सामूहिकता से ही हारेगा आतंकवाद
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कैलिफोर्निया में हाल ही में ऑफिस की एक पार्टी के दौरान सामूहिक हत्या की घटना ने मानवता को झकझोर दिया है। इससे पहले सिनाई, बेरूत, पेरिस और फिर माली की राजधानी बमाको में जिस तरह से आतंकी घटनाएं हुईं, उनसे फिर से यह सवाल उठा कि आखिर क्यों ये आतंकी मध्यकालीन मूल्यों की पुनः स्थापना के लिए आधुनिकतम तकनीकों का इस्तेमाल लोगों की जान लेने और संपत्ति का नुकसान करने के लिए कर रहे हैं? दुनिया के कुछ हिस्सों में अगर लोकतंत्र अपनी जड़ें नहीं जमा पाया, तो इसकी वजह कोई खास धर्म नहीं है, और न ही इसकी वजह उनका कम विकसित होना है। इन देशों में दरअसल, जानबूझकर लोकतंत्र का गला घोंटा गया है, ताकि इन देशों का शोषण करने में पश्चिमी देशों को कोई दिक्कत न हो। गौरतलब है कि कुछ दशक पहले लैटिन अमेरिकी राष्ट्र चिली में लोकतांत्रिक ढंग से चुने गए आलेंड की हत्या हुई थी, और उनकी जगह सैन्य शासन ने ले ली थी।
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दरअसल, लैटिन अमेरिकी तानाशाहियों में मानवाधिकारों का हनन एक सामान्य बात है। ये वही देश हैं, जिन्हें पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने अमेरिका का बैकयॉर्ड बताया था। ठीक इसी तरह, ईरान में मुसद्दक के नेतृत्व में लोकतंत्र की स्थापना की कोशिशों को पश्चिम ने कुचल कर रख दिया और इसकी जगह एक ऐसा दमनकारी शासन स्थापित किया गया, जिसने लोकतांत्रिक संस्थानों और जनसहभागिता पर ध्यान दिए बगैर ऊपर-ऊपर से इन देशों के आधुनिकीकरण पर जोर दिया। 1979 में खुमैनी के नेतृत्व में हुई इस्लामिक क्रांति ने ईरान में हालात और मुश्किल बनाए, जिससे वह देश अभी तक जूझ रहा है।
वर्ष 1947 से 1953 के बीच विदेशी सैन्य बलों के ईरान छोड़कर जाने के बाद वहां कुछ हद तक राष्ट्रवादी सोच पैर जमाने लगी। ईरान के आंतरिक मामलों में विदेशी हस्तक्षेप रोकने की बात उठने लगी। हालात को भांपते हुए मुसद्दक ने ब्रिटिश-ईरानी तेल कंपनी के राष्ट्रीयकरण का फैसला किया, ताकि इस पर सरकारी नियंत्रण बढ़ाया जा सके। बस, उनका यही कदम सत्ता से उनकी बेदखली का सबब बन गया। आधुनिक काल के ईरान के सबसे लोकप्रिय नेता मुसद्दक उस वक्त लोकप्रिय सरकार चला रहे थे।
मगर उन्हें हटाने की वजह यह थी कि वह पश्चिमी देशों की चापलूसी नहीं करते थे। इसके बाद ईरान में शाह का शासन पूरी तरह से पश्चिमी हितों के अधीन था। 1978 तक आलम यह हो गया कि तकरीबन 60 हजार अमेरिकी ईरान में रह रहे थे। अमेरिकी सैनिकों को वहां काफी अधिकार मिले हुए थे। ऐसे हालात ने इस्लामी कट्टरपंथी सोच को पनपने का मौका दिया। अफसोस की बात है कि मुसद्दक को ईरान में अपने लोकतांत्रिक शासन को आगे बढ़ाने का मौका नहीं मिला। अगर ऐसा हुआ होता, तो इसका असर पड़ोसी देशों पर भी पड़ता।
दरअसल यही पृष्ठभूमि अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के खिलाफ पश्चिमी देशों की लड़ाई को नैतिक आधार पर कमजोर करती है। नैतिक आधार पर मजबूत होने के लिए पश्चिमी देशों का संघर्ष कुछ बुनियादी अवधारणाओं पर टिका होना चाहिए। पहली, जितना शीघ्र हो सके, स्वतंत्र फलस्तीन राज्य की स्थापना को लेकर प्रतिबद्धता। दूसरी, दुनिया में कहीं भी मानवाधिकार के चार्टर के मामले में कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। तीसरी, गैर-ईसाई क्षेत्रों में सांविधानिक लोकतंत्र की स्थापना को लेकर वैसी ही दृढ़ प्रतिबद्धता, जैसी दूसरे विश्वयुद्ध के बाद कैथोलिक देशों के लोकतंत्रीकरण के मामले में दिखाई गई थी। चौथी, आर्थिक तौर पर दक्षिणी यूरोप से जुड़े तुर्की को एक तय समयसीमा के भीतर यूरोपीय संघ में शामिल करने की प्रतिबद्धता, ताकि यह दिखाया जा सके कि पश्चिम सही मायनों में धर्मनिरपेक्ष हो गया है। पांचवीं, चाहे वह यूरोप में आईआरए हो, या फिर पृथकतावादी बास्क, सभी आतंकवादी संगठनों के साथ एक जैसा बर्ताव। छठी, कभी औपनिवेशिक दासता का सामना करने वाले निर्धन लोकतांत्रिक देशों के लिए नई पहल।
आतंकवाद पर काबू पाने का सबसे कारगर तरीका यह है कि लोगों की सोच बदली जाए। इसके लिए यह दिखाना होगा कि चाहे कुछ भी हो जाए, पूरा देश मिलकर आतंकवाद का सामना करेगा और इसे खत्म करेगा। काफी समय पहले मैकियावली ने भी इसी बात पर जोर दिया था। आज के लोकतांत्रिक युग में सामूहिकता के ही जरिये आतंकवाद का खात्मा किया जा सकता है। मगर, इसके लिए ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जिसमें लोगों का एक-दूसरे पर भरोसा हो, और वे सार्वजनिक हित के लिए निजी हितों का बलिदान करने को तैयार हों।
जब तक कि पश्चिमी देश लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवाधिकारों को लेकर प्रतिबद्धता जाहिर करते हुए भरोसेमंद ढंग से आगे नहीं बढ़ेंगे, तब तक आतंकवाद के खिलाफ उनकी वर्तमान लड़ाई को पश्चिमी दुनिया से इतर लोग संदेह की नजर से देखते रहेंगे। दरअसल, दशकों तक पश्चिम का जो संदेहास्पद नजरिया रहा है, उसे देखते हुए आतंकवाद के खिलाफ उनकी लड़ाई को बाकी दुनिया में शंका की नजर से देखा जाता है। पश्चिमी देशों को पूरी दुनिया का भरोसा जीतने और लोकतंत्र के प्रसार के लिए अतीत की अपनी नीतियों को त्यागना होगा और बगैर किसी अपवाद के समानता व न्याय के मूल्यों का पालन करना होगा।
इंग्लैंड के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर का बयान जरूर उम्मीद जगाता है। उन्होंने कहा कि जब तक वंचना, भेदभाव और असमानता जैसे सवालों का हल नहीं ढूंढा जाता, तब तक आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई असरकारी साबित नहीं हो सकती। यदि उनके इस बयान को आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई का आधार बनाया जाए, तो आतंकवाद पर काबू पाने में मुश्किल नहीं होगी। जब तक पश्चिम के देश लोकतांत्रिक मूल्य और मानवाधिकार के प्रति प्रतिबद्धता नहीं जताएंगे, तब तक आतंकवाद के खिलाफ उनकी लड़ाई को बाहर के देश संदेह की नजर से ही देखते रहेंगे।