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मंथन: सांस लेने के अधिकार को संविधान के मूल अधिकार में शामिल करने का समय, फौरी राहत से कुछ नही होगा

CBP Srivastava सीबीपी श्रीवास्तव
Updated Tue, 03 Dec 2024 06:36 AM IST
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सार
बच्चों की ऑनलाइन या हाइब्रिड शिक्षा की अस्थायी व्यवस्था से फौरी तौर पर भले ही कुछ बच्चों को ज्यादा नुकसान से बचा लिया जाए लेकिन आने वाली पीढ़ियों का क्या? अब समय आ गया है कि सांस लेने के अधिकार को संविधान के मूल अधिकार में उल्लेख हो। 
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Time to include the right to breathe as a fundamental right of the Constitution.
वायु प्रदूषण - फोटो : Adobe stock

विस्तार

हालांकि भारत के उच्चतम न्यायालय ने समय-समय पर पर्यावरणीय समस्याओं और उनके निवारण से संबंधित अधिकारों का सांविधानीकरण किया है, लेकिन कदाचित अब यह समय आ गया है, जब स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार को संविधान के मूल अधिकार के रूप में स्पष्ट रूप से उल्लेखित किया जाए।



देश के शीर्ष न्यायालय ने एम. के. रणजीत सिंह बनाम भारत संघ, 2024 मामले में जलवायु परिवर्तन के हानिकारक प्रभावों के विरुद्ध अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार के अर्थ में शामिल अवश्य किया है, लेकिन स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार का स्पष्ट उल्लेख ही ऐसे अधिकारों के दावों को मजबूती प्रदान करेगा।


यहां यह उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि न्यायपालिका द्वारा मान्यता प्राप्त मूल अधिकारों का दावा तभी किया जा सकता है, जब उनका सीधा संबंध संविधान में उल्लिखित किसी मूल अधिकार से हो। हालांकि सामान्य व्यक्तियों को अपने मूल अधिकारों के दावे की जटिल प्रक्रिया की समझ नहीं हो पाती। अगर ऐसा अधिकार स्पष्ट रूप से संविधान में उल्लिखित हो, तो उसके प्रति लोगों को जागरूक बनाना भी अपेक्षाकृत सरल होगा।

गौरतलब है कि दिल्ली में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) गंभीर श्रेणी में चला गया था, हालांकि अब इसके स्तर में थोड़ी कमी आई है। गुणवत्ता नियामक उद्देश्यों के लिए कणों को उनके व्यास द्वारा परिभाषित किया जाता है। 10 माइक्रॉन या उससे कम व्यास वाले (पीएम10) धूलकण फेफड़ों में सांस के जरिये जा सकते हैं और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं। फाइन पार्टिकुलेट मैटर को ऐसे कणों के रूप में परिभाषित किया जाता है, जिनका व्यास 2.5 माइक्रॉन या उससे कम होता है (पीएम2.5)। इसलिए पीएम 2.5 में पीएम10 का एक हिस्सा शामिल होता है। कणों का एक विशेष वर्ग डीजल के ज्वलन से उत्पन्न उत्सर्जन में मौजूद होता है, जिसे डीजल कण पदार्थ (डीपीएम) कहते हैं। 90 प्रतिशत से अधिक डीपीएम का व्यास एक माइक्रॉन से कम होता है (मानव बाल के व्यास का लगभग 1/70वां हिस्सा), और इस प्रकार यह पीएम 2.5 का एक उपसमूह है।

इसी संदर्भ में केंद्र की प्रदूषण निगरानी संस्था वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) ने ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (जीआरएपी) में संशोधन करते हुए योजना के चरण 3 और चरण 4 के तहत दिल्ली और एनसीआर के जिलों में स्कूलों को बंद करना अनिवार्य कर दिया है। इससे पहले, इन उपायों को लागू करने का निर्णय राज्य सरकारों के विवेक पर था। जीआरएपी के चरण 3 के अंतर्गत एक अतिरिक्त निर्देश के तहत अब राज्य सरकारों को दिल्ली और एनसीआर के जिलों में सार्वजनिक कार्यालयों और नगर निकायों के समय को अलग-अलग करना होगा। मेनका गांधी बनाम भारत संघ, 1978 मामले में न्यायालय ने स्वच्छ पर्यावरण को 'प्राण' शब्द के अर्थ में शामिल किया था, लेकिन 1991 में सुभाष कुमार गुप्त बनाम बिहार राज्य का मामला अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें ही न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि संविधान में दिए गए जीवन के अधिकार का सही उपयोग करने के लिए स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार में प्रदूषण-रहित जल और वायु का अधिकार शामिल होगा।

गौरतलब है कि 42वें संशोधन अधिनियम, 1976 से संविधान में राज्य और नागरिक, दोनों के लिए पर्यावरण संरक्षण का कर्तव्य जोड़ा गया था, लेकिन यह भी विदित है कि जब तक कर्तव्यों को अधिकारों के साथ सीधे नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक उनके निर्वहन के लिए किसी को जवाबदेह बना पाना आसान नहीं होगा। शायद इसी कारण उच्चतम न्यायालय द्वारा पूर्ण जवाबदेही के सिद्धांत की व्याख्या (एम. सी. मेहता बनाम भारत संघ, 1987) किए जाने के बाद भी अब तक सही अर्थ में न तो राज्य और न ही नागरिकों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जवाबदेह बनाया जा सका है।

पूर्ण जवाबदेही के सिद्धांत को व्यावहारिक बनाने के लिए राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 17 में न्यायाधिकरण को आपदाओं के संदर्भ में कार्रवाई आरंभ करने की शक्ति दी गई है, लेकिन पर्यावरणीय अधिकारों का जिस प्रकार से उल्लंघन हो रहा है, उसे देखते हुए न्यायाधिकरण की शक्तियों का विस्तार आपदाओं से आगे बढ़कर होना चाहिए। फिलहाल हमारे सामने जो एक गंभीर प्रश्न है, वह बालकों के अधिकारों से संबंधित है। चाहे हाल में हो या पहले की वायु गुणवत्ता सूचकांक की भयावह स्थिति हो, हम स्कूलों को बंद कर अपनी जवाबदेही से स्वयं को मुक्त कर लेते हैं। हमने 'अंतर-पीढ़ी समता' की संकल्पना पर गौर नहीं किया है। वर्तमान पीढ़ी के साथ-साथ भविष्य की पीढ़ी की संसाधनीय क्षमता बचाए रखना ही अंतर-पीढ़ी समता है। बिना इसके सतत विकास का हमारा दावा खोखला साबित होगा।

न्यायालय ने गणेश वुड प्रोडक्ट्स बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य, 1996 मामले में यह स्पष्ट बता दिया था कि अंतर-पीढ़ी समता सतत विकास के केंद्र में है। हम चाहे कितना भी त्वरित आर्थिक विकास कर लें या विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की राह पर दौड़ें, लेकिन पर्यावरण संरक्षण के बिना हमारा अस्तित्व संकटग्रस्त बना रहेगा। सतत विकास के विषय में न्यायालय ने एक बहुचर्चित मामले वेल्लोर सिटीजन वेलफेयर फोरम बनाम भारत संघ, 1996 में कहा कि सतत विकास का सिद्धांत तभी सफल होगा, जब प्रदूषण फैलाने वाले की पूर्ण जवाबदेही हो और एहतियात के तौर पर पर्यावरण संरक्षण के सभी कार्यों को प्राथमिकता दी जाए।

दूसरे शब्दों में, एहतियाती सिद्धांत और प्रदूषक भुगतान सिद्धांत के बीच संतुलन होना चाहिए। इस पृष्ठभूमि में संविधान के अनुच्छेदों 48 ए तथा 51 ए (जी) के सामाजीकरण के लिए स्वस्थ और स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार का सांविधानीकरण करना होगा, तभी मानव-प्रकृति संबंधों का संरक्षण संभव होगा।

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