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बाढ़ से तबाही: हिमालय की नाराजगी का नतीजा

Mon, 22 Aug 2022 04:33 AM IST
Pankaj chaturvedi पंकज चतुर्वेदी
Updated Mon, 22 Aug 2022 04:33 AM IST
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सार
जो सड़कें पहाड़ को भागने का हौसला दे रही थीं, वे बरसात में क्रुद्ध हिमालय के प्रतिकार से ठिठक गई हैं। चीन सीमा के करीब नीती घाटी के जुग्जू गांव के लोग बीते दो वर्षों से भूस्खलन से परेशान हैं।
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The devastation caused by the floods: the result of the displeasure of the Himalayas
Flood in Uttarakhand - फोटो : amar ujala

विस्तार

पहाड़ी राज्यों, खासकर हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में भारी बारिश के चलते बाढ़ और भूस्खलन ने जैसी तबाही मचाई है, वह नई नहीं है, लेकिन इससे फिर वही सवाल उठते हैं, जिनसे हम बचने की कोशिश करते हैं। पांच राज्यों में तीस से ज्यादा लोगों की मौत हुई है और कई लोग लापता हैं। हिमाचल प्रदेश के मंडी, कांगड़ा और चंबा में सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। ऐसे ही उत्तराखंड में कई नदियां उफान पर हैं। तीन राष्ट्रीय राजमार्गों समेत 250 सड़कें बंद होने से आवाजाही ठप है और राज्य में चार लोगों की जान गई है तथा बारह लोग लापता बताए जाते हैं। जम्मू-कश्मीर में भी उधमपुर जिले में एक मकान पर पहाड़ का मलबा गिरने से दो लोगों की मौत हो गई और भूस्खलन के चलते उधमपुर-पंचैरी और मोंगरी मार्ग पर आवाजाही ठप हो गई। बाढ़ और बारिश से भारी तबाही भले ही अब हुई हो, लेकिन सच्चाई यह है कि लगातार भूस्खलन और मलबा जमा होने के चलते उत्तराखंड में पिछले काफी समय से जनजीवन अस्त-व्यस्त है।



जो सड़कें पहाड़ को भागने का हौसला दे रही थीं, वे बरसात में क्रुद्ध हिमालय के प्रतिकार से ठिठक गई हैं। चीन सीमा के करीब नीती घाटी के जुग्जू गांव के लोग बीते दो वर्षों से भूस्खलन से परेशान हैं। नैनीताल का अस्तित्व ही भूस्खलन के कारण खतरे में है। कुमाऊं विश्वविद्यालय के भूवैज्ञानिक प्रो बीएस कोटलिया बताते हैं कि नैनीताल और नैनी झील के बीच से गुजरने वाले फॉल्ट के सक्रिय होने से भूस्खलन और भू-धंसाव की घटनाएं हो रही हैं। शहर में लगातार बढ़ता भवनों का दबाव और भूगर्भीय हलचल इसका कारण हो सकते हैं। अब भी समाज नहीं संभला, तो परिणाम भयावह हो सकते हैं। जिस पहाड़ के निर्माण में हजारों-हजार साल लगते हैं, हमारा समाज उसे निर्माण सामग्री जुटाने के नाम पर तोड़ देता है। पहाड़ केवल पत्थर के ढेर नहीं होते, वे इलाके के जंगल, जल और वायु की दशा-दिशा तय करने के साध्य होते हैं। पहाड़ के प्रति बेपरवाही और उपेक्षा के चलते पहाड़ों की नाराजगी भी समय-समय पर सामने आने लगी है। यदि धरती पर जीवन के लिए वृक्ष अनिवार्य है, तो वृक्ष के लिए पहाड़ का अस्तित्व बेहद जरूरी है। ग्लोबल वार्मिंग व जलवायु परिवर्तन की विश्वव्यापी समस्या का जन्म भी जंगल और पहाड़ों को उजाड़ने के कारण हुआ है।


यह विडंबना है कि आम भारतीय के लिए 'पहाड़' पर्यटन स्थल है या फिर एक डरावनी-सी उपेक्षित संरचना। विकास के नाम पर पर्वतीय राज्यों में प्रकृति का बेहिसाब दोहन किया गया। पर्यटकों के आने, रहने, ठहरने के लिए सड़क व आवास निर्माण की खातिर तथा कंकरीट उगाने के लिए पहाड़ों को ही निशाना बनाया गया। हिमालय भारतीय उपमहाद्धीप के जल का मुख्य आधार है। लेकिन जल संरक्षण पर नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, हिमालय से निकलने वाली 60 फीसदी जल धाराओं में दिनोंदिन पानी की मात्रा कम हो रही है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियरों पर संकट गहरा गया है।
अगर अकेले उत्तराखंड की बात करें, तो केदारनाथ त्रासदी को भुलाकर उसकी हरियाली उजाड़ने की कई परियोजनाएं यहां के भविष्य के लिए खतरा बनी हुई हैं। उत्तराखंड में बन रही पक्की सड़कों के लिए 356 किलोमीटर के वन क्षेत्र में कथित रूप से 25 हजार पेड़ काट डाले गए। यही नहीं, सड़कों का संजाल पर्यावरणीय लिहाज से संवेदनशील उत्तरकाशी की भागीरथी घाटी से भी गुजर रहा है। उत्तराखंड के चार प्रमुख धामों को जोड़ने वाली सड़क परियोजना में 15 बड़े पुल, 101 छोटे पुल, 3,596 पुलिया, 12 बाइपास सड़कें बनाने का प्रावधान है। ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक रेलमार्ग परियोजना भी स्वीकृति हो चुकी है, जिसमें बड़े पैमाने पर जंगल कटेंगे, वन्य जीवन प्रभावित होगा और पहाड़ों को काटकर सुरंगें बनेंगी।

सनद रहे कि हिमालय न केवल हर साल बढ़ रहा है, बल्कि इसमें भूगर्भीय उठापटक चलती रहती है। यहां पेड़ भूमि को बांधकर रखने में बड़ी भूमिका निभाते हैं, जो कटाव व पहाड़ ढहने से रोकने का एकमात्र उपाय है। अधिक सुरंग या अविरल धारा को रोकने से पहाड़ अपने नैसर्गिक स्वरूप में रह नहीं पाता और उसके दूरगामी परिणाम विभिन्न प्राकृतिक आपदा के रूप में सामने आ रहे हैं। 

 

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