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3 Years Of Taliban Rule: तालिबानी कुशासन के तीन साल, अफगान लोगों के लिए एक दुःस्वप्न की तरह
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Taliban Rule
- फोटो :
Amar Ujala
विस्तार
अफगानिस्तान की सत्ता में तालिबान को लौटे तीन साल हो गए हैं, लेकिन इस दौरान वे कई मोर्चों पर बुरी तरफ विफल साबित हुए हैं। तालिबानी शासन महिलाओं के दमन, पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान से बिगड़ते संबंधों और अंतरराष्ट्रीय मान्यता के लिए निरर्थक संघर्ष के लिए पहचाना जाता रहा है। यही नहीं, तालिबानी शासन अफगान लोगों के लिए एक दुःस्वप्न की तरह है।
काबुल में तालिबानी शासन को महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, जिसने उसके गवर्नेंस मॉडल की सीमाओं को उजागर कर दिया है। इन मुद्दों को सुलझाने की उसकी क्षमता ही अफगानिस्तान की भावी स्थिरता और सत्ता में तालिबान की दीर्घजीविता को निर्धारित करेगी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग होना, आर्थिक संकट, सुरक्षा जोखिम और आंतरिक विभाजन उसके लिए महत्वपूर्ण बाधाएं हैं, जिनसे आने वाले वर्षों में तालिबान को निपटना होगा। अगस्त, 2021 में काबुल पर कब्जा करने के बाद विभिन्न चुनौतियों ने उनके शासन और राजनीतिक वैधता की परीक्षा ली है। सत्ता में तीन साल रहने के बाद भी तालिबान के सामने कई प्रमुख मुद्दे बरकरार हैं।
तालिबान सरकार को अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने अभी तक मान्यता नहीं दी है, जिससे औपचारिक राजनयिक संबंध बनाने और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणालियों तक पहुंचने में उसे मुश्किल हो रही है। अफगानिस्तान विदेशी सहायता पर बहुत ज्यादा निर्भर है, जो तालिबान के सत्ता में आने के बाद से काफी कम हो गई है। प्रतिबंधों, खासकर अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों ने देश की अर्थव्यवस्था को और भी ज्यादा प्रभावित किया है।
महिला अधिकारों पर तालिबान की प्रतिबंधात्मक नीतियों, खासकर एक निश्चित उम्र के बाद लड़कियों की शिक्षा पर प्रतिबंध, की व्यापक निंदा हुई है, जिसने शासन को वैश्विक समुदाय से अलग-थलग कर दिया है। इससे घरेलू अशांति और असंतोष भी बढ़ा है। तालिबान द्वारा सख्त शरिया कानून लागू करने से मानवाधिकारों के हनन की चिंताएं बढ़ गई हैं, जिसमें सार्वजनिक रूप से फांसी देना और अंग-भंग करना शामिल है। इन प्रथाओं की वैश्विक स्तर पर आलोचना की गई है और इससे अफगान आबादी में डर और आक्रोश पैदा हुआ है। अफगान अर्थव्यवस्था में भारी गिरावट आई है, मुद्रा का मूल्य कम हो रहा है और मुद्रास्फीति बढ़ रही है। बैंकिंग प्रणाली ढहने के कगार पर है और देश में नकदी की भारी कमी है। व्यापक बेरोजगारी और गरीबी ने मानवीय संकट को जन्म दिया है। कई अफगान लोग बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में असमर्थ हैं और खाद्य असुरक्षा व्याप्त है। इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रांत (आईएसआईएस-के) लगातार खतरा बना हुआ है, जो पूरे मुल्क में घातक हमले कर रहा है। इन हमलों से तालिबान की सुरक्षा क्षमता पर सवाल उठ रहे हैं। तालिबान के भीतर भी मतभेद हैं, जिसमें अलग-अलग गुट सत्ता के लिए होड़ कर रहे हैं। ये विभाजन अंदरूनी कलह को जन्म दे सकते हैं और उनके नियंत्रण को अस्थिर कर सकते हैं।
अफगानिस्तान अफीम का एक प्रमुख उत्पादक है, और तालिबान पर नशीली दवाओं के व्यापार से मुनाफा कमाने का आरोप लगाया गया है। इसने अंतरराष्ट्रीय जांच और प्रतिबंधों को भी आकर्षित किया है। हालांकि तालिबान ने अफीम उत्पादन पर अंकुश लगाने की कसम खाई है, लेकिन अवैध अर्थव्यवस्था अब भी फल-फूल रही है। पाकिस्तान के साथ तालिबान के रिश्ते तनावपूर्ण रहे हैं, खास तौर पर सीमा मुद्दों और अफगानिस्तान में पाकिस्तानी तालिबान (टीटीपी) की मौजूदगी के कारण। इसी तरह, ईरान के साथ रिश्ते सांप्रदायिक मतभेदों और जल विवादों के कारण जटिल हैं। तालिबान ने चीन और रूस के साथ संबंध बनाने की कोशिश की है, लेकिन दोनों के ही अफगानिस्तान में रणनीतिक हित हैं। इसलिए दीर्घकालिक प्रतिबद्धताओं को लेकर संशय है। हालांकि किसी भी अरब देश ने तालिबान को अब तक मान्यता नहीं दी है, लेकिन वे तालिबान शासन के साथ व्यावहारिक रूप से जुड़े हुए हैं, मानवीय सहायता प्रयासों के साथ क्षेत्रीय स्थिरता संबंधी चिंताओं को संतुलित कर रहे हैं।
अफगानिस्तान दुनिया के सबसे बुरे मानवीय संकटों में से एक का सामना कर रहा है, जहां लाखों लोग भूख और ढहती स्वास्थ्य सेवा प्रणाली का सामना कर रहे हैं। तालिबान इन मुद्दों को हल करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहायता संगठनों पर निर्भर है। कई अफगान भागकर पड़ोसी देशों में या यूरोप चले गए हैं। इस प्रतिभा पलायन ने देश में सुधार की संभावनाओं को और कमजोर कर दिया है। तालिबान के केंद्रीकृत शासन मॉडल में सत्ता कुछ ही नेताओं के हाथों में केंद्रित है, जिससे अक्षमता और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला है। इससे पूरे देश में नीतियों को प्रभावी ढंग से लागू करना मुश्किल हो गया है।
तालिबान के साथ भारत के रिश्ते जटिल हैं और भारत सतर्कतापूर्वक कदम बढ़ा रहा है। भारत ने अफगानिस्तान की लोकतांत्रिक सरकारों का समर्थन किया है और पाकिस्तान स्थित आतंकी समूहों के साथ तालिबान के रिश्तों को लेकर चिंतित है। हालांकि, नई दिल्ली सावधानीपूर्वक तालिबान के संबंध बनाए हुए है, अफगानिस्तान की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में निवेश सहित उसके हितों की रक्षा पर ध्यान केंद्रित किया गया है। अफगानिस्तान में पाकिस्तान के प्रभाव को संतुलित करने की इच्छा से भारत की भागीदारी सीमित है।
तालिबानी शासन ने अफगानिस्तान को फिर से अंधकार युग में धकेल दिया है, जहां महिलाओं को उनकी दमनकारी नीतियों का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त करने में तालिबान की असमर्थता ने मुल्क को अलग-थलग करके आर्थिक रूप से कमजोर बना दिया है। कभी तालिबान का समर्थन करने वाले पाकिस्तान से भी उनके रिश्ते बिगड़ गए हैं, जिससे परेशानियां बढ़ गई हैं।
कुल मिलाकर, तालिबान वैधता के लिए संघर्ष कर रहा है, लेकिन उसका शासन अत्याचार और विफलता का प्रतीक बना हुआ है। दुनिया देख रही है कि तालिबान शासन के तहत अफगानिस्तान अराजकता और निराशा में डूब रहा है, और बेहतर भविष्य की कोई उम्मीद नहीं है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अफगान लोगों, खासकर महिलाओं के साथ एकजुट होकर खड़ा होना चाहिए, जिन्होंने इस क्रूर शासन का खामियाजा भुगता है।