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तमिलनाडु की सियासत: द्रविड़ पार्टियों से निराशा के बीच नया दल आजमाने की चाह; दक्षिण समर्थक भावनाओं का विकास

Sat, 13 Apr 2024 05:46 AM IST
r.rajgopalan राजगोपालन आर. राजगोपालन
Updated Sat, 13 Apr 2024 05:46 AM IST
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सार
मतदाता दोनों द्रविड़ पार्टियों से निराश हैं- चाहे द्रमुक हो या अन्नाद्रमुक। वे अब एक वैकल्पिक पार्टी को आजमाना चाहते हैं। राज्य और जिला स्तरीय दलों का बढ़ना इस बात का संकेत है कि मतदाताओं में सिनेमा संस्कृति के प्रति निराशा बढ़ रही है और दक्षिण समर्थक भावनाओं का विकास हो रहा है।
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Tamil Nadu Politics Electorates Eager for Experiment amid Discontent with Dravida Parties
तमिलनाडु भाजपा प्रमुख अन्नामलाई, पीएम मोदी और अन्य लोग (फाइल) - फोटो : ani

विस्तार

तमिलनाडु की 39 लोकसभा सीटों के लिए चुनाव प्रचार चरम पर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृहमंत्री अमित शाह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा समेत तमाम बड़े नेताओं के साथ भाजपा वहां धुआंधार प्रचार कर रही है, जबकि द्रमुक और कांग्रेस पूरी तरह से एमके स्टालिन और राहुल गांधी पर निर्भर हैं। तीन धड़ों में बंट चुकी अन्नाद्रमुक ने भी अपने स्थानीय नेताओं को राज्य के दौरे में व्यस्त रखा है। एडाप्पडी पलानीस्वामी अन्नाद्रमुक के स्टार प्रचारक हैं।



द्रविड़ पार्टियों को हिंदू समर्थक भाजपा से कठिन चुनौती मिल रही है। पहली बार राज्य में 70 वर्षों से बारी-बारी शासन में रहे द्रमुक और अन्नाद्रमुक, दोनों द्रविड़ दलों को भाजपा और सिने अभिनेता विजय द्वारा हाल ही में गठित सीमन नाम तमीझर काची पार्टी से खतरा महसूस हो रहा है। तमिलनाडु में एक ऐसा वर्ग उभरा है, जो मोदी के तीसरे कार्यकाल के पक्ष में है।


तमिलनाडु के राजनीतिक दलों के भाषण और घोषणापत्रों से यही संकेत मिलता है कि पार्टियां 2026 में होने वाले विधानसभा चुनावों पर लोकसभा चुनावों की तुलना में ज्यादा जोर दे रही हैं। तमिलनाडु की ये राज्य और जिला स्तरीय पार्टियां चाहती हैं कि नरेंद्र मोदी का शासन बिल्कुल खत्म होना चाहिए। राज्य के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने प्रधानमंत्री मोदी की तुलना प्रवासी पक्षियों से की है, जो चुनावी मौसम में तमिलनाडु आते हैं।

विभिन्न दलों के नेता एक-दूसरे के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने तीन सार्वजनिक रैलियों को संबोधित करते हुए कहा कि 'द्रमुक की विचारधारा राष्ट्र विरोधी है। पिछले 10 वर्षों में राजग सरकार तमिलनाडु के मछुआरों के अधिकारों की रक्षा के लिए कड़ी मेहनत कर रही है। राजग सरकार तमिलनाडु के पांच मछुआरों की जान बचाकर उन्हें भारत लाई, जिन्हें श्रीलंका की अदालत ने मृत्युदंड की सजा सुनाई थी।' उन्होंने आगे कहा कि ‘द्रमुक के एक नेता का कहना है कि यह चुनाव मोदी को देश से बाहर भेजने के लिए है, लेकिन यह चुनाव भ्रष्टाचार, वंशवादी राजनीति और नशीले पदार्थों के खतरे को देश से बाहर भेजने के लिए द्रमुक की राष्ट्र-विरोधी विचारधारा को खत्म करने के लिए है।’

यदि नेताओं के भाषणों का विश्लेषण किया जाए, तो उससे कुछ अनुमान लगाए जा सकते हैं। एक, यदि द्रमुक सभी 39 सीटें जीत जाती है, तो यह सुनिश्चित हो जाएगा कि उसके लिए 2026 का मार्ग सुरक्षित है और गठबंधन कायम रहेगा।

दूसरा, यदि अन्नाद्रमुक 8-10 सीटें जीत जाती है और भाजपा गठबंधन पांच से आठ सीटें जीत जाता है, तो यह द्रमुक के खिलाफ सत्ता विरोधी रुझान को दर्शाएगा। ऐसे में स्टालिन के सामने अपनी पार्टी को एकजुट रखने की चुनौती पैदा होगी। जाहिर है, द्रमुक को तोड़ने के लिए केंद्रीय एजेंसियां भी सक्रिय हो जाएंगी।

तीसरा, यदि केंद्र में तीसरी बार भाजपा सरकार बना लेती है, तो निश्चित रूप से भाजपा द्रमुक को खत्म करने के लिए वैसा ही अभियान चलाएगी, जैसा झारखंड मुक्ति मोर्चा और आप के खिलाफ चलाया। गौरतलब है कि नरेंद्र मोदी ने स्टालिन सरकार को रेत माफिया, ड्रग माफिया और तुष्टीकरण का एजेंट बताया है।

वर्ष 1967 से राज्य की राजनीति पर नजर रखने के नाते इन पंक्तियों के लेखक का मानना है कि मतदाता दोनों द्रविड़ पार्टियों से निराश हैं-चाहे द्रमुक हो या अन्नाद्रमुक। वे अब एक वैकल्पिक पार्टी को आजमाना चाहते हैं। राज्य और जिला स्तरीय दलों का बढ़ना इस बात का संकेत है कि मतदाताओं में सिनेमा संस्कृति के प्रति निराशा बढ़ रही है और दक्षिण समर्थक भावनाओं का विकास हो रहा है। ऐसे में हैरानी नहीं कि लोकसभा चुनाव के बाद प्रधानमंत्री मोदी 2026 के विधानसभा चुनाव की तैयारी करेंगे और पश्चिम बंगाल एवं त्रिपुरा फॉर्मूले पर तमिलनाडु पर कब्जा करने के लिए आक्रामक रुख अपनाएंगे। इसके लिए तमिलनाडु में बुनियादी संरचनाओं के निर्माण और आर्थिक विकास को आगे बढ़ाएंगे। नशे के कारोबार और खनन माफिया पर अंकुश लगाने के साथ वह विदेशी निवेशकों को भी इसके लिए आकर्षित कर सकते हैं। एक विदेशी कंपनी सेमी कंडक्टर के क्षेत्र में दक्षिणी राज्यों में निवेश करना चाहती थी, लेकिन सामाजिक अशांति और कानून-व्यवस्था की समस्या के कारण अचानक उसे पश्चिमी राज्यों का रुख करना पड़ा।

इस बात से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि विदेशी शक्तियां, खासकर चीन और पाकिस्तान दक्षिणी राज्यों पर ज्यादा ध्यान केंद्रित कर रही हैं। चीन ने कोलंबो में अपना खुफिया पोत तैनात किया था, लेकिन द्रमुक के 38 सांसदों ने इस मुद्दे पर संसद में हुई बहस में हिस्सा नहीं लिया। भाजपा के प्रदेश प्रमुख के अन्नामलाई ने द्रमुक सांसदों के रुख पर सवाल उठाया है। एमके स्टालिन ने अपने पिता करुणानिधि की मृत्यु के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं को एकजुट रखा है। उधर पलानीस्वामी ने भी कार्यकर्ताओं को अपने साथ जोड़कर अपना अधिकार बरकरार रखा है। मगर अन्नाद्रमुक लोकसभा चुनाव को लेकर ज्यादा उत्सुक नहीं है, वह 2026 के चुनाव के लिए खुद को तैयार कर रही है। मगर द्रमुक के लिए यह प्रतिष्ठा की लड़ाई है। द्रमुक जानती है कि अगर भाजपा केंद्र की सत्ता में हैट्रिक लगाती है, तो राष्ट्रीय राजनीति में उसकी कोई प्रासंगिकता नहीं रहेगी। इसलिए 2026 के चुनावों में सत्ता पर दावेदारी के लिए द्रमुक ज्यादा लोकसभा सीटें जीतना चाहती है।

द्रमुक और अन्नाद्रमुक एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं, जबकि प्रधानमंत्री मोदी ने कच्चातिवु, वंशवाद और भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाकर आक्रामक ढंग से राज्य में पैठ बनाई है। भाजपा पहली बार राज्य में वैकल्पिक मॉडल शासन के लिए मतदाताओं को प्रेरित कर रही है। यही वजह है कि द्रमुक और अन्नाद्रमुक, दोनों भाजपा के हिंदुत्व समर्थक और द्रविड़ विरोधी आक्रामक प्रचार अभियान से परेशान है। राज्य के मतदाता चाहते हैं कि घोषणापत्रों को अमल में लाया जाए। हालांकि तमिलनाडु के मतदाताओं की छवि पैसे लेकर वोट देने की रही है, लेकिन इस बार वही मतदाता नेताओं से कड़े सवाल पूछ रहे हैं। यह एक नया रुझान है।

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