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विचार: नई पहचान ढूंढती यह पुरानी दुनिया, जिसमें जारी है शांति पाने की जद्दोजहद

Mon, 03 Mar 2025 06:48 AM IST
शिव शुक्ला नंदितेश निलय
नंदितेश निलय Published by: शिव शुक्ला Updated Mon, 03 Mar 2025 06:48 AM IST
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सार
कोविड के दौरान सबने माना कि दुनिया बम की आइडेंटिटी से नहीं, बल्कि वैक्सीन यानी जीवन की आइडेंटिटी से ही बच सकती है। यही परमानेंट आइडेंटिटी शायद दुनिया की पहचान बने। फिर सूट या पहनावे के सवाल किसी राष्ट्राध्यक्ष से नहीं पूछे जाएंगे।
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This old world is searching for new identity, in which struggle to find peace continues
व्हाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति से मुलाकात के दौरान यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की - फोटो : पीटीआई / एपी

विस्तार

क्या इस दुनिया में हम हमेशा किसी खास पहचान के इर्द-गिर्द अपने कन्वर्सेशंस और रिलेशंस को ढूंढते रहते हैं? अपने पहनावे, अपनी सामरिक या किसी अन्य शक्ति के सहारे? जैसे कि किसी राष्ट्राध्यक्ष से यह पूछ लिया जाए, 'आपके पास पहनने को सूट नहीं है, क्या?' यह कुछ अजीबो-गरीब नहीं लगता? चर्चिल का महात्मा गांधी के पहनावे पर टिप्पणी जैसा, जब गांधी को ‘नेकेड फकीर’ कहा गया! क्या दुनिया में हर देश, हर इन्सान कोई आइडेंटिटी नहीं ढूंढ रहा? क्या हम एक कंपलसरी आइडेंटिटी में बंधते तो नहीं जा रहे हैं? ऐसी पहचान, जो जाति, धर्म से शुरू होकर पद, धन या फिर मैनेजर, लीडर आदि न जाने कितने पड़ाव लेती है। और फिर न जाने कितने सामाजिक, धार्मिक, संस्थागत और यहां तक कि देश से लेकर, पारिवारिक विभेद का भी कारण बन जाती है। और अब तो यह आइडेंटिटी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के फॉलोअर्स और लाइक्स से भी प्रभावित होती है। कहीं ऐसा तो नहीं कि रील बनाने की हवस में हम उस कंपलसरी आइडेंटिटी की ओर बढ़ रहे हैं, जो दुर्भाग्यवश हमारी परमानेंट आइडेंटिटी भी बनती जा रही है।



शीत युद्ध ने सबसे शक्तिशाली आइडेंटिटी को जन्म दिया, जिसका मुकाबला करने के लिए सामरिक शक्ति बढ़ाने की होड़ लग गई। अमेरिका और रूस ने मानो संसार को नॉर्थ पोल और साउथ पोल की तरह एक आइडेंटिटी दी, और इस कंपलसरी आइडेंटिटी से जुड़ने के लिए विश्व के अन्य देशों को किसी एक पाले के साथ जाना था। तमाम मुल्क हथियार खरीदने और कुछेक बेचने के दायरे में आ रहे थे। और यह नई बनती कंपलसरी आइडेंटिटी न्यूक्लियर बम की अधिकाधिक संख्या को सब कुछ मान बैठी और दुनिया को खत्म करने के लिए तमाम देश न्यूक्लियर बम का परीक्षण करने लगे कि कौन किसको कितना डरा सकता है, सबसे शक्तिशाली कौन है। यह उस कंपलसरी आइडेंटिटी का हिस्सा बना।


चलिए, थोड़ा पीछे मुड़कर देखते हैं। भारत जब स्वतंत्रता संग्राम कर रहा था, तो जैसे कंपलसरी आइडेंटिटी छोड़ने की होड़ लगी हुई थी। महात्मा गांधी, मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, सी आर दास, अरुणा आसफ अली, सुभाष चंद्र बोस आदि ने अपनी लॉ की प्रैक्टिस, कोई पद या नौकरी छोड़ दी। लेकिन आजादी के बाद, तो मानो कंपलसरी आइडेंटिटी ने सभी को घेर लिया। विभाजन की त्रासदी में एक भौगोलिक लकीर एक पूरी कौम को दूसरी कौम से अलग कर रही थी। लाखों लोग समुदाय या धर्म के नाम पर मारे जा रहे थे। और सबसे बड़ी बात इस कंपलसरी आइडेंटिटी ने उस कंटेस्टिंग कन्वर्सेशन को जन्म दिया, जिसने ‘मेरा और तुम्हारा’ या ‘कौन और क्या’ के विभेद की बहुत बड़ी खाई खड़ी कर दी, जो तबसे और गहरी होती जा रही है।

आज डिजिटल और एआई की दुनिया ने हमें ऐसी कुछेक दस कंपनियों से परिचित कराया, जिन्होंने तकनीक की शक्ति और समझ को कंपलसरी आइडेंटिटी बना दिया। जो देश जितना डिजिटल बनता रहा, वह उन दस कंपनियों से किसी न किसी रूप से जुड़ा रहा। यहां तक कि एलन मस्क का अमेरिकी चुनाव के दौरान और फिर मंत्रिमंडल से जुड़ना बता रहा है कि इस दशक ने एक ऐसी कंपलसरी आइडेंटिटी पैदा की, जिससे बचना करीब-करीब असंभव हो गया है।

नतीजतन मनुष्य के सामाजिक संवाद की जिम्मेदारी भी इन कंपलसरी आइडेंटिटी ने ले ली। सब कुछ मानो इन्हीं के इर्द-गिर्द हो रहा है। देश के स्तर पर सामरिक और डिजिटल शक्ति राष्ट्र के आपसी संबंधों और संप्रेषण का रास्ता बना रही है, तो समाज के स्तर पर पहले से ही जाति, धर्म, पद और धन से उभरी आइडेंटिटी इन संबंधों और संप्रेषणों को प्रभावित करती आ रही है। लखनऊ में कोई अपने पूरे परिवार को मारकर सोशल मीडिया पर फेमस होना चाह रहा है, तो कोई गरीब किसी अमीर की गाड़ी के नीचे आ जाए, तो कोई हो-हल्ला नहीं होता। और न ही किसी छोटे देश पर किसी बड़े देश के आक्रमण का।

भारत को भी एक स्वतंत्र राष्ट्र की पहचान मिली और 15 अगस्त, 1947 को नियति से मुलाकात हुई। हालांकि, भारत ने महात्मा गांधी को खो दिया और नियति से यह मुलाकात स्वतंत्रता पर ही भारी पड़ गई, क्योंकि सांप्रदायिकता दिल्ली की ओर बढ़ रही थी, जबकि गांधी ने अपनी मृत्यु से पहले कहा था, 'अगर दिल्ली खो गई, तो भारत खो जाएगा।' लेकिन सांप्रदायिकता की कंपलसरी आइडेंटिटी ने थोड़ी देर के लिए मानो मनुष्यता की आइडेंटिटी को ग्रहण लगा दिया। मानो एल्डस हक्सले कह रहे हों, 'शायद यह दुनिया किसी दूसरे ग्रह का नरक है।' महात्मा गांधी स्वतंत्रता के बाद देश में उभर रहे ऊर्ध्वाधर मतभेदों के बारे में चिंतित थे। नंदन नीलेकणी ने अपनी पुस्तक, इमेजिनिंग इंडिया में उन ऊर्ध्वाधर मुद्दों और क्षैतिज विषयों के बारे में बात की है।

क्या एक विकसित समाज या 2047 का भारत अपने लोगों को उस कंपलसरी आइडेंटिटी से निकाल पाएगा? क्या हम ऐसे सामाजिक और संस्थागत संप्रेषण को गढ़ पाएंगे, जो कंपलसरी आइडेंटिटी को स्थायी बनने से रोके और उस वास्तविक स्थायी पहचान का निर्माण कर सके, जिसमें मनुष्य बनना और मानवता ही सबकुछ होता है। फिल्म दीवार में एक भाई ने अपनी आइडेंटिटी बंगला, गाड़ी और पैसे में ढूंढी, तो दूसरे भाई ने अपनी मां में। आइए, हम मनुष्य बने रहने के जीवन मूल्यों की ही आइडेंटिटी चुनें और अपने संबंध और संप्रेषण उसी के इर्द-गिर्द बुनें। शायद श्रीराम, गुरु नानक, पैगंबर, जीसस, कबीर, रैदास, रूमी भी यही चाहते थे कि मनुष्य अपनी पहचान मनुष्यता में ही ढूंढे। महामारी ने तो उन सारी कंपलसरी आइडेंटिटी को ही मिटा दिया था। और वायरस जब हारा, तो सिर्फ मनुष्य होने की उस परमानेंट आइडेंटिटी से ही। कोविड के दौरान सबने माना कि दुनिया बम की आइडेंटिटी से नहीं, बल्कि वैक्सीन यानी जीवन की आइडेंटिटी से ही बच सकती है। यही परमानेंट आइडेंटिटी शायद दुनिया को बचा सके और शांति ही इस दुनिया की पहचान बने। फिर सूट या पहनावे के सवाल किसी राष्ट्राध्यक्ष से नहीं पूछे जाएंगे। न कोई चर्चिल उस महात्मा गांधी को ‘नेकेड फकीर’ कह पाएगा और न हो कोई एलीट विवेकानंद के पहनावे पर सवाल खड़े कर पाएगा। कोविड ने तो मनुष्य के चेहरे पर ही मास्क लगाकर इन्सानियत की परमानेंट आइडेंटिटी गढ़ दी। और विवेकानंद ने 'सिस्टर एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका' से पूरे विश्व की।

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