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नई पीढ़ी के लिए प्रण लेने का दिन
ए अन्नामलाई
Updated Fri, 15 Aug 2014 11:50 AM IST
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पंद्रह अगस्त संसार के इतिहास में स्वर्णाक्षरों से अंकित दिन है। सिर्फ इसलिए नहीं कि भारत नामक देश को इस दिन आज़ादी मिली। यों तो कई देशों को समय-समय पर आजादी मिली ही है, लेकिन भारत का स्वाधीनता आंदोलन और उसके लिए हमने जो मार्ग अपनाया, वह समूची मानव सभ्यता को ऊंचा उठाने का सामर्थ्य रखते हैं। इसलिए यह दिन संसार के इतिहास में स्वर्णाक्षरों से अंकित होने की योग्यता रखता है।
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खेल-कूद की तरह युद्ध में भी एक पक्ष विजयी होता है और दूसरा पक्ष पराजित। क्या दोनों पक्ष विजयी हो सकते हैं? साधारणतः एक की विजय का अर्थ होता है, दूसरे की पराजय। पर स्वाधीनता आंदोलन में हम भी विजयी हुए और हमारा विपक्ष भी विजयी हुआ। दोनों अर्थात अंग्रेजों तथा भारतीयों ने 15 अगस्त, 1947 के दिन इस मिट्टी में स्वतंत्रता दिवस मनाया। क्या संसार के इतिहास में स्वर्णाक्षरों से अंकित करने योग्य घटना नहीं है यह?
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हमने वर्ष 1942 में अंग्रेजों से कहा कि 'भारत छोड़ो, हम अपने आप को संभाल लेंगे।' लेकिन अंग्रेज शासकों ने कहा 'आप लोग इसके लिए सक्षम नहीं हैं। आप लोग इसकी योग्यता नहीं रखते। आप लोग लोकतांत्रिक देश होने के काबिल नहीं हैं।' लेकिन पिछले 67 साल से भारत एक स्वतंत्र देश के रूप में प्रकाशमान है। 15 अगस्त के इस पावन-पर्व में हम सबको उन सबके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए, जिन्होंने इसे संभव बनाया।
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हमारे देश में इधर-उधर विदेशों की दखलंदाजी जरूर है। लेकिन अंतिम निर्णय लेने का अधिकार आज भी जनता के हाथ में है। पांच साल में एक बार जनता अपने इस अधिकार का प्रयोग करती है। सत्ता और धन के दबाव के बावजूद आज भी लोकतांत्रिक परंपरा चल रही है। जनता को चाहिए कि वे प्रलोभन में न आएं और अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का सफल प्रयोग करें। मतदान के लिए पैसा लेना ठीक वैसा ही है, जैसे कोई मां अपने बेटे को पालने के लिए किसी से रिश्वत लेती हो। हमें इस तरह पतित नहीं होना चाहिए।
भारत गरीब देश है। यहां की अधिकांश जनता अशिक्षित है। इस दशा में आजादी और उसके अधिकारों की शिक्षा देकर उन्हें पाने के लिए इस देश की जनता को प्रेरित करना कठिन काम ही है। उनके लिए अपना पेट पालना ही एक संघर्ष है। वे आजादी और उसके अधिकारों के संबंध में कैसे सोच सकेंगे? लेकिन गांधी जी ने यह कठिन कार्य सफलतापूर्वक करके दिखाया। साधारण जनता के मन में भी आजादी के विचार आए। गरीब जनता के मन में भी स्वतंत्रता और स्वाभिमान का बीज गांधी जी ने बोया। वह विशाल वृक्ष बनकर आज भी खड़ा है।
गांधी जी आजादी लाने के साथ ही गरीबी, सामाजिक भेदभाव और छुआछूत को भारत से हटाना चाहते थे। उनका दृढ़ विश्वास था कि राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता भी चाहिए। तभी सभी लोग राजनीतिक स्वतंत्रता का लाभ उठा सकेंगे। हम इस दिन गांधी जी को सधन्यवाद याद करेंगे, जिन्होंने सामाजिक और आर्थिक समता के लिए भी संघर्ष किया। संसार में भारत के लिए गौरवमय स्थान दिलाने वाले थे गांधी जी। दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की गौरवहीन अवस्था को सफलतापूर्वक दूर करने के लिए अपने जीवन के 21 साल उन्होंने अर्पित किए।
भारत में गांधी जी और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में जानने के अवसर कम होते जा रहे हैं। युवा वर्ग को गांधी जी के जीवन और उनके शुद्धतापूर्ण संघर्षों के बारे में बताना हमारा कर्तव्य है। गांधी जी ने जब समाज सेवा के क्षेत्र में प्रवेश किया, तब उनकी उम्र सिर्फ 21 साल थी। आज के युवा वर्ग को चाहिए कि इसे ध्यान में रखकर समाज सेवा के कार्य में अविलंब जुट जाएं।
इस स्वतंत्रता दिवस पर हम इस पर गंभीरतापूर्वक विचार करें कि हम संसार के लिए क्या कर रहे हैं। अगर हम संसार से ज्यादा लें और उसे कम दें, तो यह नहीं चलेगा। अगर हम कम लें और ज्यादा दें, तो संसार समृद्ध बनेगा। हम यही चाहेंगे कि संसार समृद्ध बने। आज हम अपने पूर्वजों के त्यागमय जीवन के फल भोग रहे हैं। हम भी अपनी भावी पीढ़ी के लिए त्यागमय जीवन अपनाएं।
गांधी जी के नेतृत्व में जेल के अत्याचारों को सहर्ष सहनेवाले पूर्वजों को आज के दिन हम कृतज्ञता के साथ याद करें। अगर हमारे देश की प्रभुसत्ता एवं स्वाभिमान खतरे में हो, तो हम उनकी रक्षा के लिए समर्पित रहें। हम अपने आपको सामाजिक अत्याचारों को मिटाने एवं स्वस्थ राजनीति स्थापित करने के लिए अर्पित करें। यह साबित करें कि हम सामाजिक चेतना रखनेवाले सभ्य समाज के नागरिक हैं। इसके लिए प्रतिज्ञा लेने के शुभ दिन के रूप में हम यह स्वतंत्रता दिवस मनाएंगे।
(लेखक राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय, नई दिल्ली के निदेशक हैं)