हमारी सांस्कृतिक बहुलता के मायने
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भारत की सांस्कृतिक बहुलता स्पष्ट है, अगर हम अपने आसपास देखें और अपनी आंख, कान और दिमाग खुला रखें, तो इसकी उज्ज्वल अभिव्यक्ति से इनकार नहीं कर सकते। भारत की विविधता के बारे में बातचीत के घेरे में भारत की संस्कृति भी आ जाती है। हर हफ्ते किसी राज्य, धर्म और समुदाय में कोई न कोई उत्सव होता है। विभिन्न राज्यों, नगरों, शहरों, गांवों में रोजाना मनाए जाने वाले हजारों उत्सव भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की जीवंतता और विविधता को दर्शाते हैं। संस्कृति के व्यापक विस्तार के भीतर हम कई उपसंस्कृतियों के भी साक्षी हैं। किसी एक जगह जो विचार, परंपरा, रिवाज वगैरह प्रमुख होते हैं, वे मात्र सौ किलोमीटर की दूरी पर नहीं होते। हालांकि हिंदू धर्म से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ आगामी कुंभ मेला भारत की सांस्कृतिक बहुलता को विराट कैनवास पर प्रस्तुत करता है।
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प्रत्येक जीवित संस्कृति विकसित होती है, यह कुछ नए प्रभावों को स्वीकार करती है और पुराने को त्याग देती है। कई परंपराएं, मान्यताएं और रीति-रिवाज सदियों पुराने हैं, लेकिन जरूरी नहीं है कि वे अपने मूल रूप में मनाए जाते हों। सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भारत समग्र संस्कृति का उदाहरण है। यह विभिन्न रंगों और खुशबुओं वाले फूलों का गुलदस्ता है। यह विभिन्न सांस्कृतिक पहचानों को साथ-साथ रहने और फलने-फूलने की अनुमति देता है; यही गुण भारतीय संस्कृति को बेहद समृद्ध और आकर्षक बनाता है।
एक जीवंत संस्कृति दूसरी अन्य संस्कृतियों को प्रभावित करती है और खुद भी प्रभावित होती है। सम्राट अशोक ने अपने पुत्र एवं पुत्री को सांस्कृतिक दूत के रूप में बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए भेजा था। श्रीलंका, चीन, दक्षिण कोरिया, जापान, म्यांमार, थाईलैंड, आदि में इसका प्रभाव देखा जा सकता है। कंबोडिया में अंकोरवाट मंदिर (जिस पर हिंदू एवं बौद्ध संस्कृति का स्पष्ट प्रभाव है) और इंडोनेशिया के मध्य जावा स्थित बोरोबुदुर मंदिर दुनिया का सबसे विशाल बौद्ध मंदिर है, जो दक्षिण-पूर्वी एशिया में भारत के सांस्कृतिक प्रभाव के ऐतिहासिक पदचिह्न को दर्शाता है। दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेशिया की राजधानी में ज्यादातर मुस्लिम अभिनेताओं द्वारा रामायण के विभिन्न प्रकरणों का प्रदर्शन होता है, जो सांस्कृतिक बहुलतावाद और सांस्कृतिक सहिष्णुता का प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत करता है। कई देशों में रहने वाले भारतीय प्रवासियों की दो करोड़ से ज्यादा बड़ी आबादी अपने सांस्कृतिक संबंध भारत से जोड़े रखती है और उन्हें अपने तरीके से मनाती है।
चाहे हम मानें या न मानें, लेकिन सदियों से भारत आने वाले आक्रमणकारियों-मकदूनियों, अरबों, अफगानों, तुर्कों, फारसियों, मुगलों (जो यहां आकर बस ही गए), पुर्तगालों, फ्रांसिसियों और अंग्रेजों ने, जो यहां व्यापार करने आए और शासक बन बैठे, भारत की संस्कृति पर एक अमिट प्रभाव डाला। इसे स्वीकार करने में कुछ भी गलत नहीं है। हमारे खान-पान, रहन-सहन, बोलने के ढंग आदि पर बाहरी प्रभाव दिखता है, खासकर शहरी क्षेत्रों में। और आज की तकनीकी नवाचार और संचार क्रांति पहले से कहीं ज्यादा हमारी संस्कृति को प्रभावित कर रही है। भारत की सांस्कृतिक बहुलता में गर्व करने लायक बहुत कुछ है, लेकिन नेक विचारों व आदर्शों तथा कठोर जमीनी हकीकत के बीच की खाई बेहद निराशाजनक रही है। सिंधु घाटी सभ्यता के समय से देवी की पूजा करने के बावजूद हम बड़े पैमाने पर ऑनर किलिंग, खाप पंचायत, दहेज हत्या और कन्या भ्रूण हत्या जैसी घटनाओं के साथ जीते हैं।
हम वसुधैव कुटुम्बकम का शोर मचाते हैं, लेकिन अपने कुटुम्बों को सदियों से मानवाधिकारों से वंचित रखते हैं। तब हमारी सांस्कृतिक बहुलता कहां चली जाती है, जब कई राज्यों में अनुसूचित जाति के लोगों को मदिरों में प्रवेश करने से रोक दिया जाता है। जैसा कि एक बार भारत के प्रधान न्यायाधीश ने कहा, अनुसूचित जाति की लड़कियों के साथ नियमित रूप से बलात्कार होता है, लेकिन कोई भी उनके लिए मोमबत्ती नहीं जलाता। बंधुआ मजदूर, बालश्रम, देवदासी प्रथा अब भी जारी है। ऊना में दलितों की पिटाई और गौ-रक्षकों द्वारा हत्या की घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब की है। इसलिए दुनिया भर के लोगों को अपना कुटुम्ब बताने से पहले हम अपने कुटुम्बों का तो ख्याल करें।
सर्वधर्म समभाव भारत के लिए आदर्श है, क्योंकि यह चार प्रमुख धर्मों की जन्मस्थली है। भारत को आसाराम बापू और राम रहीम जैसे बाबाओं की नहीं, बल्कि सांप्रदायिक सौहार्द को बढ़ावा देने के लिए कबीर, मोइनुद्दीन चिश्ती, ज्योतिबा फूले, नरसी मेहता, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद जैसे लोगों की जरूरत है। समावेशीकरण और सांस्कृतिक बहुलता के बिना भारत जीवित नहीं रह सकता, हमें इन मूल्यों का संरक्षण करना चाहिए।
राष्ट्रीय पहचान एक जटिल और बहुस्तरीय मुद्दा है। क्या यह हमारे राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्र गान के सम्मान से अधिक गहरा नहीं है, जिसका हमें सम्मान करना चाहिए? क्या हम दुश्मनों का सामना करने के लिए एकजुट हैं? क्या आज अपनी राष्ट्रीय पहचान के मूल की तलाश करने के लिए ऋग्वेद और सनातन धर्म प्रासंगिक हैं? क्या एक नागरिक के रूप में हमारी राष्ट्रीय पहचान को हमारा संविधान परिभाषित नहीं करता है? पर भावनात्मक जुड़ाव के विषय में क्या कहा जाए? क्या लोग अपने राष्ट्र के लिए अपना जीवन बलिदान करते हैं? भारत का विचार क्या है? भारत राज्यों का संघ है, अब तक धार्मिक रूप से पीड़ित, क्षेत्रीय व जातिगत विभाजन तथा असमानता, गहरे रूप से परंपरा से बंधा आधुनिक होने के लिए संघर्ष करता समाज, बेहद अनुशासनहीन और अराजक होने के बावजूद अनिवार्य रूप से लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष है, जो अब भी प्रभावी आर्थिक प्रगति नहीं कर पाया है, जहां अब भी एक अरब से ज्यादा लोग सही जगह पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जहां के नागरिक विभिन्न जीवन स्थितियों में जीते हैं और भविष्य के प्रति आशावान हैं।