फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Trying to win the trust of minorities

अल्पसंख्यकों का भरोसा जीतने की कोशिश

Fri, 14 Feb 2020 05:03 AM IST
mariana babar मरिआना बाबर
Updated Fri, 14 Feb 2020 05:03 AM IST
विज्ञापन
Trying to win the trust of minorities
पाकिस्तान में हिंदू मंदिर - फोटो : a

पाकिस्तान के सभी अखबारों में दिल्ली चुनाव के नतीजे अलग-अलग वजहों से पहले पन्ने की सुर्खियां थे। हालांकि पाकिस्तानी यह समझ नहीं पा रहे कि दिल्ली जैसे क्षेत्रीय चुनाव में पाकिस्तान क्यों और कैसे इतना बड़ा मुद्दा बन गया। भारत के चुनावों से पाकिस्तान का कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन जैसा कि पहले भी देखा गया था, भाजपा के बड़े नेताओं सहित पार्टी के हर उम्मीदवार ने पिछले लोकसभा चुनाव में पाकिस्तान का मुद्दा  उठाया था। मैं खुद, जो भारत को समृद्ध इतिहास वाले एक ऐसे महान मुल्क के तौर पर देखती हूं, जिसने कला एवं संस्कृति के क्षेत्र में दुनिया को काफी कुछ दिया है, हैरान हूं कि कैसे भाजपा नेता पाकिस्तान के खिलाफ नफरत पैदा कर चुनाव जीतने की उम्मीद करते हैं। पर यह स्वीकार करना होगा कि गैर-भाजपा नेताओं और भारत के स्वतंत्र मीडिया ने चुनाव के दौरान ही इस पाकिस्तानी पहलू को पहचान लिया था और इसकी कड़ी निंदा की थी।


loader

पाकिस्तान के चुनावों में भारत कभी मुद्दा नहीं बनता, क्योंकि यहां के वोटर घरेलू मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। इसके अलावा, दिल्ली चुनाव के विपरीत, जहां पाकिस्तान का नकारात्मक ढंग से इस्तेमाल किया गया और विरोधियों को 'पाकिस्तान जाने' के लिए कहा गया, पाकिस्तान में भारत 'गाली' नहीं है। पाकिस्तान का मोदी सरकार से उनकी कश्मीर नीति के कारण बड़ा मतभेद है, पर मतभेद का दूसरा और कोई बड़ा मुद्दा नहीं है।

भारत ने पहले यह ठीक ही कहा था कि पाकिस्तान से आतंकवाद आता है। लेकिन इस हफ्ते बहुत लोगों को यह जानकर राहत मिली होगी कि हाफिज सईद को जेल की सजा दी गई है। हालांकि इसका ताल्लुक एफएटीएफ (वित्तीय कार्रवाई कार्यबल) की शर्तें पूरी करने से है, सुरक्षा प्रतिष्ठान द्वारा हाफिज को सबक सिखाने से नहीं। जब भारत में नागरिक संशोधन कानून (सीएए) का मुद्दा उठा और वहां प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई की गई, तब पाकिस्तानी नेताओं और कार्यकर्ताओं ने मुस्लिम मुद्दों की वजह से इस पर एतराज जताया।

चुनावों में पाकिस्तान के प्रति ऐसी नफरत बहुत खतरनाक है। इस क्षेत्र में दोनों पड़ोसियों को साथ-साथ रहना है। जब प्रधानमंत्री मोदी पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश करेंगे, तब जिन भारतीयों को उन्होंने पाकिस्तान से नफरत करना सिखाया है, वही सवाल उठाएंगे कि हम पाकिस्तान से कैसे बात कर सकते हैं या उस पर कैैसे भरोसा कर सकते हैं। चुनाव में बयानबाजी करना आसान है, बाद में तनाव कम करना बहुत कठिन।

नई दिल्ली द्वारा कश्मीर की सांविधानिक स्थिति में बदलाव करने के बाद पाकिस्तान का रुख यह है कि दोतरफा बातचीत, कारोबार शुरू करने, ट्रेन, बस या उड़ान की अनुमति देने अथवा कूटनीतिक रिश्तों को बेहतर करने के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। लेकिन एक पेशेवर भारतीय कबड्डी टीम को वीजा दिया गया और पाकिस्तान आने पर उसका स्वागत किया गया। इससे पता चलता है कि पाकिस्तान की हुकूमत और लोग खेल को सियासत से अलग रख रहे हैं। हालांकि भारत सरकार की रिपोर्टें बताती हैं कि यह कबड्डी टीम भारत का प्रतिनिधित्व नहीं करती। पाकिस्तान इस गैरसरकारी रिपोर्ट पर भी चुप है कि पाकिस्तानी तीर्थयात्रियों की अजमेर शरीफ यात्रा के लिए भारत विशेष ट्रेन की सेवा पर सहमत हो गया है।

इस बीच बलूचिस्तान के छोटे से शहर झोब में स्थानीय हिंदू समुदाय को तब खुशी हुई, जब 200 साल पुराना एक मंदिर उन्हें लौटा दिया गया। यह भी महत्वपूर्ण है कि एक पाकिस्तानी धार्मिक-राजनीतिक पार्टी जमायत उलेमा इस्लाम (फजलुर रहमान) ने इसके लिए पहल की थी और इसे हिंदू पंचायत को सौंप दिया। यह कोई साधारण मंदिर नहीं है। यह न केवल बहुत पुराना मंदिर है, बल्कि इसे इस क्षेत्र के एक पहाड़ से काटकर तैयार किया गया था। सियालकोट में भी एक जगन्नाथ मंदिर चालू है और अब एक हजार साल पुराने शिवालय तेजा सिंह का पुनरुद्धार किया जा रहा है। अदालत ने पेशावर में गोरखनाथ मंदिर को फिर से खोलने का आदेश दिया है और उसे एक विरासत स्थल घोषित किया गया है।

लेकिन पाकिस्तान में समस्या यह है कि यहां बहुत कम ऐसे कारीगर हैं, जो मूर्तियों की मरम्मत करने की कला जानते हैं, जो कि पाकिस्तान में आम नहीं है। इसके लिए मंदिर निर्माण के विशेषज्ञों को विदेश से लाया जाना चाहिए। मुझे याद है कि जब नवाज शरीफ के दौर में रावलपिंडी के पास कटासराज का पुनरुद्धार किया जा रहा था, तब भारत के पंजाब से कामगारों को बुलाया गया था। झोब में मंदिर सौंपने का काम मौलाना अल्लाह दाद द्वारा किया गया, जो वहां की मुख्य मस्जिद के खातिब (धर्मोपदेशक) हैं। अब मुस्लिम समुदाय मांग कर रही है कि विभाजन के कारण बंद पड़े इस मंदिर की मरम्मत की जाए और इसके पुराने गौरव को लौटाया जाए। झोब में अब बहुत ज्यादा हिंदू परिवार नहीं हैं, कई परिवार भारत चले गए। एक विश्लेषक ने इसका स्वागत करते हुए कहा, 'झोब के स्थानीय अधिकारी इस सराहनीय कार्य के लिए तारीफ के हकदार हैं। उनके कार्य न केवल इस क्षेत्र में, बल्कि देश के अन्य हिस्सों में रहने वाले अल्पसंख्यक समुदायों के बीच सुरक्षा की खोई भावना फिर से बहाल करने में मदद करेंगे। बेशक मंदिर की वापसी सकारात्मक कदम है, लेकिन स्थानीय अधिकारियों को श्रद्धालुओं के हित में पूजा स्थल को उसके मूल स्वरूप में बहाल करने का अपना वादा पूरा करना चाहिए।'

पाकिस्तान तहरीक-ए इंसाफ पार्टी की सरकार की योजना है कि देश के चार सौ मंदिर, जिन पर भूमाफिया ने अवैध रूप से कब्जा कर लिया है, हिंदुओं को सौंप दिए जाएं। देश भर में कराए गए एक सर्वे में पता चला कि विभाजन के समय 428 हिंदू मंदिर थे और उनमें से 408 पर 1990 के बाद अवैध कब्जा कर लिया गया। सरकार के ताजा आंकड़े के मुताबिक, सिंध में 11, पंजाब में चार, बलूचिस्तान में तीन और खैबर पख्तूनख्वा में दो मंदिर 2019 में चालू थे।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed