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चलन: 'फास्ट फूड नेशन' बनने की ओर, ...मगर आहार शैली का यह बदलाव चिंता का सबब
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विस्तार
चाहे सत्ता में किसी भी दल की सरकार हो और आप चाहे जहां भी देखें, विरोधाभास भारतीय वास्तविकता के केंद्र में है। इसलिए शायद आश्चर्य की बात नहीं कि प्राचीन भारत, प्राचीन सभ्यता के आदर्श और मूल्यों की व्यापक चर्चा के बीच भारतीय खानपान की संस्कृति अति-प्रसंस्कृत खाद्य की ओर बढ़ रही है, जिसे कथित तौर पर 'आधुनिक' आहार का मुख्य आधार कहा जाता है और जिसका, हमारी सेहत पर बुरा असर भी पड़ रहा है।
हाल ही में जारी घरेलू उपभोग खर्च सर्वेक्षण (एचसीईएस) एक बार फिर उसी बात की पुष्टि कर रहा है, जिसके बारे में चिकित्सक और स्वास्थ्य पैरोकार लंबे समय से चेतावनी दे रहे थे। यह नवीनतम सर्वेक्षण अगस्त, 2022 से जुलाई, 2023 के बीच किया गया था। 11 वर्षों के अंतराल के बाद प्रकाशित नवीनतम सर्वेक्षण की तुलना पहले के सर्वेक्षणों से नहीं की जा सकती।
नवीनतम एचसीईएस में कई नई चीजें हैं, लेकिन बदलाव का व्यापक रुझान स्पष्ट है। एक उभरता हुआ रुझान भारतीय खानपान से संबंधित है। सर्वेक्षण के निष्कर्ष दिखाते हैं कि कुल खाद्य उपभोग खर्च में अनाज और दालों की हिस्सेदारी ग्रामीण और शहरी, दोनों क्षेत्रों में तेजी से घट रही है। वर्ष 1999-2000 में ग्रामीण परिवारों में अनाज पर खर्च कुल उपभोग खर्च का 22.16 फीसदी था, जो कि अब घटकर 4.91 फीसदी रह गया है। शहरी परिवारों में अनाज पर खर्च इसी अवधि के दौरान 12 फीसदी से घटकर 3.64 फीसदी रह गया है। इसी तरह वर्ष 1999-2000 में ग्रामीण परिवारों में दालों पर खर्च कुल उपभोग खर्च का 3.81 फीसदी था, जो अब घटकर 1.77 फीसदी रह गया है और शहरी परिवारों में यह 2.84 फीसदी से घटकर 1.21 फीसदी रह गया है। ग्रामीण परिवारों में अनाज एवं दालों पर खर्च में गिरावट ज्यादा स्पष्ट दिखाई देता है। इसका एक प्रमुख कारण प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत मुफ्त और सब्सिडी वाले खाद्यान्नों (अनाज एवं दालें) का वितरण हो सकता है।
नवीनतम घरेलू सर्वे से यह भी पता चलता है कि अब लोग दूध, अंडा, मछली एवं मांस, फल एवं सब्जियों के उपभोग पर ज्यादा खर्च करने लगे हैं। सर्वेक्षण के अनुसार, भारत के लोग सूखे मेवे (ड्राइ फ्रूट्स) का अधिक सेवन कर रहे हैं। लेकिन ये आंकड़े पूरी कहानी बयां नहीं करते हैं। अन्य चिंताजनक संकेतक भी हैं-'पेय एवं प्रसंस्कृत खाद्य' पर खर्च का हिस्सा शहरी और ग्रामीण भारत में वर्ष 2011-12 के कुल मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग खर्च (एमपीसीई) के 7.9 फीसदी से बढ़कर 9.4 फीसदी हो गया है। वर्ष 1999-2000 में यह आंकड़ा 4.19 फीसदी था। इसके साथ ही पिछले दशक की इसी अवधि में ग्रामीण भारत में पान, तंबाकू एवं अन्य नशीले पदार्थों पर खर्च 3.21 फीसदी से बढ़कर 3.70 फीसदी हो गया है। वर्ष 1999-2000 में यह आंकड़ा 2.87 फीसदी था। इन आंकड़ों से रुझान स्पष्ट हैं।
भारतीय शहरों का आहार संबंधी आंकड़ा तो और भी चौंकाने वाला है। नवीनतम अनुमानों के अनुसार, शहरी भारत में कुल मासिक उपभोग खर्च का लगभग 11 फीसदी प्रसंस्कृत खाद्य पर खर्च होता है। यह तब हो रहा है, जब भारत जीवन-शैली से जुड़ी बीमारियों से संबंधित महामारी की ओर बढ़ रहा है, जो कुछ अंश तक खराब आहार के कारण होता है। नवीनतम घरेलू उपभोग खर्च सर्वेक्षण ग्रामीण एवं शहरी, दोनों क्षेत्रों में बढ़ते चिकित्सीय उपचार (अस्पतालों में भर्ती और गैर-भर्ती, दोनों इलाजों पर) खर्च को दर्शाता है। स्वास्थ्य पैरोकार चेतावनी दे रहे हैं कि खराब आहार हमारे स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक है। वे बेहतर विनियमन की जरूरत बताते हैं, जिसमें व्यवहार परिवर्तन के साथ पैक लेबलिंग एवं उपभोक्ता जागरूकता शामिल हैं।
नवीनतम उपभोक्ता सर्वे से यह भी पता चलता है कि अति-प्रसंस्कृत खाद्य का उपभोग देश के शहरी एवं ग्रामीण, दोनों इलाकों में बढ़ा है। आहार-शैली में बदलाव का भारत के तीव्र आर्थिक विकास से गहरा संबंध है। कई अध्ययनों में रेखांकित किया गया है कि अति-प्रसंस्कृत खाद्य जीवन के प्रारंभिक चरण में गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) के लिए एक प्रमुख जोखिम कारक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने 2023 की अपनी रिपोर्ट में रेखांकित किया कि 'नमकीन स्नैक्स की उच्च वृद्धि दर चिंता का एक प्रमुख कारण है, क्योंकि ऐसे खाद्य पदार्थों की बढ़ती खपत से उपभोक्ताओं में उच्च रक्तचाप और अन्य एनसीडी के जोखिम बढ़ सकते हैं।'
द ग्रोथ ऑफ अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स इन इंडियाः एन एनालिसिस ऑफ ट्रेंड्स, इश्यूज, ऐंड पॉलिसी रिकमेंडेशन शीर्षक डब्ल्यूएचओ रिपोर्ट में भी बताया गया है कि 'खुदरा बिक्री की मात्रा के मामले में तैयार और सुविधाजनक भोजन उपश्रेणी में सॉस/ड्रेसिंग/मसालों का वर्चस्व है, इसके बाद इंस्टेंट नूडल्स और रेडी-टू-ईट (आरटीई) खाना पकाने की सामग्री का स्थान है। ये उत्पाद अक्सर चीनी, नमक और संतृप्त वसा से भरपूर होते हैं, जिसके कारण इनका नियमित आधार पर उपभोग ठीक नहीं है। खुदरा बिक्री मूल्य के संदर्भ में इन श्रेणियों की 2021 में बाजार हिस्सेदारी 90 फीसदी थी, जो 2011 में 88 फीसदी थी।'
इसके अलावा, उच्च शर्करा और उच्च ग्लाइसेमिक इंडेक्स (कार्बोहाइड्रेट वाले आहार की पाचन एवं एक निश्चित समयावधि में शुगर लेबल नापने का तरीका) वाले नाश्ते का अनाज भी चिंता के विषय हो सकते हैं, क्योंकि भारत में मधुमेह के रोगियों की संख्या बढ़ रही है। उच्च ग्लाइसेमिक इंडेक्स के परिणामस्वरूप रक्त शर्करा (ब्लड शुगर) के स्तर में अचानक वृद्धि हो सकती है, जिससे मधुमेह रोगियों के लिए स्वास्थ्य खतरा पैदा हो सकता है। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि भारत में छोटे बच्चों और किशोरों में ब्लड शुगर का स्तर सामान्य से बहुत अधिक होने के मामलों में भी भारी वृद्धि हो रही है।
एरिक श्लॉसर ने 2001 में प्रकाशित अपनी पुस्तक फास्ट फूड नेशनः द डार्क साइड ऑफ द ऑल-अमेरिकन मील में अमेरिका के फास्ट फूड उद्योग के स्याह पक्ष को दर्शाया है, कि कैसे इसने अमेरिका के परिदृश्य को बदल दिया, अमीर और गरीब के बीच की खाई को चौड़ा कर दिया, मोटापे की महामारी को बढ़ावा दिया और दुनिया भर में खाद्य उत्पादन में बदलाव लाया। भारत को इसे ध्यान में रखना चाहिए।