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हिंसक राजनीति के परिणाम

Sun, 29 Jul 2018 06:24 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 29 Jul 2018 06:24 PM IST
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The results of violent politics
तवलीन सिंह

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत का मान-सम्मान दुनिया की नजरों में इतना ऊंचा हो गया था कि तब शायद ही विदेशी मीडिया में अपने देश के बारे में कोई बुरी खबर पढ़ने या सुनने को मिलती थी। कोई डेढ़ वर्ष तक ऐसा ही रहा।


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फिर 28 सितंबर, 2015 की रात उत्तर प्रदेश में दादरी के बिसहड़ा गांव में मोहम्मद इकलाख को उसके अपने घर के अंदर ही गांव के लोगों ने सरेआम लाठियों से पीट-पीटकर मार डाला और उसके जवान बेटे को जख्मी हालत में सड़क पर मरने के लिए छोड़ दिया। जब प्रधानमंत्री मोदी इस बर्बर घटना के बाद भी मौन रहे और उनके कुछ साथियों ने संकेत दिया कि उनकी राय में इकलाख की हत्या करके उसके हत्यारों ने ठीक किया, क्योंकि उसके फ्रिज के अंदर से गोश्त पाया गया था, जो गाय का हो सकता था, तो मोदी के लिए एक नया दौर शुरू हुआ। आज हालत यह है कि विदेशी अखबारों में जब भी भारत की कोई खबर पढ़ने को मिलती है, तो मेरा सिर शर्म से झुक जाता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि ये खबरें हमेशा हिंसा, बच्चियों के बलात्कार, नफरत और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार से संबंधित होती हैं।

सो पिछले सप्ताह राजस्थान के अलवर के रकबर खान की हत्या विदेशी मीडिया में खूब चर्चा में रही, क्योंकि इस बार एक नया पहलू यह था कि राजस्थान के पुलिस वालों ने रकबर को अस्पताल तक पहुंचाने में तीन घंटे लगाए। साथ में कुछ गवाहों के बयान भी आए कि पुलिस वालों ने ही रकबर को मारा। दुनिया की नजरों में किसी देश को बर्बरता का केंद्र साबित करने के लिए इतना काफी होता है। लेकिन साथ में अलवर के विधायक ने हत्यारों की तरफदारी की और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बड़े नेता इंद्रेश कुमार ने यह भी कह डाला कि जब तक गोहत्या पूरी तरह रुकती नहीं है, तब तक ऐसी घटनाएं होती रहेंगी। हमेशा की तरह इस बार भी इस मामले पर प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ नहीं कहा।

इस बीच प्रधानमंत्री मोदी अफ्रीका में रवांडा के दौरे पर थे और वहां के लोगों को कुछ भारतीय गायें दान करती उनकी तस्वीरें आईं। यह माना कि आम भारतीयों की नजरों में गोहत्या महापाप है। यह भी माना कि मोदी की नजरों में भी ऐसा है। लेकिन प्रधानमंत्री क्या भूल गए हैं कि अपने देश में ऐसे दलित हिंदू भी हैं, जो गोमांस खाते हैं, और पूर्वोत्तर के कई राज्यों के ईसाइयों में बीफ खाना आम बात है? इससे भी महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या हम ऐसा भारत बनाना चाहते हैं, जहां गोमांस खाने का दंड सजा-ए-मौत होगा?

हिंसक राजनीति के कुछ परिणाम अभी से मिलने लग गए हैं। पहले जहां सिर्फ गोरक्षक कानून को अपने हाथों में लेकर मुसलमानों और दलितों की हत्याएं करते थे, वहीं अब देश भर में भीड़ द्वारा हत्याओं की महामारी फैलने लग गई है। अलग-अलग राज्यों में आम लोगों की भीड़ बच्चा चोरी के शक पर इकट्ठा होकर बेगुनाह लोगों की हत्या करने लग गई है।
 
विदेशी मीडिया में इस तरह की खबरें इतनी ज्यादा चर्चा में हैं कि उस दौर को याद करना अब मुश्किल है, जब मोदी के प्रधानमंत्री बन जाने के बाद दुनिया भारत की तरफ मान-सम्मान से देखा करती थी। उस दौर को याद करना मुश्किल है, जब दुनिया के सबसे सम्मानित राजनेताओं में भारत के प्रधानमंत्री की गिनती होती थी। अब अगर ऐसा नहीं है, तो इसमें दोष मोदी का ही है, क्योंकि जब हिंसा, घृणा और जंगल राज के खिलाफ बोलने का समय था, उस समय उनके मुंह से निंदा के दो शब्द भी सुनने को नहीं मिले। अब शायद बहुत देर हो चुकी है।

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