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सत्ता के बाद आतंकियों के निशाने पर

Wed, 26 Feb 2014 07:18 PM IST
कुलदीप तलवार
कुलदीप तलवार Updated Wed, 26 Feb 2014 07:18 PM IST
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Terror target on journalist in pakistan

वैश्विक स्तर पर प्रेस की स्वतंत्रता पर नजर रखने वाली संस्था रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर की नवीनतम वार्षिक रिपोर्ट में पाकिस्तान को 158वां स्थान प्राप्त हुआ है। रिपोर्ट बताती है कि पत्रकारों के लिए पाकिस्तान दुनिया में सर्वाधिक खतरनाक देशों में शामिल है, जहां सशस्त्र समूह और आईएसआई जैसी खुफिया एजेंसियां पत्रकारों के लिए खतरा पैदा करती है। पत्रकारों पर मंडराते खतरे की एक बड़ी वजह यह है कि उन्हें निशाना बनाना वालों के खिलाफ कम, वह भी, नाममात्र की कारवाई होती है। दो साल पहले पाक के एक खोजी पत्रकार सलीम शहजाद ने लापता होने से दो दिन पहले अपने एक लेख में पाक नौसेना के चंद अफसरों की अल कायदा के साथ साठगांठ का जिक्र किया था। वह लेख आईएसआई को सख्त नागवार गुजरा और उसके कुछ ही दिनों बाद शहजाद की हत्या कर दी गई।

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उस हत्या ने पूरी दुनिया का ध्यान पाक में पत्रकारों को पेश आने वाले खतरों की तरफ खींचा था। पर उसका कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकला। पिछले कुछ वर्षों में वहां लगभग सवा सौ पत्रकारों को जान से हाथ धोना पड़ा है। वहां 2011 में छह, 2012 में 12 और पिछले साल 11 पत्रकारों की हत्या हुई है। इस साल के पहले ही दिन अब तक टीवी चैनल के रिपोर्टर की सिंध के लरकाना शहर में हत्या कर दी गई। इसी तरह कुछ दिन पहले कराची में एक्सप्रेस टीवी के लिए काम कर रहे दो पत्रकारों को गोलियों का निशाना बनाया गया। तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने उसकी जिम्मेदारी लेते हुए चेतावनी दी कि मीडिया पर हमले तब तक जारी रहेंगे, जब तक रिपोर्टर इस्लाम के खिलाफ रिपोर्टिंग बंद नहीं कर देंगे। वहां पत्रकारों को कई मोर्चों पर खतरों का सामना करना पड़ रहा है। मसलन, बम धमाकों की कवरेज करते हुए अगर वे फौज की नुक्ताचीनी करें, तो उन्हें फौजी अफसरों की नाराजगी झेलनी पड़ती है, और तालिबान की आलोचना करने पर वे उनके निशाने पर आ जाते हैं। पत्रकारों पर यह आरोप लगाना आम है कि वे दुश्मनों के लिए जासूसी कर रहे हैं। पश्तो मशाल रेडियो के संपादक के मुताबिक, फाटा और खैबर पख्तूनख्वा से रिपोटिंग करना तो तलवार की धार पर चलने जैसा है।
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आलम यह है कि सैनिकों, अर्धसैनिक बल के जवानों, बच्चों को पोलियो ड्रॉप पिलाने की मुहिम में लगे कार्यकर्ताओं और शांति बहाली के लिए काम करने वालों को निशाना बनाने के बाद तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने अब दो दर्जन पत्रकारों और समाचार पत्रों के संपादकों, मीडिया संस्थानों के मालिकों और टीवी चैनल के प्रसिद्ध एंकरों का नाम अपनी हिट लिस्ट में शामिल किया है। आरोप यह है कि ये लोगों को इस्लाम के खिलाफ भड़का रहे हैं।
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पाकिस्तान में प्रेस पर अंकुश लगाने का इतिहास लंबा है। जनरल अयूब खान के जमाने में पत्रकारों को यातनाएं दी गईं, तो जनरल जियाउल हक के समय पत्रकारों को कोड़े मारे जाते थे। जनता द्वारा चुनी हुई सरकारों ने भी कुछ ऐसे कानून बनाए, जिनसे प्रेस की स्वतंत्रता पर असर पड़ा। जनरल मुशर्रफ यह दावा जरूर करते रहे कि उनके दौर में मीडिया पूरी तरह स्वतंत्र है, लेकिन तब भी बिना कारण बताए पत्रकारों को आईएसआई और दूसरी सरकारी एजेंसियां उठाकर ले जातीं और यातनाएं देती थीं। सरकारी यातनाओं से तंग आकर शाहीन सहबाई जैसे वरिष्ठ पत्रकारों को अमेरिका में शरण लेनी पड़ी थी। वर्ष 2007 में इस्लामाबाद में मुशर्रफ का फौजी वर्दी में राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने का विरोध करने पर वकीलों पर लाठियां बरसाई गई थीं, जिसमें कई पत्रकार भी घायल हुए थे। उस हिंसा का टीवी चैनलों पर सीधा प्रसारण देख सरकार बौखला उठी थी। इसी तरह सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश इफ्तिखार चौधरी को राजनीतिक कारणों से हटाने पर सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शनों को मीडिया ने खूब कवरेज दी, तो मुशर्रफ ने मीडिया पर अंकुश लगाने का अध्यादेश जारी कर दिया था, जिसे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद वापस लेना पड़ा।


गरज यह कि पाक में मीडिया अब भी स्वतंत्र नहीं है। सत्ता का साथ न देने की सजा मीडियाकर्मियों को मिलती रहती है। पत्रकारों की संस्थाएं पत्रकारों पर होते हमलों पर विरोध प्रदर्शन तो करती हैं, पर उनकी कोई सुनवाई नहीं होती।

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