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तो मैं भी काजू कतली छोड़ दूंगा

Thu, 28 Aug 2014 07:38 PM IST
प्रकाश पुरोहित
प्रकाश पुरोहित Updated Thu, 28 Aug 2014 07:38 PM IST
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Then I will give up kaju katali

जब तक गंगा साफ नहीं की जाती, तब तक मैं काजू कतली नहीं खाऊंगा। कोई नेता यह मांग करते हुए अगर अपना पसंदीदा मालपुआ छोड़ सकता है, तो मुझे भी कोई हक नहीं कि काजू कतली जुबान पर रखूं।

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मैं भी मालपुआ छोड़ सकता था, मगर क्या करूं! किसी नेता के यहां शादी में इतने मालपुए बच गए थे कि हम लोगों ने दो-चार दिन तक सिर्फ मालपुए ही खाए थे। नमकीन भी शादी में बच गया होता, तो यकीनन मालपुए फेंकने नहीं पड़ते। यह अलग बात है कि दो-चार दिन के मालपुए कई दिनों तक पेट पर पत्थर की तरह भारी रहे। अब तो यह हालत है कि मालपुए का नाम सुनते ही मुझे डकार आने लगती है और मैं हाजमोला तलाशने लगता हूं।
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मुझे मालपुआ पसंद नहीं, तो मैं मालपुआ छोड़ कैसे सकता हूं। नेता ने तो इसलिए छोड़ा है कि उन्हें मालपुआ ही सबसे ज्यादा प्रिय है। अगर मैं भी मालपुआ छोड़ देता, तो यह सरासर धोखाधड़ी होती। गंगा जैसे पवित्र नाम और काम में ऐसा खोटा काम नहीं करना चाहिए। अपनी जरूरत की चीज छोड़ना तो कोई मुश्किल काम नहीं है, लेकिन अपनी प्रिय मिठाई छोड़ना सही मायने में त्याग है। जरूरत की चीजों से तो रोज ही वास्ता पड़ता है, लेकिन अपनी प्रिय चीज तो कभी-कभार ही खाने को मिलती है। और उसके बाद भी कोई कसम खाकर बैठा है कि वह नहीं खाएगा, तो यह कठिन प्रण है।
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आम जनता जरूरत की चीज छोड़ती है, तो नेता अपनी प्रिय वस्तु का त्याग करता है। आप पूछ सकते हैं कि मुझे काजू कतली प्रिय क्यों है? सीधा-सा जवाब है कि जो चीज आसानी से न मिलती हो, वही तो प्रिय होती है। मुझे नहीं याद कि काजू कतली का स्वाद कैसा होता है। किसी ने ऐसी शादी में बुलाया ही नहीं, जहां काजू कतली बनी हो। मुझे यही उम्मीद है कि गंगा अगर साफ हो गई, तो मुझे भी कोई काजू कतली चखा देगा। साफ गंगा की मैं कल्पना करता हूं, तो वह मुझे काजू कतली जैसी नजर आने लगती है। क्या उस नेताजी को भी गंगा कढ़ाही की पकते हुए मालपुए की तरह नजर आती होगी?

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