यह बासठ का दौर नहीं है
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प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चीन यात्रा के तीन मुख्य उद्देश्य हैं। एक, सैन्य और कूटनीतिक वार्ताओं की ऐसा ढांचा तैयार करना कि परस्पर अविश्वास दूर हो, ताकि आगे की सामरिक राह सरल बने; भारत-चीन आवागमन को सरल बनाना, और तीसरा व्यापार में असंतुलन दूर करना। चीन हमारा सबसे निकट और सबसे बड़ा पड़ोसी भले हो, लेकिन हमारे देश में चीन के प्रति जानकारी का अभाव सर्वाधिक है। हम औपनिवेशिक मानस के कारण रोम, लंदन, पेरिस और न्यूयॉर्क के ज्यादा नजदीक हैं, बनिस्बत बीजिंग, नेपि ताव और सिंगापुर के। जबकि विश्व अर्थ और सैन्य शक्ति का सूर्य अब पश्चिम से रुख बदल कर पूर्व में आ रहा है। भविष्य चीन, जापान और पूर्वी एशिया में है। यह बात समझ कर ही भारत चीन के साथ सामरिक संबंध प्रगाढ़ करने की दिशा में बढ़ा है, जिसका स्वागत होना चाहिए।
सबसे बड़ी आवश्यकता चीन के साथ सामान्य जनता और मीडिया के स्तर पर संबंध बढ़ाने की है। चार पूर्ण स्तरीय युद्ध लड़ने और आतंकवाद के पोषण के बावजूद हम पाकिस्तान से 'ट्रैक टू' कूटनीति तो जारी रखतें हैं, पर चीन के साथ एक हजार वर्षों में सिर्फ एक, 1962 के युद्ध के बावजूद हम उसके सामान्य समाज, प्रगति, दुर्बलता, साहित्य, फिल्मों और नई पीढ़ी के प्रति जानकारी का नितांत अभाव रखते हैं। सिर्फ बहादुरी की भाषण शैली से ही संबंध नहीं बनते।
मनमोहन सिंह निश्चय ही एक कठिन एजेंडा लेकर बीजिंग पहुंच रहे हैं। चीन को सदैव शत्रु निरूपित करना, वैसा ही होगा, जैसे हम 2013 में 1962 का समय जिएं। विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक और सैन्य शक्ति बन रहे चीन के साथ हमारी 4,000 किलोमीटर लंबी सीमा है। बासठ के बाद भारत-चीन सीमा पर एक भी गोली नहीं चली है। कारगिल युद्ध के समय चीन ने निरपेक्षता बरती और राजीव गांधी, नरसिंह राव और अटल बिहारी वाजपेयी के शासन तक संबंध लगातार प्रगति की ओर इतने बढ़े कि आज चीन भारत से व्यापार में अमेरिका को लगभग पीछे छोड़ने वाला है। चीन में दो सौ से अधिक भारतीय उद्योग और कंपनियां काम कर रही हैं। यह ठीक है कि अरुणाचल और कश्मीर के बारे में हमारे गहरे विवाद हैं, लेकिन वाजपेयी सरकार के समय तय हुए सीमा आयोग के ढांचे में उस पर बातचीत हो रही है। नत्थी वीजा तथा लद्दाख में घुसपैठ के गंभीर मामले हैं, पर यह दोनों देशों के नेतृत्व की परिपक्वता है कि इन मामलों को सीमा पर गोलीबारी या मुठभेड़ में परिणत नहीं होने दिया गया।
एक अत्यंत जटिल आर्थिक संकट, राजनीतिक परिवर्तन के माहौल में भारत के सामने सर्वोत्तम कूटनीतिक पर्याय स्वयं को पश्चिमी रूढ़ नीतियों के जंजाल से मुक्त कर एक नवीन आत्मविश्वास के साथ चीन से सामरिक भागीदारी की ओर बढ़ना होगा। युद्ध शुरू करना सबसे आसान है, अपनी स्थिति पर दृढ़ रहते हुए शक्ति के अधिष्ठान से प्रतिरोध करना कठिन, पर विवेकपूर्ण कदम होगा। इस परिप्रेक्ष्य में हमारे प्रधानमंत्री की चीन यात्रा को स्वदेशी राजनीतिक रंगों से परे होकर देखने की जरूरत है। वर्ष 2015 से पहले ही भारत चीन व्यापार एक सौ अरब डॉलर तक पहुंचने की संभावना है। अपने देश में चीन की लगभग सवा सौ कंपनियां काम कर रहीं हैं। हिमाचल के सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़कें बनाने से लेकर टाटा डोकोमो के संचार नेटवर्क तक में उनकी भूमिका है। बायो डीजल से लेकर फर्नीचर, खिलौनों, पेन, दिवाली की रोशनी और पटाखे, सजावटी चित्र और गणेश जी तक चीन से आ रहे हैं। दिक्कत सिर्फ व्यापार असंतुलन ठीक करने की है, जो आज साठ प्रतिशत चीन के पक्ष में है।
यदि भारत अपना पक्ष मजबूत बनाता है, तो उसमें किसे आपत्ति है? चीन एक सशक्त लौह इच्छाशक्ति और मजबूत अर्थव्यवस्था के साथ ज्यादा विश्वसनीय हो सकेगा, न कि कमजोर के साथ। भारत की सैन्य शक्ति और अर्थव्यवस्था मजबूत बनाना हमारे सत्ताधीशों का काम है, न कि चीन का।
घरेलू चुनावी चक्र कुछ भी रहे, भारत की सामरिक यात्रा के आयाम ठीक चल रहे हैं। एक माह से कम समय में ही भारत के अत्यंत महत्वपूर्ण शीर्ष नेताओं ने वाशिंगटन, ब्रुसेल्स, इस्तांबूल, आसियान देशों के शिखर सम्मलेन, इंडोनेशिया, ब्रूनेई, हंगरी, मास्को के बाद अब चीन की यात्रा अपने खाते में लिखी है। वाशिंगटन में राष्ट्रपति ओबामा ने असाधारण रूप से भारत के साथ पहली बार रक्षा उत्पादन और टेक्नोलॉजी स्थानांतरण का समझौता किया और रोचक बात यह है कि रूस के साथ भी हमारे प्रगाढ़ रक्षा संबंध बने रहे हैं।
भारत अब तक रूस और अमेरिका के साथ ही अपनी सामरिक नीति को जोड़ता आया है। कुछ देरी से ही सही, लेकिन जापान के साथ भारत की सामरिक मैत्री अचानक महत्वपूर्ण दौर में पहुंची है और उसमें निर्विवाद रूप से मनमोहन सिंह की जापान में लोकप्रियता का भी योगदान रहा है। इस माहौल में यह भी ध्यान रखना होगा कि अमेरिका के लिए इस क्षेत्र में पाकिस्तान भारत से ज्यादा महत्व रखता है, इसलिए तमाम आतंकवादी अड्डों और आईएसआई के तालिबान के साथ संबंधों के बावजूद अमेरिका ने मनमोहन सिंह की यात्रा के तुरंत बाद पाकिस्तान को डेढ़ अरब डॉलर की सहायता जारी करने की घोषणा कर दी। भारत के लिए जरूरी है कि अपने शत्रुओं की संख्या में कमी करते हुए आर्थिक और सैन्य शक्ति बढ़ाए और पड़ोस में न्यूनतम संघर्ष पैदा होने दे। यह समझौता नहीं, रण-नीति का हिस्सा है।
(लेखक संसद की विदेश मंत्रालय सलाहकार समिति के सदस्य हैं)