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राजनीति से दूर ही रहें तो अच्छा

तवलीन सिंह Updated Sat, 13 Oct 2012 09:22 PM IST
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stay out of politics is so good

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देश के दामाद साहब ने, दोस्तो व्यवसाय के तौर पर कोई ऐसी चीज नहीं की, जो राजनीति से जुड़े लोग अकसर नहीं किया करते हैं। श्री रॉबर्ट वाड्रा ने आदरणीय सोनिया जी की राजनीतिक ताकत के बलबूते थोड़ा-सा बिजनेस करने की कोशिश ही तो की। ऐसा तो सब करते हैं। एक राजनीतिक पंडित होने के नाते मेरी मुलाकात ऐसे कई लोगों से है, जो अमीर हुए हैं उनके किसी रिश्तेदार के राजनीति में आने के बाद।
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राजनेताओं के रिश्तेदारों के अचानक अमीर हो जाने का यह चमत्कार तब से शुरू हुआ है, जब से चुनाव आयोग ने आचार संहिता के नियम सख्त किए इस उम्मीद से कि नियमों के तहत अगर जनता के प्रतिनिधियों को अपनी निजी संपत्ति की घोषणा करनी पड़े, भ्रष्टाचार के कुछ दरवाजे बंद हो जाएंगे। लेकिन अपने भारत महान में हुआ यह कि कुछ खिड़कियां बंद हुई, तो नए दरवाजे खुल गए। आपने शायद देखा होगा चुनावों के समय, कि घोषित निजी संपत्ति के मुताबिक गरीब होते गए नेता, लेकिन बीवी और बच्चे अमीर होते गए। सुबूत ढूंढने की जरूरत ही नहीं है, क्योंकि राजनेताओं के परिजन इतने शान से रहने लगते हैं, जैसे इस देश के करोड़पति ही रह सकते हैं। आलीशान बंगले अचानक बन जाते हैं, विदेशी गाड़ियों में आना-जाना होता है और बीवियों के गहने ऐसे चमकने लगते हैं कि देखनेवाले हैरान रह जाते हैं।   


तो श्री रॉबर्ट वाड्रा ने पिछले कुछ वर्षों में अगर कोई 300 करोड़ रुपये कमा लिए हैं हरियाणा की कांग्रेस सरकार और डीएलएफ कंपनी की मेहरबानी से तो क्या हुआ? इतना हंगामा क्यों बरपा कि भारत सरकार के मंत्रियों की पूरी फौज सामने आई उनकी तरफ से सफाइयां पेश करने? क्योंकि आम राजनीतिकों की बात और है और नेहरू-गांधी परिवार की बात और। कहने को तो हमारा देश लोकतांत्रिक है, लेकिन वास्तव में अगर देखा जाए तो हमारी राजनीतिक प्रणाली ऐसी रही है कि एक परिवार का राज रहा है 1947 से लेकर आज तक। बीच में कुछ 10 वर्षों के लिए औरों ने राज किया है, लेकिन वह भी अकसर नेहरू-गांधी के परिवार की मरजी से। भारत के लंबे इतिहास में शायद ही कोई परिवार है, जिसकी राजनीतिक शक्ति इतनी हुई होगी।

इसलिए सोनिया गांधी बिना प्रधानमंत्री बनकर भी देश की सबसे बड़ी नेता हैं। देश की जनता ने इस यथार्थ को बेझिझक स्वीकार किया है। रही बात उनके दामाद की, तो उनको भी स्वीकार किया इतना कि चुनाव के समय जनाब मोटरसाइकिल पर बैठकर प्रचार करते हैं रायबरेली और अमेठी की गलियों में। गेंदे के फूलों की मालाएं होती हैं उनके गले में और जहां जाते हैं, लोग दामाद साहब का स्वागत करते हैं इतना कि हाल में हुए उत्तर प्रदेश के चुनाव के दौरान उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि समय आने पर वह भी आना चाहते हैं राजनीति में। अपनी बात उन्होंने इन शब्दों कही थी, 'अभी समय है राहुल जी का फिर प्रियंका का आ सकता है और मेरा भी। जनता की सेवा करना इस परिवार की परंपरा है।' अब जनता की सेवा करते-करते अगर थोड़ी सी उन्होंने अपनी सेवा भी कर डाली है, तो कौन सी बड़ी बात हुई?

सोनिया जी की तरफ से सिर्फ इतनी गलती हो गई कि अरविंद केजरीवाल के आरोपों का जवाब देने के लिए वरिष्ठ मंत्रियों को भेजा गया, जिससे तमाशा हो गया ( खबरिया चैनलों के कारण) और तमाशबीन बढ़ते गए। वाड्रा साहब के लिए कुछ हमदर्दी भी दिखी तब तक जब तक कि उन्होंने फेसबुक द्वारा देश का मजाक उड़ाया और इस देश की जनता का भी। लिख दिया गुस्से में (अंगरेजी में) कि भारत बेकार देश है और यहां के लोग भी बेकार हैं। जब लोगों ने एेतराज किया उनके इस बयान पर, तो उन्होंने अपना फेसबुक का खाता यह कहकर बंद कर दिया कि ऐसा लगता है कि इस देश में मजाक करना भी गुनाह है।   

ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए उन लोगों को, जिनकी करीबी रिश्तेदारी हो उस परिवार से, जिसका राज दशकों से चल रहा है। क्योंकि अगर देश बेकार है और देश के लोग भी, तो कुसूर किसका है? क्या दोष उनका नहीं बनता जिन्होंने राज किया है दशकों से? ऐसा कहकर वाड्रा साहब ने एक बात जो पूरी तरह साबित कर दी है, वह यह कि राजनीति में उनको कभी नहीं आना चाहिए। बिजनेस करने से माना कि वह इन दिनों थोड़े से बदनाम हुए हैं, लेकिन बिजनेस में ही रहेंगे, तो बेहतर होगा, क्योंकि जो व्यक्ति आम आदमी पर थूकता है, वह कभी आम आदमी के वोट नहीं हासिल कर पाएगा।

दामाद साहब के व्यावसायिक तरीकों ने तो नुकसान किया ही है नेहरू-गांधी परिवार की छवि को, प जितना नुकसान रॉबर्ट जी के उस फेसबुक वाले बयान ने किया है, वह उससे कहीं ज्यादा है। दामाद साहब, मेहरबानी होगी इस गरीब देश की गरीब जनता पर, अगर आप राजनीति से उतनी दूर रहें जितना संभव हो।

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