{"_id":"67b52642201c4be4d5027d44","slug":"trump-modi-and-chanakya-niti-india-will-emerge-as-self-confident-global-leader-call-rival-ideal-and-disarm-him-2025-02-19","type":"story","status":"publish","title_hn":"ट्रंप, मोदी और चाणक्य नीति: प्रतिद्वंद्वी को आदर्श बताकर उसे निहत्था करना सर्वोत्तम कूटनीति","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
ट्रंप, मोदी और चाणक्य नीति: प्रतिद्वंद्वी को आदर्श बताकर उसे निहत्था करना सर्वोत्तम कूटनीति
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
डोनाल्ड ट्रंप के साथ पीएम मोदी (फाइल)
- फोटो :
पीटीआई
विस्तार
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप वाशिंगटन में मिले। प्रधानमंत्री मोदी ऐसे चौथे विदेशी नेता थे, जो दूसरी पारी में राष्ट्रपति ट्रंप से मिले हैं। उनसे पहले अमेरिका के कट्टर सहयोगी इस्राइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू, जापान के प्रधानमंत्री और जॉर्डन के राजा ट्रंप से मिल चुके हैं, जो गाजा पट्टी से निकाले जाने वाले फलस्तीनियों को अपने यहां लेंगे। प्रधानमंत्री मोदी और ट्रंप इससे पहले भी कई बार मिल चुके हैं, तो इस बार की मुलाकात में क्या खास बात रही? इससे यह संकेत मिला है कि वर्ष 2025 में भारत एक आत्मविश्वासी, स्वाभिमानी और आत्मनिर्भर वैश्विक नेता के रूप में पहचाना जाएगा।
हालांकि, दो दिग्गज वैश्विक नेताओं की यह मुलाकात पूरी तरह से व्यापार को लेकर थी। व्यापार एक ऐसा विषय है, जिसे डोनाल्ड ट्रंप और उनके भारतीय गुजराती समकक्ष, दोनों पसंद करते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि फोकस के क्षेत्र होंगे-प्रौद्योगिकी, व्यापार, रक्षा, लचीली आपूर्ति, ऊर्जा (विशेष रूप से छोटे परमाणु रिएक्टर)। डोनाल्ड ट्रंप ने बताया कि भारत अमेरिका से बहुत सारा तेल और गैस खरीदेगा, जिसकी भारत को जरूरत है और अमेरिका के पास इसका सबसे बड़ा भंडार है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि उन्होंने राष्ट्रपति ट्रंप से सीखा है कि देश को सर्वोपरि रखना कितना महत्वपूर्ण है और वह भी यही कर रहे हैं। अपने प्रतिद्वंद्वी की प्रशंसा करना और उसे आदर्श बताकर निहत्था करना चाणक्य की प्राचीन रणनीति है। उन्होंने यूक्रेन युद्ध को हल करने की पहल के लिए राष्ट्रपति ट्रंप की सराहना की और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और वोलोदिमीर जेलेंस्की, दोनों से समाधान खोजने का आग्रह किया। द्विपक्षीय चर्चाओं के दौरान सबसे बड़ा मुद्दा चीन था। हाल ही में बीजिंग ने अमेरिका, भारत तथा सामान्य रूप से विश्व को दी जाने वाली धमकियों में नरमी बरती है। संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि बांग्लादेश का मुद्दा वह प्रधानमंत्री मोदी के लिए छोड़ते हैं।
अपने शपथ ग्रहण से पहले ट्रंप ने बांग्लादेश की हिंसा और शेख हसीना के अपदस्थ होने के बाद वहां अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं के खिलाफ हो रहे अत्याचारों की आलोचना की थी। ट्रंप अपने देश को वैश्विक संकटों से अलग रखना, न कि नए संकटों में उलझाना चाहते हैं। इसके अलावा, कमजोर बांग्लादेश अमेरिका से कोई भी सार्थक वस्तु नहीं खरीदता, इसलिए व्यापारी डोनाल्ड ट्रंप को वास्तव में उसकी परवाह नहीं है। लगता तो यही है कि हिलेरी क्लिंटन और जॉर्ज सोरोस के करीबी मोहम्मद यूनुस को राष्ट्रपति ट्रंप सत्ता से हटा देंगे। भारत और अमेरिका, दोनों इस्लामी आतंकवाद से पीड़ित रहे हैं। इसलिए संयुक्त वक्तव्य में इस बात पर पुनः जोर दिया गया कि आतंकवाद के वैश्विक संकट से लड़ा जाना चाहिए और दुनिया के हर कोने से आतंकवादियों के सुरक्षित ठिकानों को समाप्त किया जाना चाहिए। मेरे देखे द्विपक्षीय संयुक्त बयानों में यह पहला ही है, जिसमें अल-कायदा, आईएसआईएस, जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा (अंतिम दो पाकिस्तान में स्थित हैं) सहित आतंकी गुटों का विशेष उल्लेख किया गया है। ‘हमारे नागरिकों’ को नुकसान पहुंचाने वालों को न्याय के कटघरे में लाने की साझा इच्छा के चलते ही राष्ट्रपति ट्रंप ने 2008 में मुंबई में हुए आतंकी हमले में शामिल पाकिस्तानी मूल के आतंकवादी और पूर्व पाकिस्तानी सेना कप्तान तहव्वुर राणा को भारत को प्रत्यर्पित करने की घोषणा की। संयुक्त वक्तव्य में पाकिस्तान से आग्रह किया गया कि वह 26/11 मुंबई हमले और पठानकोट हमलों के दोषियों को शीघ्र न्याय के कटघरे में लाए तथा यह सुनिश्चित करे कि उसके भू-भाग का उपयोग सीमा पार आतंकवादी हमलों को अंजाम देने के लिए न किया जाए।
भारत और अमेरिका के बीच कई रक्षा समझौते हुए। इस तरह अमेरिका ने भारत को रणनीतिक व्यापार प्राधिकरण के साथ एक प्रमुख रक्षा साझेदार और एक प्रमुख क्वाड साझेदार के रूप में मान्यता दी। जाहिर है, नरेंद्र मोदी की यह यात्रा रक्षा सहयोग पर केंद्रित थी, जिसमें अमेरिका भारत के साथ रक्षा बिक्री और सह-उत्पादन का विस्तार कर अंतर-संचालन और रक्षा औद्योगिक सहयोग को मजबूत करेगा। महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत और अमेरिका वैश्विक शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र और बहुराष्ट्रीय क्षेत्रों में अमेरिकी और भारतीय सेनाओं की विदेशी तैनाती का समर्थन करते हैं और उसे बनाए रखेंगे। साफ है कि दोनों देश इस अहम क्षेत्र में अपने अड्डे साझा कर सकते हैं।
अरब सागर में समुद्री मार्गों को सुरक्षित करने में मदद के लिए संयुक्त समुद्री सेना नौसैनिक टास्क फोर्स में भविष्य में नेतृत्व की भूमिका निभाने के लिए भारत को अमेरिका का खुला समर्थन स्पष्ट रूप से चीन के कारण है। इस यात्रा से अमेरिका-भारत ट्रस्ट की शुरुआत हुई, जिसका उद्देश्य रक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, क्वांटम, जैव प्रौद्योगिकी, ऊर्जा और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देने के लिए सरकार-से-सरकार, शिक्षा और निजी क्षेत्र के सहयोग को बढ़ावा देना है। भारत तेल एवं गैस (ऊर्जा) के लिए भूखा है, जिसका सबसे बड़ा उत्पादक अमेरिका है। भारत ने अमेरिका से अवैध भारतीयों को वापस भेजने का मुद्दा उठाया, और यात्रा से ठीक पहले 104 भारतीयों को वापस भेजने के तरीके पर भारत में प्रतिकूल प्रतिक्रिया को देखते हुए ट्रंप को अधिक मानवीय दृष्टिकोण अपनाने का अनुरोध किया।
ट्रंप चाहते थे कि भारत विशिष्ट अमेरिकी उत्पादों पर अपने सीमा शुल्क (टैरिफ) को कम करे व भारत ऐसा कर रहा है। ट्रंप ने माना कि नरेंद्र मोदी उनसे भी बेहतर सौदेबाज हैं। इसके अलावा, अमेरिका में भारतीय प्रतिभाओं के आव्रजन व आसान वीजा प्रक्रियाओं के माध्यम से लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने के बारे में भी चर्चा हुई। यात्रा से कुछ दिन पहले, अमेरिकी विदेश विभाग के एक पूर्व अधिकारी ने खुलासा किया कि कैसे अमेरिकी डार्क स्टेट ने 2019 में नरेंद्र मोदी की लगातार चुनावी जीत से भयभीत भारतीयों को शामिल करके भारत को तोड़ने की कोशिश की थी। उम्मीद की जानी चाहिए कि वर्ष 2025 को भारत-अमेरिका साझेदारी के लिए एक महत्वपूर्ण वर्ष के रूप में याद किया जाएगा।