फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   The Kerala Story Controversy oppose or ban on film against freedom of expression

द केरल स्टोरी: प्रतिबंध के विरुद्ध, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान अभी दूर की बात

Mon, 15 May 2023 07:27 AM IST
taslima nasreen तस्लीमा नसरीन
Updated Mon, 15 May 2023 07:27 AM IST
विज्ञापन
सार
द केरल स्टोरी मेरी पसंदीदा फिल्म नहीं है। इसके बावजूद मैं इस पर प्रतिबंध लगाने की घोर विरोधी हूं। वह दिन कब आएगा, जब भिन्न विचार या सोच के कारण मनुष्यों को निर्वासन और फिल्मों को प्रतिबंध का दंड नहीं भोगना पड़ेगा!
loader
The Kerala Story Controversy oppose or ban on film against freedom of expression
द केरल स्टोरी - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

भारत में द केरल स्टोरी फिल्म पर इन दिनों भारी हंगामा मचा हुआ है। विरोध की आशंकाओं को देखते हुए कई जगह सिनेमा हॉलों से यह फिल्म हटा ली गई है। किसी किताब पर हंगामा मचने से ही उसका प्रकाशन और उसकी बिक्री बंद कर दी जाएगी? हंगामा होने पर किसी फिल्म पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा? हंगामा होने पर किसी चित्र प्रदर्शनी पर ताला लगा दिया जाएगा? हंगामा होने पर किसी लेखक को शहर, राज्य, देश या फिर दुनिया से ही हटा दिया जाएगा? लेकिन क्यों? हमारा समाज हंगामे या विवाद को बर्दाश्त क्यों नहीं कर सकता? कोई फिल्म या डॉक्यूमेंटरी उसके अनुरूप नहीं हुई, तो एक स्वर से उस पर प्रतिबंध लगाने की मांग उठती है। ऐसा क्यों? हमारा समाज दरअसल हलचल या आलोड़न बर्दाश्त नहीं कर पाता। वह यथास्थितिवाद का समर्थक है। वह चाहता है कि समाज की कुरूप और क्रूर सच्चाई सामने न आ पाए।



जहां तक मेरी बात है, तो हाल ही में द केरल स्टोरी फिल्म देखते हुए मुझे ठीक वैसी ही अनुभूति हुई, जैसी द कश्मीर फाइल्स देखते हुए हुई थी। दोनों फिल्मों में एक समुदाय विशेष निशाने पर है। इस दुनिया की करीब 1.9 अरब मुस्लिम आबादी अगर आतंकवादी होती, तो इस पृथ्वी की क्या दशा होती, इसकी कल्पना की जा सकती है। बल्कि मेरा तो मानना है कि कुल मुस्लिम आबादी में नमाज न पढ़ने वाले, रोजा न रखने वाले, मजहब को न जानने और न मानने वाले लोगों की संख्या ही ज्यादा है। दूसरी ओर, महिलाओं के समान अधिकार और मानवाधिकार की बातें करने वाले शिक्षित और सभ्य लोग भी मुस्लिम समाज में कम नहीं हैं।


गुणवत्ता की कसौटी पर द केरल स्टोरी बहुत अच्छी फिल्म नहीं है। इसमें सच्चाई तो है, लेकिन तथ्यों के साथ मनोरंजन भी खूब है। कुरान और हदीस की मानवता-विरोधी व नारी-विरोधी बातें इसमें इतनी डाल दी गई हैं कि संवाद स्वाभाविक और स्वत:स्फूर्त नहीं लगते। आईएस जैसे आतंकी संगठन की बर्बरता पर जो फिल्में इधर बनी हैं, गुणवत्ता के मामले में वे द केरल स्टोरी से बेहतर हैं।

केरल लिट फेस्ट में भाग लेने के लिए वहां के कोझिकोड और कालीकट जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों में कई बार मेरा जाना हुआ है। खासकर कालीकट में स्त्री-पुरुष मेरा भाषण और ऑटोग्राफ लेने जिस बड़ी संख्या में आए थे, उससे मैं हैरान ही हुई थी। वहां मंच से मेरा नाम पुकारे जाने के बावजूद लोगों ने मेरा विरोध और बहिष्कार नहीं किया था। जबकि मेरे विरोध में कोलकाता के 'सेक्यूलर' मुस्लिमों ने जुलूस निकाला था! इसलिए केरल की 32,000 लड़कियां आईएस में शामिल हुई हैं, यह तथ्य मुझे संदिग्ध लगता है। हालांकि यह बताया गया है कि यह वास्तविक आंकड़ा नहीं है। मेरा मानना है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश से आईएस में शामिल होने वालों का आंकड़ा कहीं ज्यादा होगा। इसलिए मेरी नजर में 'पाकिस्तान स्टोरी' या 'बांग्लादेश स्टोरी' बनाना कहीं ज्यादा जरूरी है।

द केरल स्टोरी के आलोचकों में से कुछ का कहना है कि यह सत्य घटना पर आधारित नहीं है। लेकिन इस फिल्म का पूरी तरह सच पर आधारित होना क्यों जरूरी है? ज्यादातर फिल्में काल्पनिक होती हैं। हां, सच्ची कहानी का दावा करने वाली फिल्म अगर सत्य और तथ्य से दूर हो, तो उस पर सवाल उठेंगे ही। लेकिन मेरा प्रश्न है कि क्या यह फिल्म घृणा का प्रचार-प्रसार कर रही है। मेरा यह मानना है कि कोई भी फिल्म या कलाकृति घृणा नहीं फैलाती या आग नहीं लगाती। दरअसल यह घृणा या आग मनुष्य की सोच में पहले से होती है, जो इसे देखते हुए भड़क उठती है। तो इसमें कला का दोष है या मनुष्य और समाज का? कला या कलाकार हिंसा नहीं भड़काते, यह काम तो राजनेताओं का है। किसी नाटक या फिल्म के प्रदर्शन से समाज में हिंसा फैलती है, तो उसके पीछे अपरिपक्व राजनेताओं का हाथ सबसे अधिक होता है। उन्हीं के कारण समाज में अशांति फैलती है।  

द केरल स्टोरी मेरी पसंदीदा फिल्म नहीं है। इसके बावजूद मैं इस फिल्म पर प्रतिबंध लगाने की घोर विरोधी हूं। हो सकता है, यह फिल्म कुछ लोगों को मुस्लिम-विरोधी बनने के लिए प्रेरित करे। अनेक साहित्य और शिल्प कृति किसी दर्शन के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने के लिए मनुष्य को उद्बुद्ध करती है। लेकिन इसका अर्थ कतई नहीं है कि वैसे साहित्य या शिल्प कृतियों पर एकतरफा प्रतिबंध लगा दिया जाए।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अगर इस तरह प्रतिबंध लगा दिया जाए, तो लोकतंत्र ही अर्थहीन हो जाता है। कोई समाज तभी बदलता है, जब वह यथास्थिति से बाहर निकलता है, और इस प्रक्रिया में साहित्य या कला के जरिये किसी न किसी समूह या समुदाय की भावनाओं को चोट पहुंच ही सकती है। इसका समाधान प्रतिबंध कतई नहीं है। राष्ट्र से धर्म को अलग करने या स्त्री विरोधी कानूनों को खत्म करने की प्रक्रिया में भी लोगों की भावनाओं को ठेस लग सकती है। अगर इसकी परवाह की गई, तो फिर समाज में वांछित बदलाव भला कैसे संभव होंगे?

यह याद रखना चाहिए कि यूरोप में चर्च का वर्चस्व खत्म करने की प्रक्रिया में भी असंख्य लोगों की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंची थी। यूरोप का समाज अगर रुक जाता, तो आज भी वह अपने जीवन में चर्च के वर्चस्व से बाहर नहीं निकल पाता। गैलीलियो और डार्विन की स्थापनाओं ने भी लोगों की धार्मिक भावनाओं को भारी आघात पहुंचाया था, लेकिन उससे सच्चाई बदल तो नहीं गई। लोगों की भावनाओं की परवाह करते हुए अगर लोग सच बोलना छोड़ दें, वैज्ञानिक चिंतन ही न करें, तो समाज के पिछड़ने में देर नहीं लगेगी।

चिंता की बात यह है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की यह लड़ाई केवल भारत या भारतीय उपमहाद्वीप में नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में चल रही है। और यह  धर्मों के बीच की लड़ाई नहीं, बल्कि धर्मनिरपेक्षता और कट्टरवाद के बीच की लड़ाई है। यह वैज्ञानिक चिंतन और धर्मांधता की, तार्किकता और अंधविश्वास की लड़ाई है। मेरे इतने लंबे निर्वासन से भी समझा जा सकता है कि समाज में यथास्थितिवाद के समर्थक कितने मजबूत हैं। मैं सिर्फ कामना ही कर सकती हूं कि अलग विचार रखने के लिए दुनिया में और किसी को इतने लंबे निर्वासन का दंड न भोगना पड़े। वह दिन कब आएगा, जब भिन्न विचार या सोच के कारण मनुष्यों को निर्वासन और फिल्मों को प्रतिबंध का दंड नहीं भोगना पड़ेगा!

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed