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सेवानिवृत्त सैनिकों का हक
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सेवानिवृत्त सैनिक
सेना ने सैनिकों की कलर सर्विस की समीक्षा के लिए एक अध्ययन शुरू किया है। कलर सर्विस का मतलब है, वह न्यूनतम सेवा, जो एक सैनिक को पेंशन का पात्र होने के लिए पूरी करनी पड़ती है। इस समय सैनिकों को इसके लिए 17 साल सेवा करना अनिवार्य है, जिसे उनकी मांग पर दो साल बढ़ाया जा सकता है। 19-20 वर्ष की उम्र में सेना में आने वाला व्यक्ति 36-38 की उम्र में सेवानिवृत्त हो जाता है, जो उसकी बढ़ती पारिवारिक दायित्वों के प्रबंधन के लिहाज से बहुत जल्दी है।
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रैंक बढ़ने के साथ सैनिकों की सेवा और उम्र भी बढ़ती है। एक नायक 24 वर्ष तक नौकरी करता है और एक हवलदार 26 वर्ष तक। शीघ्र सेवानिवृत्ति की व्यवस्था सशस्त्र बलों की प्रोफाइल को युवा बनाए रखने के लिए होती है, और यह एक अंतरराष्ट्रीय प्रवृत्ति है। इसके पीछे धारणा यह है कि सशस्त्र बल हमेशा एक तंदुरुस्त बल होता है। जबकि कटु सत्य यह है कि सैनिक चूंकि एक छोटी अवधि की नौकरी करता है, ऐसे में, उसकी सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन सहित उसके तमाम अधिकार अन्य सरकारी कर्मचारियों की तुलना में कम होते हैं। अन्य सभी सेवाओं में सेवानिवृत्ति की उम्र 58-60 वर्ष के बीच है, जो सैनिकों से लगभग 20 वर्ष ज्यादा है। चूंकि पेंशन सेवा अवधि पर निर्भर है, इसलिए सैन्यकर्मियों की पेंशन कम होती है।
इस प्रकार सैनिक जीवन भर नुकसान उठाता है। पिछले कुछ वर्षों से स्वस्थ सैनिकों को केंद्र एवं राज्य सरकार के पुलिस संगठनों में नियोजित करने विचार हो रहा है। इसके लिए केंद्र सरकार में आरक्षण की व्यवस्था है, पर शायद ही कभी लागू होता है। इन संगठनों द्वारा हर स्तर पर वायदे और आश्वासनों के बावजूद कुछ भी नहीं हुआ है। वास्तविकता यह है कि सेवानिवृत्ति के बाद सैनिकों को अपना प्रबंध खुद करना पड़ता है। एक सैनिक, जो 36-45 की उम्र में पेंशन पा रहा होता है, अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों के चरम पर होता है। उसके बच्चे अभी पढ़ ही रहे होते हैं और माता-पिता बुजुर्ग हो जाते हैं। इसलिए ज्यादातर सेवानिवृत्त सैनिक दूसरी नौकरी तलाशने लगते हैं और मौजूदा माहौल में वे केवल सुरक्षा गार्ड के रूप में नियुक्त होते हैं, जो अपमानजनक है। कम उम्र में ही सेना से आम नागरिक में अचानक परिवर्तन सैनिकों की सेहत पर भी असर डालता है। वित्तीय दबाव और घर के पास उपयुक्त रोजगार की कमी बढ़ती पारिवारिक दायित्वों में तनाव पैदा करती है। आर्मी ग्रुप इंश्योरेंस फंड द्वारा उपलब्ध कराए गए सीमित आंकड़ों पर आधारित 2006 में एक अध्ययन कराया गया, जिसमें पाया गया कि ज्यादातर सेवानिवृत्त सैनिकों की सेवानिवृत्ति के दस वर्ष के भीतर ही 41-55 की उम्र में मृत्यु हो जाती है। यह बताता है कि उनकी जीवन प्रत्याशा राष्ट्रीय औसत से काफी कम होती है। हालांकि यह निष्कर्ष अधूरा है और गहन विश्लेषण की मांग करता है।
वन रैंक-वन पेंशन की मांग शीघ्र सेवानिवृत्ति पर आधारित है। इसी पृष्ठभूमि में सेना मुख्यालय ने अब सेवा स्थिति में पांच वर्ष और बढ़ाने की मांग की है। इसके पीछे कलर सर्विस को 24 वर्ष तक बढ़ाने का इरादा है। इस प्रकार अगर सेवा में योगदान की उम्र समान रहती है, तो सेवानिवृत्ति की उम्र न्यूनतम पांच वर्ष की बढ़ोतरी होने पर 41 से 43 के बीच होगी। इससे सेवानिवृत्त सैनिकों को अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियां पूरी करने में मदद मिलेगी। इससे उनकी पेंशन भी बढ़ेगी, क्योंकि वे लंबी अवधि तक सेवा में रहेंगे। सरकार के लिए भी यह लाभकारी होगा, क्योंकि इससे उनका पेंशन बिल कम हो जाएगा।
जो लोग इस विचार का विरोध करते हैं, वे मानते हैं कि जैसे ही सैनिकों की उम्र बढ़ती है, उनकी शारीरिक तंदुरुस्ती पर असर पड़ता है। लेकिन इसका असर सीमित रूप से ही पड़ता है। कुछ अन्य पहलू हैं, जिन पर विचार करने की जरूरत है। जैसे, पारिवारिक दबाव के कारण सभी सैनिक 24 वर्ष तक सेवा करने के इच्छुक नहीं हो सकते। इस समय कुछ ऐसे सैनिक हैं, जो दो साल भी सेवा विस्तार के लिए स्वेच्छा से तैयार नहीं हैं। इसलिए इस नीति को एकतरफा ढंग से लागू नहीं करना चाहिए। इससे सैनिकों की पसंद पर छोड़ना चाहिए। अनेक ऐसे सैनिक, जिनके पास वैकल्पिक आय के स्रोत, मसलन खेती की जमीन, नहीं हैं और दायित्व पूरा करना बाकी है, वे सेवा जारी रखेंगे। पूर्ण पेंशन मूल सेवा पर होनी चाहिए, जिसे बढ़ाकर 20 वर्ष तक किया जा सकता है और अतिरिक्त सेवा के आधार पर पेंशन में वृद्धि की जा सकती है।
दूसरी बात, यह सुविधा निम्न चिकित्सीय श्रेणी के लोगों के लिए भी होनी चाहिए। सेना जैसा एक बड़ा संगठन हमेशा उन लोगों की देखभाल कर सकता है, जिन्होंने चिकित्सकीय रूप से अनुपयुक्त होने के बावजूद काम किया है। तीसरी बात, प्रशिक्षण अवधि को भी सेवा में शामिल करना चाहिए। अगर ऐसा किया गया, तो इसे एक वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है, क्योंकि प्रशिक्षण अवधि न्यूनतम एक वर्ष की होती है।
प्रस्तावित प्रणाली का एक बड़ा नुकसान यह है कि ज्यादा उम्र में सेवानिवृत्ति के बाद पुनर्वास कठिन हो जाता है। ईएसएम (सशस्त्र बल में किसी भी रैंक में काम कर चुके सैन्यकर्मी) नियोजन के लिए जिम्मेदार विभिन्न निकायों को प्रोत्साहित करके डिफेंस सिक्योरिटी कोर में रिक्तियों को बढ़ाकर इसे कम किया जा सकता है और सेवानिवृत्त सैन्यकर्मियों के लिए निर्धारित कोटा को सख्ती से लागू करने के लिए राज्य और अन्य केंद्रीय एजेंसियों को मजबूर किया जा सकता है।
आदर्श रूप से अधिकारियों के समान सैनिकों को पूर्ण पेंशन प्राप्त करने के लिए कम से कम 20 साल की सेवा करने के लिए कहा जा सकता है और 125 से 150 फीसदी पेंशन बढ़ोतरी के लिए तीन-चार साल अतिरिक्त सेवा के लिए कहा जा सकता है। इस दृष्टिकोण से सेवानिवृत्ति के समय अधिकतम सैनिकों को फायदा होगा, उनकी घरेलू जिम्मेदारियां घटेंगी, जबकि उनकी पेंशन बढ़ेगी। हालांकि सैनिकों को उनकी इच्छा के खिलाफ अतिरिक्त अवधि तक सेवा के लिए मजबूर करना सही दृष्टिकोण नहीं हो सकता औेर इससे असंतोष बढ़ सकता है।