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मछुआरे हैं, आतंकवादी नहीं
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भारतीय मछुआरों पर नौसेना के बर्बर हमले को सही ठहराते हुए श्रीलंका के प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने जो टिप्पणी की है, उस पर खासकर तमिलनाडु में तूफान आ गया है। चेन्नई स्थित तमिल न्यूज चैनल, थांती टीवी, को दिए इंटरव्यू में विक्रमसिंघे ने कहा है, 'अगर कोई मेरा घर तोड़कर उसमें घुसने की कोशिश करता है, तो मैं उसे गोली मार सकता हूं। अगर वह मर जाता है...तो भी कानून मुझे ऐसा करने की अनुमति देता है।...जहां तक मछुआरों का मामला है, तो मेरे विचार इस मुद्दे पर बेहद कठोर हैं। यह हमारा जलक्षेत्र है...।'
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विक्रमसिंघे की इन टिप्पणियों पर राज्य के राजनेताओं और मछुआरा समुदाय के बीच बेहद तीखी प्रतिक्रिया हुई है, तो इसे समझा जा सकता है। इन्होंने श्रीलंका के प्रधानमंत्री की आलोचना तो की ही है, केंद्र से भी कहा है कि वह श्रीलंका के इस रुख पर चुप न रहे। चेन्नई स्थित एक वरिष्ठ पत्रकार और मछुआरों के मामलों पर पिछले करीब दो दशक से नजर रखे हुए भरत कुमार कहते हैं, 'रानिल विक्रमसिंघे की इन बेहद तीखी और अर्थपूर्ण टिप्पणियों पर गौर करने की जरूरत है। ये टिप्पणियां उस समय की गई हैं, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी पहली श्रीलंका यात्रा की तैयारी कर रहे हैं। यह देखने की जरूरत है कि प्रधानमंत्री मोदी श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना के साथ मुलाकात के दौरान यह मुद्दा किस तरह उठाते हैं।'
रामेश्वरम के एक मछुआरे सत्या कहते हैं, 'हम आतंकवादी नहीं हैं। जीविका के लिए समुद्र में जाना हम मछुआरों का काम है। पर समुद्र के बीचोंबीच हम अंतरराष्ट्रीय सीमा की शिनाख्त नहीं कर सकते। ऐसे में, हम कई बार अनायास श्रीलंका के जलक्षेत्र में चले जाते हैं। यह मानवीय भूल है। ऐसे में मछुआरों पर हमला करना या उन्हें मार डालना अमानवीय ही होगा।'
मद्रास हाई कोर्ट के एक वकील एम तमिलेसवम की चिंता अलबत्ता दूसरी है। वह कहते हैं, 'भारत और श्रीलंका के नेता दोस्ताना रिश्ते का दम भरते हैं। फिर हमारे मछुआरों पर हमला क्यों होता है? अगर ये मछुआरे सीमा पार कर श्रीलंका के जलक्षेत्र में पहुंचते ही हैं, तो श्रीलंकाई नौसेना उन्हें गिरफ्तार करे, और उनके खिलाफ मुकदमा चलाया जाए। उन पर गोली चलाना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।'
मानवाधिकार कार्यकर्ता एस श्रीनिवासन तो मछुआरों की गिरफ्तारी तक के खिलाफ हैं। उनका कहना है कि ये मछुआरे दैनिक मजदूर होते हैं और इनकी आय के साधन भी सीमित हैं। ऐसे में, अगर इनकी गिरफ्तारी होती है और इनके नाव जब्त कर लिए जाते हैं, तो इसका खामियाजा इनके परिवार को भुगतना पड़ेगा। इस मामले को कानूनी नुक्ते से नहीं, मानवीय नजरिये से देखने की जरूरत है। अगर हमारे मछुआरे श्रीलंका के जलक्षेत्र में जाते भी हैं, तो वहां की नौसेना चेतावनी देते हुए उन्हें लौट जाने के लिए मजबूर कर सकती है। किसी भी देश में सुरक्षा बल निर्दोषों की जान बचाने के लिए होते हैं, उन्हें मार डालने के लिए नहीं।
इस बीच विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने, जो प्रधानमंत्री के दौरे से पहले श्रीलंका पहुंच चुकी हैं, वहां के प्रधानमंत्री के साथ इस मुद्दे पर बातचीत की है। उन्होंने रानिल विक्रमसिंघे से कहा है कि चूंकि यह मामला अनेक लोगों की जीविका से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसे दोनों तरफ के मछुआरों की मानवीय जरूरत के लिहाज से देखना चाहिए। विदेश मंत्रालय इस मामले को इतालवी नौसैनिकों वाले मामले से अलग करके देख रहा है। उसके अनुसार, इटली का मामला कानूनी मामला है, जबकि यह मुद्दा जीविका और मानवीय मदद से संबंधित है।
हमारे विदेश मंत्रालय को दोनों मुद्दों को अलग-अलग इसलिए परिभाषित करना पड़ा, क्योंकि विक्रमसिंघे ने अपने इंटरव्यू में इतालवी नौसैनिकों की गिरफ्तारी का मुद्दा उठाया था। उन्होंने कहा था, आपने इतालवी नौसैनिकों को क्यों पकड़ा था? आप कहते हैं कि इटली से आपके दोस्ताना रिश्ते हैं। तो इतालवी नौसैनिकों के प्रति वैसी उदारता दिखाइए, जैसी उदारता की आप हमसे उम्मीद करते हैं। अगर भारत चाहता है कि हम उनके मछुआरों के प्रति उदारता दिखाएं, तो पहले भारत को गिरफ्तार इतालवी नौसैनिकों के प्रति भी वैसी ही उदारता का परिचय देना होगा। विक्रमसिंघे यह तो मानते हैं कि मछुआरों के इस मुद्दे को दोनों देशों को मिलकर सुलझाना पड़ेगा, लेकिन वह दोटूक कहते हैं कि श्रीलंकाई जलक्षेत्र में भारतीय मछुआरों को महाजाल इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं मिलेगी।
भारत और श्रीलंका के रिश्ते बहुत उत्साहित करने वाले कभी नहीं रहे हैं। खासकर स्वर्गीय राजीव गांधी के श्रीलंका के गृहयुद्ध में हस्तक्षेप के बाद वहां भारत के प्रति पहले जैसा रवैया नहीं दिखता। पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे के राष्ट्रपति काल के आखिरी दौर में तो दोतरफा रिश्ता बहुत ही खराब दौर में पहुंच गया था। लेकिन अब जब भारत और श्रीलंका, दोनों देशों में नई सरकार के आने के बाद मोदी और सिरिसेना के बीच बेहतर संबंधों की उम्मीद की जा रही थी, ठीक तभी रानिल विक्रमसिंघे का भारतीय मछुआरों के प्रति कठोर रुख अवरोधक के तौर पर आया है। ऐसे में, जाहिर है, नरेंद्र मोदी की श्रीलंका यात्रा पर अनेक लोगों की नजर टिकी होगी। स्वर्गीय राजीव गांधी के 1987 के दौरे के बाद यह किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली श्रीलंका यात्रा होगी। यही नहीं, तमिल बहुल उत्तरी राज्य के युद्ध विध्वस्त जाफना और पूर्वी राज्य के त्रिंकोमाली का दौरा करने वाले वह पहले भारतीय प्रधानमंत्री होंगे। यह देखना होगा कि मोदी इस नाजुक मुद्दे पर किस नजरिये का परिचय देते हैं।
-लेखक चेन्नई स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं