{"_id":"6a9e4978777166363905db6f","slug":"test-of-changing-weather-are-claims-of-robust-preparedness-true-how-ready-are-we-to-minimize-damage-2026-09-07","type":"story","status":"publish","title_hn":"बदलते मौसम की परीक्षा: क्या व्यवस्था दुरुस्त होने के दावे सही, नुकसान को कम करने के लिए हम कितने तैयार हैं?","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
बदलते मौसम की परीक्षा: क्या व्यवस्था दुरुस्त होने के दावे सही, नुकसान को कम करने के लिए हम कितने तैयार हैं?
Mon, 07 Sep 2026 10:50 AM IST
ज्योति भास्कर
अमर उजाला, नई दिल्ली।
अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Mon, 07 Sep 2026 10:50 AM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
कई राज्यों में मौसम की मार
- फोटो :
एएनआई
विस्तार
देश के बड़े हिस्से में सक्रिय मौसम प्रणालियों के कारण तेज बारिश और आंधी-तूफान की घटनाओं ने एक बार फिर यह सवाल सामने खड़ा कर दिया है कि बदलते मौसम के बीच हम इससे होने वाले नुकसान को कम करने के लिए कितने तैयार हैं।
मौसम विभाग के अनुसार, उत्तर-पश्चिम, मध्य, पूर्व, पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत के अनेक हिस्सों में 11 सितंबर तक भारी से बहुत भारी बारिश का खतरा बना हुआ है। यह चेतावनी इसलिए भी गंभीर है कि मानसून के इस चरण में जमीन पहले ही पर्याप्त नमी ग्रहण कर चुकी है और कई नदियों तथा जलाशयों का जलस्तर ऊंचा है।
ऐसे में अतिरिक्त बारिश कई इलाकों में बाढ़ और जलभराव की स्थिति को और गंभीर बना सकती है। उत्तर प्रदेश की स्थिति विशेष चिंता पैदा करती है। प्रदेश के बीस से अधिक जिले बाढ़ जैसी स्थितियों से जूझ रहे हैं, जबकि उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के कई जिलों में भी कमोबेश ऐसे ही हालात हैं।
मौसम विभाग के अनुसार, बंगाल की खाड़ी के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में बना कम दबाव का क्षेत्र अब प्रभावी हो रहा है। इसके असर से लगातार बारिश फसलों और जलाशयों के साथ-साथ आबादी वाले क्षेत्रों, सड़कों और परिवहन व्यवस्था के लिए भी चुनौती बढ़ा सकती है।
दरअसल, बारिश अपने आप में संकट नहीं है। संकट तब पैदा होता है, जब बारिश की मात्रा और उससे निपटने की हमारी तैयारी के बीच अंतर बढ़ जाता है। शहरों में थोड़ी देर की तेज बारिश भी जलभराव का कारण बन जाती है और जिस पानी को कुछ घंटे में निकल जाना चाहिए, वह कई बार दिनों तक सड़कों और बस्तियों में जमा रहता है।
पिछले दिनों दिल्ली-एनसीआर में हुई बारिश के बाद सामने आए जलभराव के दृश्य इसी समस्या की ओर संकेत करते हैं। हर वर्ष मानसून से पहले नालों की सफाई और जलनिकासी व्यवस्था दुरुस्त होने के दावे किए जाते हैं, लेकिन तेज बारिश के साथ अनेक सड़कें और इलाके फिर जलमग्न दिखाई देते हैं। इससे स्पष्ट है कि समस्या केवल संसाधनों की नहीं, बल्कि नियोजन, रखरखाव और निगरानी की भी है।
लिहाजा, शहरों को ऐसे विकास मॉडल की जरूरत है, जिसमें वर्षाजल के प्राकृतिक प्रवाह, जलाशयों और हरित क्षेत्रों को पर्याप्त जगह मिले। इसके अतिरिक्त, यह भी जरूरी है कि मौसम विभाग की चेतावनियां केवल सूचना बनकर न रह जाएं। मौसम को नियंत्रित करना मनुष्य के हाथ में नहीं है, लेकिन पूर्व चेतावनी, त्वरित प्रशासनिक कार्रवाई, बेहतर जलनिकासी और वैज्ञानिक शहरी नियोजन से उससे होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। यही बदलती मौसम प्रणालियों की सबसे बड़ी सीख है।