आतंकवाद से निपटने की गंभीरता

रवींद्र दुबे Updated Wed, 27 Jan 2016 05:53 PM IST
The severity of combating terrorism
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गणतंत्र दिवस के ठीक एक हफ्ता पहले दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने हरियाणा के मेवात क्षेत्र के नूह गांव से अल कायदा के एजेंट मोहम्मद अब्दुल सामी को गिरफ्तार कर इस संगठन के स्लीपर सेल का खात्मा करने का दावा किया है। कटक (ओडिशा) के इस सेल के चार लोग पहले ही सीखचों के पीछे हैं। इनमें अब्दुल रहमान नामक एक व्यक्ति भी है।
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सामी की गिरफ्तारी, चाहे जितनी आशाजनक हो, कई चिंताएं सामने रखती हैं। जानकारों को हैरत है कि अल कायदा जैसा दुर्दांत आतंकवादी संगठन दिल्ली के आसपास के इलाकों में इस कदर सक्रिय है! सामी पाकिस्तान से ट्रेनिंग लेकर आया था और अपनी सेल के बाकी लोगों के गिरफ्तार होने के बाद अकेले गणतंत्र दिवस पर ही किसी बड़ी वारदात को अंजाम देने की कोशिश में था। उसकी गिरफ्तारी दिल्ली के नजदीक ही हुई।


पिछले दिनों अल कायदा के दक्षिण एशियाई प्रकोष्ठ के प्रमुख सनाउल हक की गिरफ्तारी भी दिल्ली से मात्र 150 किलोमीटर दूर संभल से हुई थी। अल कायदा के वर्तमान प्रमुख अयमान-अल-जवाहिरी ने हक को पिछले वर्ष भारतीय उपमहाद्वीप का प्रमुख नियुक्त किया था।

बहरहाल, खुफिया एजेंसियां इससे चिंतित हैं कि दिल्ली समेत शेष उत्तर भारत पाकिस्तानी आतंकवादियों के निशाने पर है। यह नई बात नहीं है। यहां उमर शेख का जिक्र मौजूं है। लंदन स्कूल ऑफ इकॉनामिक्स से शिक्षित उमर शेख 1999 के कंधार विमान अपहरण कांड में नई दिल्ली द्वारा छोड़े गए तीन दुर्दांत आतंकियों में से है। वह पाकिस्तान स्थित वाल स्ट्रीट जर्नल के संवाददाता डेनियल पर्ल के अपहरण का मुख्य संदिग्ध है।

उमर शेख को उसके पाकिस्तानी आकाओं ने भारत में अपहरण के एक अभियान पर भेजा था। उसका मिशन था भारत में विदेशियों के किसी समूह का अपहरण कर बदले में मौलाना मसूद अजहर समेत अन्य आतंकवादियों को छुड़वाना। उसका वह मिशन हालांकि विफल रहा, पर पांच साल बाद वह अपने मकसद में तब कामयाब हुआ, जब तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने उसे कंधार हवाई अड्डे पर तालिबानियों को सौंपा। उमर शेख 1994 में दिल्ली आया था, जो महीनों दिल्ली में खुलेआम घूमता रहा था। फिर सहारनपुर के एक इलाके में उसने एक मकान लिया, जहां उसे बंधकों को रखना था। उसने सफलतापूर्वक तीन ब्रिटिश और एक अमेरिकी नागरिकों का दिल्ली के पहाड़गंज से अपहरण किया। फिर उनके आकाओं ने उन अपहृतों के फोटो खींचे और सरकार को कश्मीरी आतंकवादियों की रिहाई के बारे में खत लिखे। जब वह अखबारों के दफ्तर में खत पहुंचा कर लौट रहा था, तभी उसका कुछ पुलिसकर्मियों से झगड़ा हो गया और वह गिरफ्तार हो गया।

इस और ऐसी कई घटनाओं से साफ है कि भारत में आतंकवादी गतिविधियां चलाना कितना आसान है। यही वजह है कि बहुत-सी आतंकवादी घटनाओं के आरोपी बचकर निकल जाते हैं। इन घटनाओं के दोहराव को रोकने का एकमात्र तरीका यही है कि खुफिया तंत्र को राज्यों के स्तर पर मजबूत किया जाए। किसी भी अनजान को इलाके में देखते ही उसकी पहचान की मालूमात हासिल की जाए। पर यह तभी संभव है, जब आतंकवाद से निपटने की राजनीतिक इच्छा भी मजबूत हो।

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