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समाज: ट्रांसजेंडर बच्चों के लिए शिक्षा चुनौतीपूर्ण, रवैये को बदलने की जरूरत
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अमर उजाला
विस्तार
स्कूली स्तर पर ट्रांसजेंडर बच्चों के अनुकूल माहौल बनाने और उन्हें समावेशी शिक्षा से जोड़ने के लिए केंद्र सरकार जल्द ही एक नया अभियान शुरू करने की तैयारी में है। इससे आम बच्चों की तरह ट्रांसजेंडर बच्चों का भी स्कूल जाने का सपना पूरा हो सकेगा। इन्हें भी शिक्षा का अधिकार कानून के अंतर्गत पढ़ने का अधिकार है। वैसे ट्रांसजेंडरों को रोजगार और पढ़ाई में अवसर दिए जा रहे हैं, पर अब स्कूली शिक्षा में इन्हें शामिल करने और इनमें समानता का भाव विकसित करने की कोशिशें तेज हो रही हैं। एनसीईआरटी द्वारा ट्रांसजेंडर बच्चों की स्कूल में पढ़ाई और स्कूल स्टाफ का इन बच्चों के प्रति रवैये को बदलने, निष्पक्षता और सुधार करने के लिए निर्देश जारी किए गए हैं।
एक अध्ययन के मुताबिक, अभी देश में ट्रांसजेंडरों की संख्या करीब पांच लाख है। इनमें से करीब एक लाख ट्रांसजेंडर 12 से 16 साल की उम्र के बीच हैं, जो स्कूलों में पढ़ाई कर सकते हैं। पर इनमें से गिनती के ही बच्चों को शिक्षा मिल पा रही है। राष्ट्रीय साक्षरता दर 74 फीसदी है, पर ट्रांसजेडर समुदाय में साक्षरता दर मात्र 46 फीसदी ही है।
केरल डेवलपमेंट सोसाइटी द्वारा दिल्ली और उत्तर प्रदेश में किए गए अध्ययन से पता चलता है कि 28 प्रतिशत ट्रांसजेंडर छात्रों को स्कूलों में उत्पीड़न झेलना पड़ा। 52 प्रतिशत छात्रों को उनके सहपाठियों ने परेशान किया। यही नहीं, 12 प्रतिशत छात्रों ने कहा कि अध्यापकों ने उनका उत्पीड़न किया। 13 प्रतिशत छात्रों ने यौन उत्पीड़न की शिकायत की। 62 प्रतिशत ने माना कि उनका मौखिक उत्पीड़न हुआ है। इन्हीं वजहों से ट्रांसजेंडर बच्चे स्कूलों से बाहर हैं। वर्ष 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए देश में ट्रांसजेंडर को थर्ड जेंडर यानी तीसरे लिंग की मान्यता दी थी। उस फैसले के बाद अब हर जगह पुरुष और महिला के साथ तीसरे जेंडर का कॉलम भी होता है।
एनसीईआरटी ने जो नए दिशा-निर्देश तैयार किए हैं, उनमें ट्रांसजेंडर समावेशी पाठ्यक्रम, उनके लिए सुरक्षित शौचालय सुविधाएं तथा लैंगिकता आधारित हिंसा को रोकने के उपायों को शामिल किया गया है। एनसीईआरटी के प्रारूप में जेंडर न्यूट्रल व्यवस्था लागू करने का सुझाव है। ट्रांसजेंडर समुदाय के प्रति आम लोगों की सोच बदलने और उन्हें जागरूक करने के लिए इसे तैयार किया गया है। नया प्रारूप ट्रांसजेंडर छात्रों के संघर्ष को उजागर करता है और सतत कार्यशालाएं, आउटरीच प्रोग्राम, जेंडर न्यूट्रल पोशाक जैसे सुझावों पर जोर देता है। हालांकि इस नए प्रारूप में जाति और पितृसत्ता के मुद्दे पर चुप्पी बरकरार है।
बेशक देश में ट्रांसजेंडर बच्चों के लिए शिक्षा चुनौतीपूर्ण है, लेकिन उनकी शिक्षा के सार्थक प्रयास भी हो रहे हैं। कोच्चि में ‘सहज इंटरनेशनल’ स्कूल की शुरुआत की गई है। यह पहल ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए उम्मीद की रोशनी जैसी है। इस वैकल्पिक लर्निंग सेंटर की शुरुआत नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन लर्निंग के सहयोग से की गई है। यहां बीच में पढ़ाई छोड़ देने वाले ट्रांसजेंडर अपनी पढ़ाई जारी रख सकते हैं और दसवीं-बारहवीं की परीक्षा दे सकते हैं। वहीं तमिलनाडु की मनोनमनियम सुंदरनार यूनिवर्सिटी में अगर कोई ट्रांसजेंडर छात्र पढ़ाई के लिए पंजीकरण कराता है, तो उससे ट्यूशन फीस नहीं ली जाती है।
ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) बिल, 2019 उनके शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े हितों के बारे में बात जरूर करता है, लेकिन मात्र कुछ गिने-चुने ट्रांसजेंडरों ने संघर्ष कर शिक्षा, नौकरी या रोजगार हासिल किया है, जो अपवाद मात्र हैं। अब भी शिक्षा, प्रशिक्षण और कौशल के अभाव में ट्रांसजेंडरों को समाज में किसी तरह का काम मिल पाना मुश्किल है। देखना होगा कि आने वाले समय में स्कूली शिक्षा के समावेशन से किस तरह समाज की नकारात्मक मानसिकता और दृष्टिकोण में परिवर्तन लाया जा सकेगा।
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