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रोजगारहीन विकास का सिद्धांत झूठा
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रोजगार को लेकर चल रही बहस निराधार बयानों के कारण बेहद भयावह हो गई है, क्योंकि मीडिया में रोजगार के विकास की वास्तविक स्थिति को बेहद कम करके दिखाया जा रहा है। हालिया घटनाक्रम में आंकड़ों पर काम करने वाले एक थिंकटैंक ने दावा किया कि भारत में कामकाजी आबादी में पिछले वर्ष एक करोड़ की कमी हुई है। ये आंकड़े, लगता है, सीएमआईई द्वारा अवसरवादी ढंग से 1.40 लाख उत्तरदाताओं के ऋणात्मक नमूनों से प्रारंभिक अनुमानों पर निर्धारित समय से दो महीने पहले जारी किए गए हैं, जबकि 5.5 लाख उत्तरदाताओं के पूर्ण नमूने के आंकड़ों को फरवरी, 2019 के शुरू में जारी किया जाना था। जाहिर है, इसका संबंध आने वाले चुनाव से है, जिसके चलते इसे निर्धारित समय से पहले ही जारी कर दिया गया!
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रोजगार के मामले में एक स्पष्ट दृष्टिकोण प्राप्त करने के लिए हमें उन स्रोतों के आंकड़ों को समझना होगा, जहां से रोजगार सृजित होते हैं और जो रोजगार के सबसे बड़े योगदानकर्ताओं के बदलावों का आकलन करता है। परिवहन का क्षेत्र भारत में सबसे ज्यादा रोजगार सृजित करने वाले क्षेत्रों में से एक है। हमने पिछले कुछ वर्षों में वार्षिक आधार पर इस क्षेत्र द्वारा रोजगार सृजन का आकलन करने के लिए एक अध्ययन किया है। हमने वाणिज्यिक वाहनों (मध्यम और भारी और हल्के वाणिज्यिक वाहनों), यात्री वाहनों (यात्री कारों, उपयोगिता वाहन और वैन), तिपहिया वाहनों और ट्रैक्टरों की घरेलू बिक्री के आंकड़ों पर विचार किया है, ताकि अर्थव्यवस्था में नौकरियों का अनुमान लगाया जा सके। आंकड़े सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (एसआईएम) और ट्रैक्टर ऐंड मैकेनाइजेशन एसोसिएशन (टीएमए) से एकत्र किए गए हैं, जो ऑटोमोबाइल और कृषि मशीनीकरण (ट्रैक्टर बिक्री के लिए) उद्योगों के लिए शीर्ष निकाय हैं। ये निकाय भारत के विभिन्न ऑटोमोबाइल निर्माताओं से एकत्र किए गए उत्पादन, बिक्री और निर्यात के रुझानों पर नियमित रूप से आंकड़े जुटाते और प्रसारित करते हैं।
भारत में खरीदे जाने वाले हर वाहन से रोजगार पैदा होता है। उदाहरण के लिए, वाणिज्यिक वाहन आम तौर पर दो नौकरियां सृजित करते हैं, एक ऑटो रिक्शा औसत 1.5 नौकरियों का सृजन करता है, क्योंकि यह आमतौर पर विभिन्न ड्राइवरों द्वारा कई पारियों में उपयोग किया जाता है। एक टैक्सी से एक रोजगार का सृजन होता है और फिर कई लोगों के पास अपनी कार चलाने के लिए ड्राइवर होते हैं। इसलिए हम मान सकते हैं कि प्रति चार कार की बिक्री से एक रोजगार का सृजन होता है। ट्रैक्टर से भी प्रति वाहन बिक्री से एक रोजगार का सृजन होता है। फिर हम कुल घरेलू बिक्री से प्रतिस्थापन दर को घटाते हैं, यात्री वाहनों में उचित प्रतिस्थापन दर 20 फीसदी, वाणिज्यिक वाहनों में 25 फीसदी, तिपहिया वाहनों में 10 फीसदी (उपयोग की लंबी अवधि करीब 10-15 साल होने के कारण) और ट्रैक्टर पर 20 फीसदी होती है। ऐसा इन वाहनों की बिक्री से पैदा हुई नई नौकरियों और मौजूदा श्रमिकों द्वारा अपने वाहनों के उन्नयन पर विचार करने के लिए किया जाता है। यह संभव है कि बिक्री और वास्तविक उपयोग के बीच एक अंतराल हो, लेकिन समय के साथ यह सामान्य हो जाता है। विश्लेषक नई नौकरियों की गणना करने के लिए प्रतिस्थापन के अपने अनुमान लगा सकते हैं।
यहां ध्यान दिया जाना चाहिए कि इस क्षेत्र में रोजगार सृजन की गणना करते हुए हमने इससे पैदा होने वाली सहायक नौकरियों पर विचार नहीं किया है, जैसे मरम्मत, सर्विसिंग, स्पेयर्स पार्ट्स की बिक्री, सीधे या सेकंड हैंड बिक्री से पैदा रोजगार और स्वयं वाहनों की बिक्री और इन वाहनों के कबाड़ और अंत में बीमा और वित्त पोषण से पैदा होने वाले रोजगार। ये सहायक नौकरियां अपने आप में आकार में महत्वपूर्ण हैं।
हालांकि, इस अध्ययन के लिए हमने केवल प्रत्यक्ष रोजगार सृजन पर ध्यान दिया है, फिर भी पैदा होने वाले रोजगार की संख्या स्पष्ट रूप से पर्याप्त हैं। हमने राजग सरकार के सत्ता में आने के वक्त एक अप्रैल, 2014 से 31 दिसंबर, 2018 तक के वाहनों की बिक्री के वार्षिक आंकड़ों को अपने अध्ययन में शामिल किया है। वर्ष 2014-15 में परिवहन क्षेत्र में कुल 20,02,885 रोजगार का सृजन हुआ, जबकि वर्ष 2015-16 में 27,07,990, वर्ष 2016-17 में 28,37,951, वर्ष 2017-18 में 33,69,67 और वर्ष 2018 के नौ महीनों के दौरान 27,85,630 रोजगार का सृजन हुआ। इस तरह राजग के शासन काल में सिर्फ परिवहन के क्षेत्र में 1.4 करोड़ रोजगार का सृजन हुआ। इस कार्यबल का एक बड़ा हिस्सा एक महीने में लगभग 20-25 हजार रुपये की अच्छी आय अर्जित करता है। इन नौकरियों के लिए स्पष्ट रूप से मांग बढ़ी है। करीब 70 फीसदी माल की ढुलाई भारत में सड़क मार्ग से वाहनों के जरिये होती है और माल ढुलाई में रेलवे की हिस्सेदारी घटती जा रही है। हमारी अर्थव्यवस्था का आकार 26 खरब डॉलर का हो गया, जो सात फीसदी से ज्यादा की दर से विकास कर रहा है, और इससे भारी संख्या में रोजगार पैदा हो रहे हैं। बस हमें नौकरी पैदा करने वाले क्षेत्रों को देखना होगा और रोजगार की संख्या का अनुमान लगाना होगा।
ऐसे आलोचक हो सकते हैं, जो रोजगार से संबंधित हमारे अनुमानों की आलोचना कर सकते हैं और हम उनका स्वागत करेंगे। हम स्वागत करेंगे कि प्रतिस्थापन के बारे में वे अपना अनुमान पेश करें और रोजगार सृजन से संबंधित अपने आंकड़े लेकर सामने आएं। रोजगार सृजन से संबंधित अंतिम आंकड़े जो भी हों, लेकिन जो भी इस आंकड़े को देखता है, वह निर्विवाद रूप से इस बात की पुष्टि करता है कि परिवहन और अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन हो रहा है। इसके अलावा औपचारिक रूप से रोजगार की गणना ईपीएफओ, ईएसआई और एनपीएस के जरिये होती है और पेशेवर क्षेत्र में रोजगार की संख्या और भी बड़ी है। रोजगार विहीन विकास का सिद्धांत उन विश्लेषकों ने गढ़ा है, जिन्होंने इस आंकड़े को नहीं देखा है। वास्तव में वे फर्जी हैं।
लेखक मणिपाल ग्लोबल एजुकेशन सर्विस के चेयरमैन हैं