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अल्पसंख्यक होने की पीड़ा

Sun, 08 Oct 2017 05:57 PM IST
तस्लीमा नसरीन
तस्लीमा नसरीन Updated Sun, 08 Oct 2017 05:57 PM IST
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The pain of being minority
महिला

औरतों की किस्मत में हमेशा सहना ही लिखा है, फिर चाहे वह मुस्लिम हो या हिंदू, बौद्ध हो या ईसाई।  बांग्लादेश की हिंदू महिलाएं आज कह रही हैं कि वे विवाह विच्छेद यानी पति से अलग होने का अधिकार चाहती हैं। बहुतेरे लोग नहीं जानते कि बांग्लादेश की हिंदू महिलाओं के पास यह अधिकार नहीं है। बांग्लादेश के मुस्लिम कानून में कमोबेश बदलाव लाने के बावजूद वहां का हिंदू कानून जस का तस रह गया है, क्योंकि उसे वैसे ही रखने के लिए बाध्य किया गया है। जिस तरह भारत के मुसलमान मुस्लिम पर्सनल लॉ में किसी तरह का बदलाव नहीं चाहते, वैसे ही बांग्लादेश के हिंदू कट्टरवादी हिंदू परिवार कानून में कोई बदलाव नहीं चाहते। दरअसल कट्टरवादी, चाहे वे कहीं के क्यों न हों, उनमें कोई फर्क नहीं होता। तमाम कट्टरवादी नारी विरोधी होते हैं। वे नहीं चाहते कि महिलाओं को आजादी मिले, जो कि उनका जन्मसिद्ध अधिकार है।


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बांग्लादेश की मुस्लिम महिलाएं समय-समय पर यह मांग करती रहती हैं कि उनके परिवार कानून धर्म के आधार पर न होकर समानाधिकार के आधार पर होने चाहिए। लेकिन इसका कोई फायदा नहीं होता, क्योंकि नारी-विरोधियों के समूह तत्काल उनके खिलाफ जहर उगलने लगते हैं। वहां की हिंदू महिलाएं तो अपने सिविल लॉ में बदलाव लाने के लिए आवाज उठाने का साहस भी नहीं कर पातीं। वे बखूबी जानती हैं कि सरकार से पहले अपने समाज के कट्टरवादी ही उनकी मांग का विरोध करते हुए सड़कों पर उतर आएंगे। लेकिन बांग्लादेश में हिंदू नारियों के साथ जिस तरह का व्यवहार हो रहा है, वह सहनशक्ति की सीमा पार करता जा रहा है। इसलिए यह उम्मीद पैदा होती है कि कभी न कभी तो वे अपनी मांगों के लिए अपनी आवाज बुलंद करेंगी ही।

इसके ब्योरे हैं कि किस तरह बांग्लादेश की हिंदू महिलाएं पति के हाथों, ससुरालियों और समाज के हाथों प्रताड़ित हो रही हैं। ऐसी अनेक महिलाएं डर के कारण या मजबूरी में पति से अलग रह रही हैं, लेकिन वे तलाक नहीं ले सकतीं, क्योंकि उन्हें यह अधिकार प्राप्त नहीं है। वहां के मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि हिंदू महिलाओं में पतियों से अलग रहने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। विवाह विच्छेद का अधिकार न होने के कारण ऐसी महिलाओं में क्षोभ बढ़ रहा है। ढाका के लक्ष्मीबाजार इलाके में एक हिंदू महिला को ससुराल से इसलिए निकाल दिया गया कि वह संतान चाहती थीं, लेकिन पति और ससुराल वाले नहीं चाहते थे। मायके में उसे बेटी हुई, तो ससुराल वालों ने उसे अपनाने से इन्कार कर दिया।

लड़कियां जितनी शिक्षित, स्वावलंबी और सजग होंगी, तलाक की संख्या उतनी ही बढ़ेगी। यह पूरी दुनिया की सच्चाई है। लेकिन यह बेहद अस्वाभाविक है कि पुरुष शिक्षित और आत्मनिर्भर तो हो रहे हैं, लेकिन वे संवेदनशील नहीं हैं। बांग्लादेश का ही उदाहरण लीजिए, तो वहां हिंदू महिलाओं को तलाक का अधिकार न होने के कारण वे दूसरी शादी भी नहीं कर पातीं। दूसरी ओर, पुरुष न केवल जितनी चाहें, उतनी शादियां कर सकते हैं, बल्कि पत्नियों को तलाक देने का अधिकार भी उनके पास है।

ढाका का एक मानवाधिकार संगठन आईन व सालिश केंद्र शोषित नारियों को कानूनी मदद भी देता है। उसका कहना है कि हाल के वर्षों में उसके पास हिंदू महिलाओं की शिकायतें ही अधिक आ रही हैं। इस केंद्र की प्रमुख नीना गोस्वामी कहती हैं कि हिंदू महिलाएं ज्यादातर ससुराल में निर्यातित होने की शिकायत लेकर आती हैं और पति से अलग रहना चाहती हैं। कानूनी मदद से उन्हें पति से गुजारा भत्ता तो मिल जाता है, लेकिन शादी से बाहर निकलने का दरवाजा नहीं खुलता।

बांग्लादेश की हिंदू महिलाओं का पैतृक संपत्ति पर भी अधिकार नहीं है। पिता की संपत्ति बेटों को मिलती है, बेटियों को नहीं। विवाह के बाद पति की संपत्ति की स्वामिनी भी वे नहीं हो सकतीं। सुप्रिया दत्त ढाका विश्वविद्यालय से एमए करने के बाद फरीदपुर के एक कॉलेज में प्राध्यापक हो गईं। लेकिन पति की मृत्यु के बाद उन्हें अपनी ससुराल में जाकर रहना पड़ा। वह कहती हैं कि अगर मेरा एक बेटा नहीं होता, तो शायद मुझे ससुराल में शरण भी नहीं मिलती। मायके वह नहीं जातीं, वहां शरण लेने की तो बात ही छोड़ दें।

आश्चर्यजनक यह है कि भारत और नेपाल में हिंदू कानून में समयोचित परिवर्तन किए जाने तथा महिलाओं को तलाक देने और विधवा हो जाने के बाद दोबारा विवाह करने का अधिकार मिलने के बावजूद बांग्लादेश में इन बदलावों की जरूरत महसूस नहीं की गई। सिर्फ 2012 में वहां शादियों के रजिस्ट्रेशन का कानून बना, पर वह भी अनिवार्य नहीं है। उस वक्त जब तत्कालीन कानून मंत्री से हिंदू महिलाओं के अधिकारों के बारे में पूछा गया था, तब उन्होंने कहा था, हिंदू महिलाओं को विवाह विच्छेद और संपत्ति के मालिकाना जैसे अधिकार देना जरूरी है। लेकिन अगर सरकार इस दिशा में कोई कदम उठाएगी, तो उस पर धार्मिक निष्ठा पर हमला करने का आरोप लग सकता है। इसी आशंका से सरकार कोई कदम नहीं उठाती।

बांग्लादेश में जो संगठन हिंदू हितों के पक्ष में आवाज उठाते हैं, वे भी हिंदू नारियों के अधिकार पर चुप्पी साधे हुए हैं। यहां तक कि विवाह के रजिस्ट्रेशन को अनिवार्य कर देने के मामले मे भी वे कुछ नहीं कहते। हद तो यह है कि पढ़े-लिखे हिंदू भी बदलाव के पक्ष में नहीं दिखते। ढाका विश्वविद्यालय में अध्यापक निम चंद्र भौमिक कहते हैं, विवाह या परिवार के बारे में धार्मिक रीति-रिवाज लंबे समय से चले आ रहे हैं। इन धार्मिक रीति-रिवाजों को बदल देने के मामले में हिंदू समाज में एक किस्म की जड़ता है।

भारत के मुसलमान जिस तरह कहते हैं कि शरिया कानून में बदलाव नहीं किया जा सकता, वैसे ही बांग्लादेश के हिंदू मानते हैं कि शास्त्र पवित्र हैं और उनका पालन करना प्रत्येक हिंदू का दायित्व है। और विडंबना देखिए, इन दोनों ही देशों में अल्पसंख्यक समाज की इस जड़ता का खामियाजा औरतें भुगतती हैं। 

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