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दोकलम का सच सामने आया

Thu, 02 Nov 2017 07:30 AM IST
prashant dikshit प्रशांत दीक्षित
Updated Thu, 02 Nov 2017 07:30 AM IST
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The truth of Dokalam came out
शी जिनपिंग

जब भारत ने दोकलम गतिरोध का सामना किया था, तो कई विश्लेषकों ने विवाद भड़काने के लक्षणों की प्रकृति देखकर हैरानी जताई थी। तब के हालात बता रहे थे कि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के सैनिक भारतीय सैनिकों के प्रति झगड़ालू रवैया दर्शा रहे थे। लेकिन चीन ने ऐसा कोई प्रयास नहीं किया, जिससे कि टकराव के चलते सशस्त्र संघर्ष बढ़े। ऐसा लगा कि भूटानी क्षेत्र में सड़क निर्माण की सैन्य कोशिश को तो रोक दिया गया, लेकिन इसके जरिये भारतीय शासन को एक तरह की धमकी देने की कोशिश की गई। पर अब तस्वीर स्पष्ट है। जैसा कि तब संदेह जताया गया था, यह चीनी जनवादी गणराज्य की घरेलू राजनीति में अपनी सर्वोच्चता दिखाने की कोशिश थी और इसमें भारत के लिए भी संदेश निहित था। हालांकि हममें से अधिकांश का मानना था कि यह चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के पांच वर्षीय कांग्रेस में वर्चस्व दर्शाने के लिए एक शक्ति संघर्ष था, अब यह स्पष्ट हो चुका है कि शी जिनपिंग ने इसके जरिये सत्ता में अपनी पैठ बढ़ाई है।


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हालिया घटनाक्रम इसकी पुष्टि करते हैं। चीनी शासन ने फिलीपींस के साथ विवाद के मामले में स्थायी मध्यस्थता न्यायाधिकरण के फैसले का मजाक उड़ाया था और नाइन डैश लाइन के संबंध में अपने खिलाफ सुनाए गए फैसले को अमान्य घोषित करते हुए कहा था कि भारत को इस मुद्दे पर टिप्पणी करने से बचना चाहिए। यह वर्चस्व का एक भाव था। हमारे लिए यह ध्यान में रखना अच्छा रहेगा कि श्रीलंका में हंबनटोटा बंदरगाह का संचालन चीन द्वारा तभी किया जा सकता है, जब सुरक्षा प्रावधान लाकर भारत सरकार के हस्तक्षेप से उसमें बदलाव किया जाए, पर बंदरगाह प्रबंधन कंपनी में चीनी कंपनी द्वारा 80 फीसदी शेयर खरीदे बगैर नहीं।

भूटानी सीमा में सड़क बनाने के लिए अतिक्रमण भारत और भूटान के बीच हुई सुरक्षा संधि को नकारना था। माना जा सकता है कि चीन की यह आखिरी कार्रवाई उसी कड़ी का हिस्सा है, जिसके तहत वह चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के हिस्से के रूप में तीन हजार किलोमीटर लंबी सड़क पाकिस्तान के ग्वादर से चीन के काशगर तक बना रहा है, जिस पर भारत का दावा है। चीन ने सीमा संबंधी मुद्दों को सुलझाने नहीं दिया और परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में शामिल होने तथा मसूद अजहर पर प्रतिबंध लगाने के भारतीय प्रयासों को चीन ने जान-बूझकर दबाया है। इसके अलावा वन बेल्ट वन रोड पहल के जरिये वह भारत को वैश्विक प्रक्रिया से अलग-थलग करना चाहता है।
 
 शी जिनपिंग अब चीन के सर्वेच्च नेता बनकर उभरे हैं। चीनी कांग्रेस ने न सिर्फ पांच वर्ष के लिए उनके अधिकार बढ़ा दिए हैं, बल्कि कुछ की नजर में उन्हें जीवन भर के लिए सर्वोच्चता प्रदान की गई है। आम तौर पर किसी देश के नेता की पुनर्नियुक्ति भारत के लिए चिंता का कारण नहीं बननी चाहिए, लेकिन शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासन ने विश्व के अधिकाश हिस्सों पर सामरिक-आर्थिक नियंत्रण के लिए जो तरीका अपनाया है, वह चिंता का विषय है।

 यह घटना कुछ इस तरह से सामने आई है। चीन की कंपनियां बीजिंग स्थित अपने शासन की सुरक्षा के साथ विभिन्न देशों से आधारभूत संरचना निर्माण के लिए अनुबंध करती हैं और इन अनुबंधों के लिए चीनी बैंकों से कर्ज की व्यवस्था की जाती है, जिसकी ब्याज दर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक की ब्याज दरों से बहुत ज्यादा होती है। इन अनुबंधों में से ज्यादातर उन देशों में हुए हैं, जहां प्रशासन खराब है और जहां के शासक अनुबंध देने के बदले घूस लेने के इच्छुक हैं। लेकिन बाद में जब ये सरकारें कर्ज चुकाने में विफल रहती हैं, तो चीनी शासन उन सरकारों को कर्ज चुकाने के लिए अपनी खान या अन्य व्यवसाय के हस्तांतरण के लिए मजबूर करता है।

उदाहरण के लिए, शी के नेतृत्व में चीन ने हार्न ऑफ अफ्रीका के जिबूती में एक सैन्य अड्डे की स्थापना की है। इसके लिए पहले से ही भारी कर्ज में फंसी जिबूती सरकार को चीन ने अरबों डॉलर के कर्ज दिए। वर्ष 2014 से चीनी बैंक, ठेकेदार और सरकार ने 86 अरब डॉलर से ज्यादा का कर्ज अफ्रीका को दिया है। अंगोला, कांगो गणराज्य, इथियोपिया, केन्या और सूडान ने चीन से सबसे ज्यादा कर्ज लिए हैं। इन बड़े कर्जों से अफ्रीकी देशों में कर्ज भार को लेकर सवाल उठने लगे हैं, जो संभावित ऋण संकट के संकेत दे रहे हैं।

एक अन्य मामले में, बीते साल की खबर है कि इंडोनेशिया में चीन द्वारा हस्ताक्षर की गई 5.1 अरब डॉलर के जकार्ता-बांडुंग हाई स्पीड रेल परियोजना को निरस्त कर दिया गया है। लेकिन दस हजार करोड़ मेगावाट क्रैश पावर प्रोग्राम के बावजूद चीनी इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपर्स इंडोनेशिया के महत्वाकांक्षी 35,000 मेगावाट विद्युत विस्तार परियोजना में वर्चस्व बनाए हुए हैं, जिसकी अवधि पिछले वर्ष समाप्त हो गई और जिसने सरकारी ऊर्जा आपूर्तिकर्ता पीएलएन को रखरखाव और प्रदर्शन के गंभीर मुद्दे के साथ छोड़ दिया। क्रैश प्रोग्राम की शुरुआत पूर्ववर्ती सुसिलो बैम्बैंग युद्धोयोनो प्रशासन के दौरान हुई थी और चीनी नेतृत्व वाले कंसोर्टियम ने लो-टेक बॉयलर और पुराने उपकरणों के जरिये सबसे बड़े कोयला संयंत्र का निर्माण किया था। ये सब चीन की विस्तारवादी नीति और गंभीर वित्तीय गड़बड़ी के उदाहरण हैं, जो सामरिक नियंत्रण और बाद में सशस्त्र संघर्ष का कारण बनते हैं।

 चीन की सेना-पीपुल्स लिबरेशन आर्मी दुनिया की सबसे बड़ी सेना है, जिसमें 23 लाख सक्रिय जवान तैनात हैं। लेकिन चीन की वास्तविक सैन्य शक्ति कहीं और निहित है। चीन का इरादा विरोधी पहुंच वाले क्षेत्रों पर कब्जा जमाने का है। इस विचार के तहत दूसरे देशों की सैन्य परिसंपत्तियों को नष्ट करने के लिए जमीनी हमले और एंटी-शिप मिसाइलों, आधुनिक पनडुब्बियों के एक बढ़ते बेड़े और साइबर व एटी सैटेलाइट हथियारों का इस्तेमाल किया जाता है।

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