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मुद्दा: हंतावायरस से घबराने की जरूरत नहीं, यह सावधानी और वैज्ञानिक तैयारी का विषय
Mon, 25 May 2026 08:43 AM IST
Pavan
डॉ. चन्द्रकान्त लहारिया
डॉ. चन्द्रकान्त लहारिया
Published by: Pavan
Updated Mon, 25 May 2026 08:43 AM IST
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हंतावायरस से घबराने की जरूरत नहीं
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अमर उजाला
विस्तार
करीब तीन वर्ष पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने औपचारिक रूप से कोविड-19 महामारी की समाप्ति की घोषणा की थी। कोविड ने कुछ ऐसा असर छोड़ा है कि अब दुनिया के किसी भी हिस्से में कोई नया संक्रमण सामने आते ही महामारी फैलने की आशंका होती है। मई के पहले सप्ताह में कुछ ऐसा ही हुआ, जब डब्ल्यूएचओ ने हंतावायरस संक्रमण की जानकारी दी। हंतावायरस परिवार के एंडीज वायरस के संक्रमण में तीन लोगों की मृत्यु, कई प्रयोगशाला-पुष्ट मामलों और कुछ संभावित संक्रमित यात्रियों व कर्मचारियों की खबरों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता पैदा कर दी।क्या हंतावायरस बड़ा खतरा है? याद रखना होगा कि नई संक्रामक बीमारियों का उभरना कोई असामान्य घटना नहीं है। लेकिन हर संक्रमण महामारी का प्रारंभ नहीं होता। यह कोई नया वायरस नहीं है। वैज्ञानिक लगभग सात दशकों से इसके बारे में जानते हैं। यह दुनिया के अनेक हिस्सों में पाया जाता है और चूहे जैसे कृंतक जीव इसके प्रमुख वाहक माने जाते हैं। मनुष्य सामान्यतः संक्रमित चूहों के मूत्र, लार या मल के संपर्क में आने से संक्रमित होते हैं, विशेषकर बंद या कम हवादार स्थानों में।
वर्तमान प्रकोप के केंद्र में एंडीज वायरस है, जो मुख्यतः दक्षिण अमेरिका में पाया जाता है और हंतावायरस परिवार का एकमात्र ज्ञात प्रकार है, जिसमें सीमित (व्यक्ति-से-व्यक्ति) संक्रमण संभव है। यह संक्रमण कोविड की तरह सहज रूप से नहीं फैलता। इसके लिए लंबे और निकट संपर्क की आवश्यकता होती है। किसी वायरस की गंभीरता सिर्फ उसकी मृत्यु दर से निर्धारित नहीं होती, बल्कि प्रसार से भी होती है। हंतावायरस संक्रमण कुछ परिस्थितियों में 30-50 प्रतिशत तक मृत्यु दर दिखा सकता है, लेकिन यह सीमित रूप से फैलता है।
कोविड-19 वैश्विक संकट इसलिए बना, क्योंकि उसमें दो खतरनाक विशेषताएं एक साथ थीं- तेजी से फैलने की क्षमता और ऐसी वैश्विक आबादी, जिसमें पूर्व प्रतिरक्षा लगभग नहीं थी। हंतावायरस के सामुदायिक प्रसार की संभावना बहुत कम है। हंतावायरस और कोविड-19 के बीच तीन महत्वपूर्ण अंतर हैं। पहला, कोविड का वायरस बिल्कुल नया था, जबकि हंतावायरस लंबे समय से ज्ञात है, जिसकी महामारी विज्ञान संबंधी समझ स्पष्ट है। दूसरा, कोविड मुख्यतः सांस के जरिये फैलता था, जबकि हंतावायरस कृंतकों के संपर्क से जुड़ा संक्रमण है। तीसरा, इसमें कोविड जैसी विस्फोटक फैलाव क्षमता कभी नहीं देखी गई। इसलिए वर्तमान प्रकोप पर वैज्ञानिक निगरानी आवश्यक है, पर घबराने की जरूरत नहीं है। फिर डब्ल्यूएचओ ने भी हंतावायरस के वैश्विक जोखिम को निम्न स्तर का माना है।
यद्यपि समाचारों में दो भारतीय कर्मचारियों के जहाज पर मौजूद होने की चर्चा हुई है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय निगरानी और क्वारंटीन व्यवस्थाएं पहले से सक्रिय हैं। इसके अलावा, जहाज संक्रमण अपेक्षाकृत नियंत्रित वातावरण होते हैं। वहां संपर्क में आए लोगों की पहचान, निगरानी और पृथक्करण अपेक्षाकृत व्यवस्थित ढंग से किया गया है। भारत अब संक्रामक रोग निगरानी के मामले में पहले से कहीं अधिक तैयार है। महामारी के बाद प्रयोगशालाओं की क्षमता बढ़ी है, रोग निगरानी प्रणाली मजबूत हुई है और जीनोमिक सर्विलांस नेटवर्क बेहतर बने हैं। राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र और एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम जैसी संस्थाओं का अनुभव अब पहले से अधिक व्यापक है। लेकिन कोविड ने समाज में एक प्रकार का सामूहिक महामारी-आघात छोड़ दिया है। अब कई बार रोगों से ज्यादा तेजी से अफवाहें और भय फैलते हैं। डब्ल्यूएचओ की चेतावनियां आम लोगों के लिए नहीं, बल्कि सरकारों, हवाई अड्डों, बंदरगाहों, अस्पतालों और निगरानी संस्थाओं की तैयारी व समन्वय के लिए होती हैं।
अब बात आती है कि ऐसे में भारत को क्या करना चाहिए? भारत को रोग निगरानी प्रणाली, प्रयोगशाला नेटवर्क, फील्ड महामारी विज्ञान क्षमता और सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यबल में निवेश जारी रखना चाहिए। राज्यों के बीच तैयारियों में अब भी असमानता है। साथ ही स्वास्थ्य और बीमारियों से बचाव के लिए लोगों में जागरूकता और संवाद भी उतना ही महत्वपूर्ण है। कोविड का सबसे बड़ा सबक यही था कि रोग प्रबंधन के साथ भय प्रबंधन भी आवश्यक है। हंतावायरस प्रसार फिलहाल घबराहट का नहीं, बल्कि सावधानी और वैज्ञानिक तैयारी का विषय है। भारत की चुनौती हर नए संक्रमण से डरना नहीं, बल्कि ऐसा सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचा बनाना है, जो हर खतरे का सामना शांत, वैज्ञानिक और संतुलित तरीके से कर सके।