रूह को कुछ नहीं होता। पूरी जिंदगी हमने दहशत में गुजार दी। ऐसे में ये खबरें अब आतंकित नहीं करतीं। टीवी चैनल डरावनी आवाजों के साथ इनके फुटेज बार-बार दिखाते हैं, पर हम हैं कि एअरकंडीशंड कमरे में बैठे खबरें निगल रहे हैं। हमारे चेहरों पर कोई शिकन नहीं। हम सलामत, तो दुनिया राजी-खुशी। देश को कभी हमने भूगोल की किताब में छपे नक्शे से ज्यादा महत्व नहीं दिया।
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हां, तो टुंडा की दाढ़ी का रंग नारंगी है। वह अबोध भी दिखता है। मैं चाहता हूं कि मुल्जिम मुझे शातिर लगें, पर ऐसा हो नहीं पाता। आखिर आदमी की पहचान उसके चेहरे-मोहरे से क्यों नहीं हो पाती, मैंने पड़ोसी चचा से पूछ लिया। वह बोले, यह एक शाश्वत सवाल है। बड़े अपराधियों की शिनाख्त करने में कई बार अदालतें भी चूक जाती हैं।
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दो-तीन दिन से भटकल की चर्चा करते हुए मैं स्वयं भटकने लगा हूं। वैसे भटकल नाम के इस आदमी ने भटक कर ही आतंक का रास्ता अख्तियार किया होगा। मैंने तर्क किया, ऐसी व्यवस्था हो कि टुंडा, भटकल और हड्डी पैदा ही न होने पाएं। सुनकर चचा पीड़ा के साथ कहने लगे, हमारी सरकारें आतंकवादियों को पैदा करती हैं और उन्हें ’हीरो’ का दर्जा देती हैं। पर मामला उलझ गया है। भटकल तो कहता है कि उसका नाम भटकल नहीं, कुछ और है।


मैंने कहा, नाम में क्या धरा है। भटकल नामधारी न होकर भी वह आतंकवादी हो सकता है। सड़क पर गलत दिशा में चल रहे आदमी को देखकर चचा एकाएक बोले, ओए भटकल, एक तरफ हो जा। आदमी गालियां बकने लगा। मैंने टोका, भटकल कहकर कोई गाली थोड़े ही दे रहे हैं। आज हर कोई भटकल है।

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