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संकट अभी टला नहीं है

Fri, 18 Oct 2013 08:11 PM IST
पॉल क्रुगमैन
पॉल क्रुगमैन Updated Fri, 18 Oct 2013 08:11 PM IST
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This is not end of crisis

अमेरिकी संसद ने पिछले करीब एक पखवाड़े से चले आ रहे गतिरोध को विराम देते हुए आंशिक कामबंदी समाप्त कर दी है, पर संकट अब भी पूरी तरह टला नहीं है। इस पूरे बजट संकट को लेकर रिपब्लिकन पार्टी के नेताओं का जो रुख रहा है, उसे देखते हुए संकट के फिर से उभरने की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता।

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इसके अलावा यह समझना भी महत्वपूर्ण है कि ‘गतिरोध और फिरौती’ से होने वाले आर्थिक नुकसान की शुरुआत पिछले दिनों रिपब्लिकन पार्टी की जिद के कारण कामबंदी से नहीं हुई। दरअसल, इसके बीज तो तभी पड़ गए थे, जब 2010 में प्रतिनिधि सभा में रिपब्ल्किन पार्टी ने बहुमत हासिल किया था। अगर उस समय इस पार्टी ने मंदी से उबरने की कोशिशों को कमजोर नहीं किया होता, तो आज अमेरिका में बेरोजगारी की समस्या इतनी ज्यादा विकराल नहीं होती। रिपब्लिकन पार्टी के रुख के चलते हुए नुकसान का सुबूत एक सलाहकारी फर्म ‘मैक्रोइकोनॉमिक एडवाइजर्स’ की रिपोर्ट में मिलता है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2010 से ही जिस राजकोषीय नीति को अपनाया जा रहा है, वह अपने आप में संकट को निमंत्रण देने वाली है। इस नीति की वजह से पिछले तीन वर्षों में अमेरिका की विकास दर में एक फीसदी की कटौती हुई है। इससे अमेरिका को होने वाले आर्थिक नुकसानों को आंकना मुश्किल नहीं है। समर्थ होते हुए भी अमेरिका जिन वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन नहीं कर सका, उससे होने वाला नुकसान तकरीबन 700 अरब डॉलर का रहा। रिपोर्ट यह भी कहती है कि अगर राजनीतिक अवरोधों की तादाद इतनी अधिक नहीं होती, तो बेरोजगारी मौजूदा आंकड़े से 1.4 प्रतिशत कम होती। इसका मतलब यह है कि तब बेरोजगारी की दर सात प्रतिशत की जगह छह फीसदी से भी कम होती।
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हालांकि रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों को पूरी तरह से सच नहीं माना जा सकता। मेरा मानना है कि लचर राजकोषीय नीति के प्रभावों का आकलन करते वक्त पर्याप्त अनुसंधान नहीं किया गया है। फिर भी इससे यह नतीजा निकालना भूल होगी कि समष्टि अर्थशास्त्रीय विचारकों ने इस मामले को कुछ ज्यादा ही बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया। दरअसल उनका ऐसा मानने की वजह 2010 से विवेकाधीन खर्च की मात्रा में आई कमी है। ये खर्च सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवा पर होने वाले उन खर्चों से अलग होते हैं, जिनके लिए हर वर्ष कांग्रेस की अनुमति लेना अनिवार्य होता है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ी मुश्किल समग्र मांग में आई यह कमी ही है। इसी वजह से खर्च में कटौती होती है, जिससे विकास और रोजगार, दोनों प्रभावित होते हैं।
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इसके अलावा रिपोर्ट में कई अन्य बुरी नीतियों पर कोई चर्चा नहीं की गई है, जो 2010 में निम्न सदन में रिपब्लिकन पार्टी के बहुमत का ही प्रत्यक्ष या परोक्ष नतीजा हैं। मसलन, पे-रोल कर को जहां लगातार बढ़ने दिया गया, वहीं बेरोजगारों को दी जा रही सहायता में तेज कटौती करने का निर्णय ठीक तब लिया गया, जब बेकारों की संख्या पहले के मुकाबले तीन गुनी हो गई! इन दोनों ही फैसलों से अमेरिकी कामगारों की क्रयशक्ति और उपभोक्ता मांग घटी है, नतीजतन विकास दर में कमी आई है। सारे पहलुओं पर गौर करने पर यह अनुमान लगाना आसान हो जाता है कि अर्थव्यवस्था को लगने वाले तमाम झटकों के पीछे कहीं न कहीं रिपब्लिकन नेताओं की 'राजनीतिक फिरौती' की नीति रही है। तीन साल पहले प्रतिनिधि सभा में रिपब्लिकन्स के बहुमत में आने का ही नतीजा है कि जब अर्थव्यवस्था को सुधार के रास्ते पर चलना चाहिए, तो वह डगमगा रही है।

आखिर क्या वजह है कि रिपब्लिकन पार्टी की लगातार मांगों से अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर होने लगता है? इसकी एक वजह यह है कि पार्टी अर्थव्यवस्था को उच्च-निम्न वर्गों में बांटने की रणनीति की वकालत करती है। यह रणनीति मध्यवर्ग पर ज्यादा करारोपण, गारंटीयुक्त स्वास्थ्य सेवाओं का विरोध और सामाजिक सुरक्षा में कटौती की मांगों पर आधारित है। वैसे तो सामान्य स्थिति में भी बेरोजगारों की सुविधाओं में कटौती करने की सोच क्रूरतापूर्ण है; जब अर्थव्यवस्था पहले से ही नाजुक दौर से गुजर रही हो, तब तो यह सोच और भी खतरनाक साबित होती है। अमीरों के करों में कटौती को जायज ठहराते हुए आम कामगारों के करों में कटौती के लिए तैयार न होने का अर्थ खर्च करने के इच्छुक लोगों से पैसा छीनकर वैसे लोगों को देना है, जिनके लिए खर्च करना जरूरी नहीं है।


वर्ष 2011 में रिपब्लिकन्स ने यूरोप में लोकप्रिय ‘बढ़ती मितव्ययिता’ की धारणा को हड़बड़ी में अपना लिया। ऐसा सोचने वाले मानते हैं कि खर्च में कटौती से आत्मविश्वास आता है, जो अर्थव्यवस्था की खुशहाली के लिए जरूरी है। जबकि सच्चाई इससे अलग भी होती है। वैश्विक स्तर पर यह देखा गया है कि खर्चों में व्यापक कमी से मंदी जैसे हालात भी पैदा हो सकते हैं। लेकिन रिपब्लिकन अपनी सोच बदलने को तैयार नहीं। लेकिन क्या इसके लिए रिपब्लिकन्स ही पूरी तरह जिम्मेदार थे? कतई नहीं। सच यह है कि ओबामा भी खर्चों में कटौती के खिलाफ अपने पक्ष को मजबूती से नहीं रख पाए। इसी तरह विकास दर में बढ़ोतरी को बरकरार रखने में फेडरल रिजर्व भी अपनी भूमिका अदा नहीं कर पाया। हालिया संकट को हमने बेशक टाल दिया है, पर अर्थव्यवस्था की दिशा को लेकर संशय अब भी बरकरार है।

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