फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   The whole association of revenge

पूरी बिरादरी से बदला लेने वाले

Fri, 21 Aug 2015 11:48 AM IST
सुभाषिनी सहगल अली
सुभाषिनी सहगल अली Updated Fri, 21 Aug 2015 11:48 AM IST
विज्ञापन
The whole association of revenge

हफ्ता भर पहले की बात है। 15 अगस्त से दो दिन पहले बिहार के खगड़िया जिले की परबत्ता तहसील में अत्यंत गरीब लोगों की बड़ी जमघट हुई, जिसने तमाम लेखों, पुस्तकों, बुद्धिजीवियों की टिप्पणियों से ज्यादा प्रभावी ढंग से इसका खुलासा किया कि इस आजादी का बेसहारा और कमजोर लोगों के लिए क्या अर्थ है।

विज्ञापन


वहां तहसील के ग्राम नयागांव शिरोमणि टोले के दो सौ दलित परिवार थे, जो पिछले कई दिनों से अपने गांव के पास, सड़क के किनारे अपनी जान बचाने के लिए रहने को मजबूर किए गए थे। 27 जुलाई को उनके टोले के करीब तीन सौ दलित परिवारों पर गांव की जमीन पर काबिज ऊंची जाति के लोगों ने जबर्दस्त और बर्बर हमला किया था। उनकी झोपड़ी में आग लगा दी गई, मर्दों को बुरी तरह पीटा गया, महिलाओं के साथ इतनी बदसलूकी की गई कि एक गर्भवती महिला का गर्भ गिर गया। इन लोगों की आंखों के सामने उनके घरों में बड़े जतन से रखा अनाज का हर दाना बर्बाद कर दिया गया।
विज्ञापन


आखिर यह हमला क्यों हुआ? बताया जाता है कि टोले के एक बुनकर (दलित) पुरुष का संबंध भूमिहार जाति की एक लड़की से था। सारे गांव को इसकी जानकारी थी। बुनकर पुरुष शादीशुदा था, लड़की कुंवारी। लड़की के मां-बाप ने जल्दी से जल्दी उसकी शादी खगड़िया शहर में कर दी। लेकिन दोनों के रिश्ते में कोई फर्क नहीं आया। मोबाइल फोन पर बात होती थी। एक दिन लड़की का फोन आया कि वह अकेली है। वह बुनकर पुरुष वहां पहुंचा और दोनों वहां से भाग निकले।
विज्ञापन
विज्ञापन


लड़की वालों ने पुरुष के खिलाफ अपहरण का मुकदमा दर्ज करवा दिया। कई हफ्तों बाद दोनों पकड़े गए। लड़के को जेल भेजकर पुलिस ने लड़की को अदालत में पेश किया। लड़की के मां-बाप के साथ ही सहजाति प्रधान और टोले के तमाम खौफजदा लोग कचहरी पहुंचे थे। लड़की ने प्रधान से कहा, तुम्हारे भाई ने मुस्लिम महिला से शादी की, तो तुमको बुरा नहीं लगा। फिर अपने मां-बाप की ओर मुखातिब होकर कहा, चाचा बुनकर लड़की को ब्याह कर लाए, तो तुम कुछ नहीं बोले। और अंत में मजिस्ट्रेट से कहा, 'मेरा इन लोगों से कोई संबंध नहीं है। मैं उसे पति मानती हूं, जो जेल में बंद है और उसके साथ ही मैं रहूंगी।'

गांव लौटकर प्रधान ने बिरादरी की बैठक बुलाई। वह पहले से ही शिरोमणि टोले के लोगों से खार खाया हुआ था। उस पर दलित बच्चों के वजीफे के पैसे हड़पने से लेकर कई तरह के आरोप लगे थे, जिनकी जांच हो रही है। उसने इसे दलितों को सबक सिखाने के मौके की तरह लिया। बैठक में उकसाने वाले भाषण दिए गए और आनन-फानन में शिरोमणि टोले पर हमला कर दिया गया।


मतलब एक व्यक्ति की गलती की सजा उसकी पूरी बिरादरी को दी गई। यह घटना जाति और धार्मिक गोलबंदी के अलावा भी कुछ सवाल प्रस्तुत करती है। आखिर ऐसा क्यों कि एक लड़की के उससे निचली समझे जाने वाली जाति के पुरुष के साथ संबंध के खिलाफ होने वाले हिंसात्मक हमले पर समाज का बड़ा हिस्सा अपनी मुहर लगाता है? एक दलित गर्भवती महिला के शिशु की हत्या के प्रति उदासीन क्यों रहता है? पुरुषप्रधानता और जाति भेदभाव का यह कैसा गठजोड़ है, जिसने हमारी मानसिकता को इतना जकड़ कर रख दिया है?

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed