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संस्कृति: ओंकारेश्वर में आचार्य शंकर और धरती पर 12 साल के बालक की पहली प्रतिमा!

Vijay Mohan Tiwari विजय मोहन तिवारी
Updated Fri, 15 Sep 2023 08:47 AM IST
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सार
कल-कल बहती नर्मदा ने समय के साथ देखा कि कैसे भाषाएं जन्मीं। बोलियां बनीं। घाटी में गांव और फिर नगरों ने आकार लिया। नर्मदा एक समृद्ध सभ्यता के विकास की साक्षी है। एक समय सत्य की खोज में दूर-दूर के साधकों ने शिव के स्वेद से जन्मी इस प्राचीन जलधारा की परिक्रमा आरंभ की। अमरकंटक की पर्वत शृंखला से बहुत शांत भाव से अवतरित नर्मदा की अनवरत यात्रा अरब सागर में शुक्लतीर्थ में विराम लेती है।
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statue of child form of Acharya Shankar is being installed in Omkareshwar
12 वर्षीय बाल आचार्य शंकर की मूर्ति हो रही स्थापित - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

युगों से प्रवाहित नर्मदा की स्मृतियां अनंत हैं। नर्मदा की हरी-भरी गोद में पनपी सभ्यता में मनुष्य ने तरह-तरह की लीलाएं कीं। तीस हजार साल पुराने शैलचित्र मानव की कल्पना शक्ति के उड़ान भरने के प्रमाण हैं। यह तब की बात है, जब न भाषा थी, न ज्ञान था। केवल प्रकृति थी, जो नर्मदा घाटी में समृद्ध थी। केवल कल्पना थी, जो चट्टानी चित्रों में अपनी राम कहानी रेखाओं में उकेरती थी।



कल-कल बहती नर्मदा ने समय के साथ देखा कि कैसे भाषाएं जन्मीं। बोलियां बनीं। घाटी में गांव और फिर नगरों ने आकार लिया। नर्मदा एक समृद्ध सभ्यता के विकास की साक्षी है। एक समय सत्य की खोज में दूर-दूर के साधकों ने शिव के स्वेद से जन्मी इस प्राचीन जलधारा की परिक्रमा आरंभ की। अमरकंटक की पर्वत शृंखला से बहुत शांत भाव से अवतरित नर्मदा की अनवरत यात्रा अरब सागर में शुक्लतीर्थ में विराम लेती है।


नर्मदा की स्मृति में दूर दक्षिण के एक संन्यासी की स्पष्ट छवि अंकित है। केरल के कालडि से आए इस तेजस्वी किशोर ने एक दिन अमरकंटक में कदम रखे। चारों ओर दूर तक दृष्टि डाली। आठ वर्ष की आयु के यह आचार्य शंकर थे। चकित भाव से शंकर ने देखा कि छोटे से जल कुंड में उतरी एक तुच्छ धारा थोड़ा आगे भेड़ाघाट में गरजती हुई मैदानों में पूरे वेग से भाग रही है। नर्मदा के इस सौंदर्य को शंकर ने अपने जागृत नेत्रों में उतारा। बरबस ही उनके चरण नदी के प्रवाह के साथ चल पड़े। वह किसी खोज में थे, जो यहीं पूरी होनी थी। शंकर की संक्षिप्त जीवन यात्रा के इस सबसे महत्वपूर्ण अंश में नर्मदा साक्षी भी थी, सहयोगी भी।

नर्मदा के सहारे चलते हुए शंकर एक दिन ओंकारेश्वर के पर्वत पर जा पहुंचे। पर्वत के एक शिखर पर वह खड़े थे और सामने दूसरे पर्वत को निहार रहे थे। दोनों पर्वतों के बीच से नर्मदा शंकर का अभिनंदन करते हुए आगे प्रवाहित हो गईं। शंकर पर्वत से उतरकर नीचे आए। दूसरे तट पर एक गुफा में कोई उनकी ही प्रतीक्षा कर रहा था। वह थे गुरु गोविंदपाद। नर्मदा के इसी सुरम्य तट पर भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग की शीतल छाया में शंकर को अपने गुरु का परम आश्रय प्राप्त हुआ। उन्हें आत्मिक तृप्ति का गहरा अनुभव हुआ। नर्मदा के प्रति अनुग्रह उन्होंने अपनी अमर स्तुति में व्यक्त किया-त्वदीय पाद पंकजम्, नमामि देवी नर्मदे...।

शंकर ने अपने छोटे से जीवनकाल का एक अंश अपने गुरु के सान्निध्य में यहीं बिताया, फिर अपनी शेष जीवन यात्रा के लिए ओंकारेश्वर से प्रस्थान किया। मुक्त कंठ से स्तुति गाई और तेज कदमों से आगे बढ़ गए। एक नदी के सम्मान में शंकर रचित इस स्तुति को वेद मंत्र जैसी महिमा प्राप्त हो गई।

शंकर के समय तक भारत एक महान सांस्कृतिक विरासत संचित कर चुका था और सदियों के दोष भी किसी गंभीर रोग की तरह भारत की चेतना में जा समाए थे। अपने साधनहीन समय में शंकर को राष्ट्र की सोई हुई शक्ति को जागृत भी करना था और संगठित भी। नर्मदा के जल की हर बूंद जब पवित्र ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर के तटों को छूकर गुजरती है, तब आचार्य शंकर की विराट ऊर्जा का अनुभव आज भी करती है। नर्मदा ने उनकी उज्ज्वल स्मृतियों पर कभी समय की धूल नहीं चढ़ने दी। उनकी अमर स्तुति के जीवंत शब्द नर्मदा तट पर सदा गुंजायमान रहे। ऐसा ही एक प्रसंग फिर आया है। एक बार फिर मध्य प्रदेश में ओंकारेश्वर के पर्वतों पर हलचल है। सदियों पहले जो पहाड़ी शिखर, पथरीली ढलानें और चट्टानी तट शंकर की चरण रज से पवित्र हुए थे, वे एक बार फिर जीवंत हो उठे हैं।

ओंकारेश्वर में एकात्म धाम के रूप में जैसे मध्य प्रदेश की यह पूरी भूमि कृतज्ञ है और अभिव्यक्ति के लिए आतुर है। भारत के समृद्ध आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जगत के लिए इससे बड़ा शुभ समाचार क्या होगा? एकात्म धाम की अनुपम कृति का पहला चरण 108 फुट ऊंची धातुई रचना के रूप में धरती के एक महानतम दार्शनिक की अमर स्मृति को समर्पित हो रहा है। यह 12 साल की आयु के किसी बालक की धरती पर पहली इतनी विशाल प्रतिमा है! इतिहास के अंधेरों से स्वर्णिम अतीत जैसे स्वयं प्रकट हो रहा है। हम एक नया इतिहास बनता हुआ देख रहे हैं।

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