पर्यावरण: पराली पर सोचने का समय, निस्तारण के लिए वैकल्पिक मार्गों पर चलने की दरकार
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विस्तार
भारत कृषि आधारित अर्थव्यवस्था है, जो हर साल 51 करोड़ टन कृषि अवशेष (पराली) उत्पन्न करता है। अगली फसल बोने की जल्दी में किसान पराली जला देते हैं, जिससे न केवल वायु प्रदूषण होता है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी कम हो जाती है। फिर भी वे इसे सबसे सस्ता विकल्प मानते हैं। देश के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में किसानों ने पराली जलाना शुरू कर दिया है, और आगामी महीनों में ऐसी घटनाएं बढ़ेंगी, जिससे वायु प्रदूषण में वृद्धि होगी। हर बार की तरह इस बार भी हवा के रुख के कारण अक्तूबर व नवंबर में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में धुंध पैदा होगी, जिससे सांस लेना तक दूभर हो जाएगा। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण पहले ही खुले में पराली जलाने पर रोक लगा चुका है और इसके लिए भारी जुर्माने का प्रावधान है। हालांकि, पराली जलाने के मूल कारणों पर अब भी ध्यान दिया जाना बाकी है।
पहला, हरित क्रांति के दौरान पंजाब व हरियाणा के किसानों ने अपनी पारंपरिक फसलों (मक्का, बाजरा, दालें और तिलहन) को छोड़कर गेहूं-धान की फसल चक्र को अपनाया। इससे देश की खाद्य सुरक्षा तो सुनिश्चित हुई, पर बाद में इसके दुष्परिणाम भी सामने आए। धान के अधिक उत्पादन से पराली का भी उत्पादन बढ़ा।
दूसरा, पंजाब और हरियाणा में मानसून की शुरुआत से पहले धान की रोपाई होती थी। चूंकि धान में पानी की खपत ज्यादा होती है, इसलिए किसान बड़े पैमाने पर भूजल दोहन करके पानी की आवश्यकता पूरी करते थे। नतीजतन भूजल के गिरते स्तर को लेकर चिंता पैदा हुई। इसीलिए, पंजाब उपमृदा जल संरक्षण अधिनियम और हरियाणा उपमृदा जल संरक्षण अधिनियम (अब भूजल अधिनियम) को मार्च, 2009 में अधिसूचित किया गया।
इन कानूनों ने 10 जून से पहले धान की बुआई पर रोक लगा दी, जिससे इसकी कटाई का समय करीब एक महीने बढ़ गया। फसल में देरी के कारण अगली फसल बोने के लिए बहुत कम समय बचता है, ऐसे में किसानों ने पराली को जलाने का विकल्प चुना। उल्लेखनीय है कि 2010 के बाद से धान की पराली जलाने में करीब 21 फीसदी की वृद्धि हुई है, जिससे सर्दियों की शुरुआत में दिल्ली-एनसीआर और उसके आसपास के क्षेत्रों में वायु प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है।
तीसरा, लंबी अवधि वाली धान की किस्में भी किसानों के पराली जलाने का एक प्रमुख कारण है। अधिक उपज पाने की उम्मीद में किसान मुख्यतः लंबी अवधि (130 दिन या उससे अधिक दिन) वाली किस्मों का चयन करते हैं, जिससे अगली फसल बोने के लिए बहुत कम समय बचता है। फलस्वरूप खुले में पराली जलाने की घटनाएं बढ़ती हैं।
चौथा, न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और अनाज मंडियों जैसी सरकारी योजनाओं का भी पराली जलाने पर प्रभाव पड़ता है। पंजाब में केवल धान, गेहूं, सूरजमुखी और कपास के लिए एमएसपी लागू है, इसलिए अन्य फसलों की तुलना में किसान इन्हीं फसलों की बुआई करते हैं। चूंकि धान की पराली में सिलिका का स्तर उच्च होता है, जो जानवरों के लिए हानिकारक है, इसलिए इसे चारे के रूप में नहीं बेचा जा सकता है। इसलिए भी किसान इसे जला देते हैं।
ऐसे में, नीति निर्माता जहां तक हो सके, इन मूल कारणों पर काबू पाने के लिए रणनीतिक मसौदा तैयार कर सकते हैं। जैसे, पराली को खुले में जलाने के बजाय बायो-पेलेट्स में परिवर्तित किया जा सकता है, जिन्हें सीधे ताप विद्युत संयंत्रों में नियमित रूप से कोयले के साथ जलाया जा सकता है। एनटीपीसी समूह ने 10 फीसदी बायो-पेलेट्स के मिश्रण से बिजली उत्पादन का सफल प्रदर्शन किया है। अब केंद्र सरकार देश भर में इसे लागू करना चाहती है। इसके अलावा, केंद्र सरकार किसानों को जागरूक करने के लिए अभियान चला रही है कि यदि वे पराली जलाने के बजाय उन्हें जैव-ऊर्जा निर्माताओं को बेचें, तो न केवल उन्हें अतिरिक्त कमाई हो सकती है, बल्कि वे प्रदूषण को रोकने में भी योगदान कर सकते हैं।
हमारा भविष्य उज्ज्वल है, हमें बस सही रणनीति अपनाने की आवश्यकता है। चूंकि, बायो-पेलेट्स मध्य अवधि तक 20 फीसदी कोयले की जगह ले सकते हैं, इसलिए हम इसके सह-दहन से न केवल वायु प्रदूषण पर अंकुश लगा सकते हैं, बल्कि कुछ हद तक कोयले पर हमारी निर्भरता भी कम होगी, जिससे हम एक ऊर्जा सुरक्षित राष्ट्र बन सकते हैं।