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संचित सोने को पूंजी बनाने की दिशा में

Fri, 17 Apr 2015 08:22 PM IST
जयंतीलाल भंडारी
जयंतीलाल भंडारी Updated Fri, 17 Apr 2015 08:22 PM IST
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Towards converting diposit gold in capital

हाल ही में केंद्र सरकार ने संकेत दिया है कि वह सोने का आयात कम करने के लिए मंदिरों में जमा स्वर्ण भंडार बाजार में लाने की योजना प्रस्तुत करने की तैयारी में है। उसकी योजना है कि मंदिर के ट्रस्ट अपना सोना सरकार के पास रखेंगे और बदले में ब्याज पाएंगे। सरकार द्वारा इस सोने को पिघलाकर इसे सोने के व्यापारियों और स्वर्णकारों को दिया जाएगा, ताकि वे इसका इस्तेमाल आभूषण बनाने में कर सकें। इससे देश में सोने की मांग पूरी करने में मदद मिलेगी और आयात पर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा भी बचेगी। ऐसी योजना से मंदिरों के ट्रस्टों को दोहरा फायदा होने की उम्मीद है। एक, मंदिरों के ट्रस्ट को बैंकों में सोना रखने पर अच्छा ब्याज मिलेगा, और दूसरा उन्हें सोने की सुरक्षा पर बहुत कम खर्च करना होगा।

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देश के प्राचीन मंदिरों में सोना आभूषणों, सिल्लियों और सिक्कों के रूप में सदियों से संरक्षित है। सोने के इन भंडारों को तहखानों में छिपाया गया है, जिनमें से कुछ बहुत पुराने, तो कुछ आधुनिक पद्धति से बने हुए हैं। इन मंदिरों में तकरीबन तीन हजार टन सोना संचित होने का अनुमान है, जो अमेरिकी स्वर्ण भंडार के दो-तिहाई से भी ज्यादा है। कुछ साल पहले केरल के श्रीपद्मनाभ स्वामी मंदिर के तहखाने में सोने का बड़ा भंडार सामने आया था, जिसका मूल्य 20 अरब डॉलर आंका गया था। करीब दो सौ साल पुराने मुंबई के सिद्धिविनायक मंदिर में तकरीबन 158 किलो सोने का भंडार है, जिसका मूल्य कई करोड़ डॉलर है। मंदिर की सुरक्षा में तमाम खुफिया कैमरों के साथ ही 65 सुरक्षा अधिकारी भी लगे हैं।
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पिछले कई वर्षों से देश के मंदिरों और लोगों के पास संचित अनुत्पादक सोने को अर्थव्यवस्था के काम लाने और आयातित सोने पर निर्भरता घटाने के लिए दीर्घकालीन योजना की आवश्यकता अनुभव की जा रही थी। इसी परिप्रेक्ष्य में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सोने के मौद्रीकरण के लिए केंद्रीय बजट 2015-16 में एक प्रस्ताव रखा है। इसके माध्यम से वित्त मंत्री ने घरों में संचित सोने के पंजीकरण की ओर कदम बढ़ाने की पहल की है। अब यदि सरकार मंदिरों के सोने के पूंजीकरण की दिशा में आगे बढ़ती है, तो यह देश के आर्थिक इतिहास में अभूतपूर्व कदम होगा। उल्लेखनीय है कि वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (डब्ल्यूजीसी) और उद्योग चैंबर फिक्की द्वारा दिसंबर, 2014 में प्रकाशित संयुक्त रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि अब सरकार को ऐसे नीतिगत प्रयास करने की जरूरत है, जिनसे घरों और मंदिरों में संचित किया हुआ अनुत्पादक सोना अर्थव्यवस्था के काम आ सके। इसमें सरकार को सोने पर राष्ट्रीय नीति बनाने के लिए कहा गया है, जिससे घरों और मंदिरों में संचित करीब 22 हजार टन सोने की गतिशीलता बढ़ाई जा सके और सोने को बाजार में लाकर अर्थव्यवस्था के काम में लाया जा सके। उल्लेखनीय है कि भारत दुनिया में सोने का सबसे बड़ा आयातक और सबसे बड़ा उपभोक्ता देश भी है। यहां सालाना 800 से 1,000 टन सोने का आयात होता है, जो आयात मूल्य के दृष्टिकोण से कच्चे तेल के बाद दूसरे नंबर पर है। यहां सोने के प्रति लोगों का आकर्षण किसी से छिपा नहीं है।
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बहरहाल, मंदिरों के सोने को सोना बचत खाते में जमा कराने से अनुत्पादक सोने को भी अर्थव्यवस्था के काम में लाया जा सकेगा। अनुत्पादक सोने के अधिकतम उत्पादक उपयोग से विकास को नई गति मिल सकेगी। आखिर नई सरकार भी तो विकास का वायदा कर केंद्र की सत्ता तक पहुंची है।

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