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इस जनतंत्र में प्रतिपक्ष
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सुधीर विद्यार्थी
निंदक नियरे राखिये का दर्शन अब पुराना पड़ चुका है। मौजूदा लोकतंत्र में प्रतिपक्ष की अवधारणा निरंतर छीजती चली जा रही है, जबकि सशक्त प्रतिपक्ष जनतंत्र की प्राथमिक शर्त है। स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक जब संसदीय राजनीति का आधार विचार था, तब दलों के मध्य स्पष्ट सीमारेखाएं और पक्षधरताएं विद्यमान थीं। आज सभी संसदीय पार्टियां के चुनाव जीतने और सत्ता बचाए रखने तक महदूद हो जाने से देश की राजनीति में एक विचित्र प्रकार का संकट उपस्थित हो गया है। मध्यमार्गी दलों की बात छोड़ दें, अब वाम और दक्षिण के अंतर को भी चीन्हना दुश्वार हो गया है। सिद्धांतविहीन राजनीति ने एक दल से दूसरे दल में आवाजाही को आसान बना दिया है।
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'सब कुछ सत्ता, सभी कुछ ओहदा’ के चलते प्रतिपक्ष की राजनीति का क्षरण एक भयावह दुःस्वप्न की तरह हमारे सामने है। अशक्त विपक्ष का भी सत्ता समीकरणों में उलझाव और लिप्तता उसे उसके लक्ष्य और रास्ते से भटकाने में बड़ी भूमिका निभाती है। आज विभाजित प्रतिपक्ष जनांदोलन की शक्ति खो चुका है। राजनीतिक दलों के नेतृत्व में किसी बड़े जनसंघर्ष की कल्पना हमारे लिए निरर्थक हो चली है। क्या जनता ही प्रतिपक्ष की उपस्थिति को नकारने लग गई है? दिल्ली विधानसभा का परिदृश्य इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां विपक्ष की जरूरत को दिल्ली के मतदाआओं ने ही जरूरी नहीं समझा। वहां पूरा सदन ही कमोबेश प्रतिपक्ष विहीन है। एक समय सदन में प्रतिपक्ष को भरपूर सम्मान दिया जाता था। चुनावों में प्रतिपक्ष के बड़े नेताओं के विरुद्ध सत्ता पक्ष अपने अशक्त प्रत्याशी खड़े करता था, ताकि देश और सदन उनके राजनीतिक अनुभवों से समृद्ध हो सके। पर अब तो बौद्धिक और मंजे हुए प्रतिपक्ष को फिल्मी या खेल की दुनिया के सितारों के जरिये मात देने के लिए शतरंज बिछाई जाती है। राममनोहर लोहिया क्या प्रतिपक्ष के नेता रहते हुए सत्ता पक्ष के किसी नेता से कमतर थे? जयप्रकाश नारायण निरंतर प्रतिपक्ष बने रहकर ही बड़ा मुकाम हासिल कर पाए। प्रतिपक्षी होना देशद्रोह नहीं है, पर इन दिनों सत्ताधारी दल और सरकार की ओर से प्रतिपल उसे इस 'सम्मान’ से विभूषित किया जा रहा है। आप सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं, तो देश के दुश्मन हैं! यह वही देश है, जिसमें कभी शास्त्रार्थ की समृद्ध परंपरा थी। पर अब सब तरफ वैमनस्य के कंटीले झाड़ उग आए हैं। दक्षिणपंथी, मध्यमार्गी और वामपंथी पार्टियों के बीच से सिद्धांत गधे के सींग की भांति अदृश्य हो चले हैं, जिसके चलते दलबदल पर कोई बंदिश नहीं, न उसके प्रति जनता में ही कोई हिकारत का भाव दिखाई पडता है।
जनतंत्र में प्रतिपक्ष सिर्फ राजनीतिक दल नहीं होते। पत्रकारिता और साहित्य भी कमोबेश यह भूमिका तय करते हैं। पर मीडिया के बड़े हिस्से का सत्तामुखी होना इस संकट में और भी वृद्धि कर रहा है। पत्रकारिता और साहित्य कभी सत्ता की मानमानी चालों के लिए खतरा बनकर खड़े होते थे। पर चालाक व्यवस्था ने अपनी चालों से उनके सामने सुविधाओं और का चमकीला संसार खड़ा कर दिया है। कुंभनदास किस खेत की मूली हैं, आज के अधिकांश कलमकारों ने अपनी-अपनी छोटी सीकरियां तय कर ली हैं। जनता की पक्षधरता और उसके राजनीतिक शिक्षण की बात करना आज वाम दलों के भीतर भी बेमानी है।