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व्यापार: टैरिफ के जवाब में नए बाजार की खोज, भारत इसके लिए अपना रहा बहुआयामी रणनीति

Fri, 10 Oct 2025 07:10 AM IST
Ajay Bagga अजय बग्गा
Updated Fri, 10 Oct 2025 07:10 AM IST
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सार
अमेरिकी टैरिफ से उत्पन्न रणनीतिक अनिश्चितता के जवाब में भारत बातचीत, बाजार विविधीकरण और घरेलू समर्थन पर केंद्रित एक बहुआयामी रणनीति अपना रहा है। यह इसी रणनीति की ताकत है, जिसने ब्रिटिश प्रधानमंत्री को अब तक के सबसे बड़े व्यापारी बेड़े के साथ भारत आने के लिए आकर्षित किया है।
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Trade: India is adopting a multi-pronged strategy to find new markets in response to tariffs
डोनाल्ड ट्रंप, नरेंद्र मोदी। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन द्वारा 25 फीसदी शुल्क लगाने के बाद 25 फीसदी अतिरिक्त दंडात्मक शुल्क लगाने से भारतीय निर्यात बाजार पर काफी गहरा असर पड़ा है, जो फिलहाल आंकड़ों में भले न दिख रहा हो। इसके कारण दोनों देशों के बीच व्यापार एक जटिल चुनौती में बदल गया है, जबकि कभी मजबूत व्यापारिक संबंध था। कुछ भारतीय वस्तुओं पर 50 फीसदी तक शुल्क थोपे जाने से इसका प्रभाव कई क्षेत्रों में पहले से ही महसूस किया जाने लगा है, जिसने केंद्र सरकार और उद्योग जगत को तेजी से आर्थिक गिरावट को कम करने के लिए रणनीतिक कदम उठाने पर मजबूर किया है। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात साझेदार है. ऐसे में उच्च शुल्क ने विशेष रूप से श्रम-प्रधान क्षेत्रों में महत्वपूर्ण बाधाएं पैदा की हैं। समुद्री खाद्य (झींगा) निर्यात को सबसे ज्यादा झटका लगा है, क्योंकि अमेरिका भारतीय झींगे का सबसे बड़ा बाजार है। 



पारस्परिक व एंटी डंपिंग शुल्कों सहित बढ़ते टैरिफ के कारण भारतीय निर्यातकों को अलाभकारी मूल्यों का सामना करना पड़ रहा है। झींगों को भेजे जाने की प्रक्रिया धीमी हो गई है, जिसके कारण बिना बिके माल का भंडार जमा हो रहा है और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में बड़ी संख्या में रोजगार के नुकसान का जोखिम पैदा हो गया है। अमेरिकी खरीदार कथित रूप से वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं की तलाश कर रहे हैं। 


उच्च शुल्कों का सामना कर रहे तिरुपुर और सूरत जैसे विनिर्माण केंद्रों के निर्यातकों ने बताया कि वे प्रतिस्पर्धी मूल्य निर्धारण न कर पाने के कारण नए अमेरिकी ऑर्डर रोक रहे हैं। इससे रोजगार पर खतरा पैदा होता है और मौजूदा ऑर्डरों को बनाए रखने के लिए संघर्ष करना पड़ता है, और अक्सर नुकसान उठाना पड़ता है। अमेरिका के भारतीय हीरे और जड़ाऊ आभूषणों का सबसे बड़ा बाजार होने के नाते रत्न एवं आभूषण का क्षेत्र लड़खड़ा रहा है, और उद्योग निकाय 50 फीसदी टैरिफ को 'कयामत का दिन' बता रहे हैं। निर्माता अपने कारोबार को बनाए रखने के लिए दुबई और मेक्सिको जैसे वैकल्पिक विनिर्माण और व्यापार केंद्रों की तलाश कर रहे हैं। टैरिफ वृद्धि से भारत के ऑटो पार्ट्स निर्यात का लगभग आधा हिस्सा प्रभावित होगा, विशेष रूप से वाणिज्यिक वाहनों और भारी मशीनरी के कलपुर्जे, जिससे उन्हें अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले काफी नुकसान होगा।

टैरिफ से निर्यात में कमी आने का खतरा है, जिससे घरेलू अधिशेष पैदा होगा और कृषि उत्पादों की कीमतें गिर सकती हैं। बासमती चावल और कपास जैसी वस्तुएं अत्यधिक जोखिम में हैं, और शुरुआती अनुमानों से निर्यात में कमी और भविष्य में उत्पादन क्षेत्र में कमी का संकेत मिल रहा है। मजबूत घरेलू मांग, लचीले सेवा निर्यात और कुल जीडीपी में निर्यात की अपेक्षाकृत छोटी हिस्सेदारी के कारण भारत की जीडीपी वृद्धि पर समग्र रूप से मध्यम प्रभाव माना जा रहा है, पर रिजर्व बैंक और एडीबी जैसे प्रमुख संस्थानों ने 'टैरिफ के जोखिमों' का हवाला देते हुए विकास पूर्वानुमानों को घटाया है। अमेरिकी टैरिफ से उत्पन्न 'रणनीतिक अनिश्चितता' के जवाब में, भारत बातचीत, बाजार विविधीकरण और घरेलू समर्थन पर केंद्रित एक बहुआयामी रणनीति अपना रहा है। वाणिज्य मंत्रालय द्वारा व्यक्त भारत का आधिकारिक रुख 'रचनात्मक है, न कि आक्रामक', लेकिन साथ ही यह भी कहा गया है कि राष्ट्र 'न तो झुकेगा और न ही कभी कमजोर दिखेगा।'

गतिरोध को सुलझाने और टैरिफ को कम करवाने के लिए भारत लगातार अमेरिका के साथ बातचीत कर रहा है। अमेरिकी अधिकारियों ने संकेत दिया है कि व्यापार वार्ता महत्वपूर्ण चरण में है। यह वार्ता जटिल है, जिसमें व्यापार से जुड़े पारस्परिक टैरिफ और भारत द्वारा रूस से तेल खरीद जैसे दोहरे मुद्दे शामिल हैं।

भारत अमेरिका के साथ अमेरिकी कृषि और डेयरी उत्पादों के लिए बाजार पहुंच जैसे पेचीदा मुद्दों पर बात कर रहा है। नई दिल्ली अपने घरेलू किसानों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। समग्र निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार के लिए भारत अपनी टैरिफ संरचना को युक्तिसंगत बनाने का भी प्रयास कर रहा है। एक हो प्रमुख बाजार पर निर्भरता के जोखिमों को समझते हुए भारत अपनी दीर्घकालीन रणनीति के तहत बाजार और उत्पाद का विविधिकरण कर रहा है।

भारतीय निर्यातक तेजी से नए मंतव्यों का रुख कर रहे हैं। इसमें यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, जापान, पश्चिम एशिया, आसियान और अफ्रीका जैसे बाजारों के साथ गहरा जुड़ाव भी शामिल है। सरकार अपने उत्पादों के लिए तरजीही पहुंच सुनिश्चित करने की खातिर यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को अंतिम रूप दे रही है।

वैश्विक व्यापार व्यवस्था को सहयोगात्मक रूप से बहाल करने तथा वैकल्पिक व्यापार नेटवर्क बनाने के लिए ब्रिक्स जैसे संगठनों के साथ घनिष्ठ संबंध बनाने की वकालत की जा रही है। सेवा क्षेत्र, विशेषकर आईटी और सॉफ्टवेयर, जो नए अमेरिकी टैरिफ से काफी हद तक अछूते हैं, अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण बफर प्रदान करते रहेंगे। कमजोर उद्योगों पर तत्काल प्रभाव को कम करने के लिए सरकार लक्षित राहत उपायों पर विचार कर रही है। हालांकि, कुछ निर्यातकों को बड़े वित्तीय सहायता पैकेज की उम्मीद थी, पर सरकार लक्षित हस्तक्षेप कर रही है।

विचाराधीन उपायों में कार्यशील पूंजी तक पहुंच में सुधार के लिए छोटे ऋण पैकेज, ब्याज मुक्त ऋण, और लालफीताशाही कम करने तथा निर्यातकों की लागत कम करने के लिए नीतिगत सुधार शामिल हैं। उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना और व्यापक 'आत्मनिर्भर भारत' पहल जैसी नीतियों की जरूरत बढ़ रही है। इसका लक्ष्य उच्च तकनीक वाले आयातों का विकल्प बनने के लिए तकनीकी और विनिर्माण क्षमताओं का विकास करना और लचीली वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में एक ज्यादा जरूरी कड़ी बनना है, जिससे पारंपरिक केंद्रों से हटकर विविधीकरण की इच्छुक कंपनियों को आकर्षित किया जा सके। भारत की मजबूत घरेलू खपत और मजबूत सार्वजनिक/निजी निवेश को आधारभूत ताकत के रूप में देखा जा रहा है, जो अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों को सहने में सक्षम बनाएगी।
भारत की रणनीति की सफलता न केवल उसके प्रमुख निर्यात उद्योगों के तात्कालिक भाग्य को निर्धारित करेगी, बल्कि एक अधिक लचीले और रणनीतिक रूप से वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में उभरने की उसकी क्षमता को भी निधर्धारित करेगी।

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