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द अमेजिंग रेसिस्ट- छिमी तेंदुफला

Sat, 24 Jan 2015 08:57 PM IST
ओम गुप्ता
ओम गुप्ता Updated Sat, 24 Jan 2015 08:57 PM IST
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the amazing racist.

एडी ट्रस्टी कोलंबो में एक स्कूल मास्टर हैं। वह पूरी जिंदगी मेनका रूपासिंह के साथ गुजारना चाहता है। मेनका श्रीलंका की खूबसूरती का नायब नमूना है। पर जैसा कि होता है कि हर प्रेम कहानी में बहुत सी अड़चनें होती हैं, इस किस्से में भी ढेर सारी अड़चनें हैं। मेनका से उसकी शादी तभी हो सकती थी जबकि वह उसके खड़ूस और बाबाआदम की सोच वाले पिता, तिलक रूपासिंह को खुश कर दे और उसकी हर  हरकत को बर्दाश्त करे। बाप चाहता था उसकी बेटी अपनी बिरादरी में ब्याह रचाए। इतना ही नहीं उसी मोहल्ले में। इस मुश्किल सफर में उसे कई मंजिलें पार करनी थी। सबसे पहले उसने उस भोजन की आदत डाली, जिसे खाकर उसे खून के आंसू रोने पड़े।

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दारू पीकर रेडलाइटों पर गाड़ी को भगाना पड़ा। साथ काम करने वालों के साथ दादागिरी करनी पड़ी। और तो और सांपों को अपने बिस्तर में सुलाना पड़ा। यह सब तो गनीमत थी, असली इम्तेहान था उसकी खाल का रंग। जिससे उसका होने वाला ससुर तहे-दिल से नफरत करता था। यह पृष्ठभूमि है छिमी तेंदुफला के ताजातरीन नॉवेल 'द अमेजिंग रेसिस्ट' की। इसकी कहानी बेहद मजाकिया, पर हिला कर रख देने वाली है। यह छिमी का पहला उपन्यास है। 'द प्रोफेशनल' के लेखक अशोक फैरी ने उनके इस नॉवेल के बारे में कहा है कि 'इसे लेखक ने एक बाहरी आदमी की भीतर झांकने वाली दृष्टि से लिखा है।'
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छिमी आधे अंग्रेज हैं और आधे तिब्बतन। वह हांगकांग, लंदन, दिल्ली और कोलंबो में पले-बढ़े। इन दिनों वह अपनी पत्नी के साथ श्रीलंका में रहते हैं और एक दूसरा उपन्यास लिख रहे हैं।  उपन्यास का पहला जुमला चौंकाता है। 'नाश्ते में मुंह जलाने वाली झोलदार सब्जी एक बदजायका आइटम था' और विदा लेते हुए लेखक का अंदाज कुछ ऐसा है-'हाय फिर मिलेंगे, किकी ने अपना हाथ उसके बिस्तर पर रखते हुए कहा। आज फिर डैडी को मेरी जरूरत पड़ी। शुक्र है अब मैं किसी लायक हो गई हूं।  घबराओ मत। जैसा तुमने मुझसे वादा लिया है। मैं उसका पूरा ख्याल रखूंगी।'
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किताब श्रीलंका की अतरंग झांकी प्रस्तुत करती है। पृष्ठ 131 का एक उदाहरण देखिए-' 88 गुलाबों से बनी-ठनी, हाय में पेस्ट्री का डिब्बा, कानों में लखटकिया हीरे की बालियां, मैं गूगल प्रिंट आउट वाला नक्शा लिए जाफना के सफर पर निकली थी। मैं उसे हैरान परेशान करना चाहती थी। मैं फिर से उसका दिल जीतना चाहती थी।'


मेरे दिमाग में एक खाका घूम रहा था। तिलक अंकल से कैसे पूछूं कि उसे देश निकाला कैसे हासिल होगा? किसी के लिए वह कुछ भी कर सकते थे। मेरे सारे श्रीलंकाई दोस्त मेरा साथ देंगे-शुद्धिकरण के लिए। उनका वह गोरा अब तो गया हमेशा-हमेशा के लिए। इधर श्रीलंका, बड़े प्रकाशकों के लिए दिलचस्पी का विषय बनता जा रहा है। एक द्वीप जो हिंद महासागर में अपनी खास पहचान बनाए हुए है। सिहंल-तमिल मारकाट के बाद। हिंदुस्तान से नफरत के उबाल के साथ। मानों पुकार-पुकार कर कह रहा हो कि हमें जानों, पहचानों हम खास हैं। हमारी अपनी अहमियत है। भारत में तमिलों को छोड़कर शेष लोग इसके प्रति अनजान हैं।

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