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जीवन धारा: हमारे आसपास ही है अपनापन, जीवन बदलने के लिए दयालुता और देखभाल का केवल एक कार्य ही काफी

Tue, 19 Nov 2024 05:42 AM IST
दीपक कुमार शर्मा कन्सतान्तिन पाउस्तोव्स्की
कन्सतान्तिन पाउस्तोव्स्की Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Tue, 19 Nov 2024 05:42 AM IST
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सार
ट्रेन में प्रोफेसर के जल्दी जगने का कारण पूछा, तो उन्होंने कहा-रास्ते में जो गांव है, उसको बचपन से देखता आ रहा हूं। एक झोपड़ी से पूरा गांव बसने की इसकी कहानी अद्भुत है। ऐसा लगता है, जैसे यहां कोई अपना रहता है।
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Soviet Writer Konstantin Paustovsky changing human life merely one work of kindness and care enough
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : एएनआई/अमर उजाला

विस्तार

मैं कूर्स्की रेलवे स्टेशन पहुंचा, जहां से ठीक नौ बजे सिंफिरापोल्स्की एक्सप्रेस ट्रेन को छूटना था। टीटी ने मेरा टिकट देखा और मैं डिब्बे में घुस गया। वहां पहले से ही एक अधेड़ व्यक्ति, एक लड़की और लड़का बैठा हुआ था। जैसा कि यात्रा के दौरान हमेशा होता है, हम जल्दी ही एक-दूसरे से घुल-मिल गए। अधेड़ उम्र का व्यक्ति जीव-विज्ञान का प्रोफेसर था। ट्रेन अबाध गति से चली जा रही थी और सुबह हो गई।



मैंने प्रोफेसर से पूछा-आप सुबह इतनी जल्दी क्यों उठ गए? उन्होंने कहा, ‘एक जगह छूट जाने का मुझे डर रहता है। रात में भी जब कभी ट्रेन इस जगह के पास से गुजरती है, तो हमेशा मेरी नींद खुल जाती है और मैं खिड़की से बाहर देखने लगता हूं।’ मैंने पूछा, ‘यहां जरूर कभी आपका अपना घर रहा होगा?’ वह बोले-नहीं, यह जगह बिल्कुल अनजान है। मैं वहां कभी नहीं गया। यह एक लंबी कहानी है, जब मैं छोटा बच्चा था। मैं अपने पिता के साथ मास्को जा रहा था और सारा दिन खिड़की के पास खड़ा रहा था। मैंने सूखे मैदान के बीच एक अकेली झोपड़ी देखी थी और सोचने लगा था-इसमें कौन रहता है? जाड़े में इसमें रहना कितना भयावह होता होगा? हर बार ट्रेन उसके पास से तेजी से गुजर जाती थी, लेकिन मैं हमेशा वहां कुछ न कुछ परिवर्तन देखता था।


एक दिन मैंने झोपड़ी के पास एक औरत को देखा, वह अंगीठी जला रही थी और पास ही उसका बच्चा लेटा था। बाद में इस झोपड़ी के इर्द-गिर्द दूसरी झोपड़ियां आ गईं और धीरे-धीरे इस अकेली टूटी-फूटी झोपड़ी की तरह एक छोटा गांव विकसित हो गया। बच्चे दिखाई पड़ने लगे। जब क्रांति शुरू हुई, तो कई वर्षों तक मैंने उस गांव को नहीं देखा। बहुत दिनों बाद मैंने देखा, तो गांव के चारों ओर सूरजमुखी के खेत थे। बाद में हर बार मैंने यहां नई-नई चीजें देखीं। ताजा अंगूर के बाग। नई-नई खूबसूरत झोपड़ियां। हर झोपड़ी के पास लाल और पीले फूल। एक दिन मैंने स्कूली बच्चों को देखा। वे बस्ते लिए भागे जा रहे थे। फिर बिजली घर दिखाई पड़ा। इस तरह इस गांव का जन्म हुआ।

मैं बूढ़ा हो रहा था और मेरे इर्द-गिर्द जिंदगी जवान। शीघ्र ही मेरा गांव आने वाला है। आपकी झोपड़ी कहां है? मैंने प्रोफेसर से जोर से पूछा। अभी आती है। वह रही! उस झोपड़ी के आसपास बहुत से पेड़ व फूल थे। मैंने ओवरकोट पहने और हल्का स्कार्फ बांधे एक औरत को झोपड़ी के पास खड़े देखा। तालाब, देखिए! प्रोफेसर ने मुझसे जोर से कहा। यह पहले नहीं था। सूरज की रोशनी में एक बड़ा, गहरा तालाब चमक रहा था। बच्चे उसमें नहा रहे थे। यह सब कुछ जल्दी ही पीछे छूट गया। सच, प्रोफेसर ने कहा-मैं बूढ़ा हो रहा हूं और मेरे इर्द-गिर्द जिंदगी जवान हो रही है। लेकिन फिर भी मैं इस सहकारी फार्म में अवश्य जाऊंगा। मैं अपनी इस झोपड़ी में जाऊंगा और इस महिला से कहूंगा कि मैं उसे कई वर्षों से जानता हूं। मैं उसकी मां को भी जानता हूं और उसके गांव के पूरे इतिहास को भी। मेरा उस गांव से एक अपनेपन का रिश्ता है, इतना कहते हुए वह चुप हो गए।

सूत्र: दयालु बनें
कभी भी इतने व्यस्त मत रहो कि दूसरों के बारे में न सोच सको। कभी-कभी किसी व्यक्ति का जीवन बदलने के लिए दयालुता और देखभाल का केवल एक कार्य ही काफी होता है। सफल होने का मतलब है मददगार, देखभाल करने वाला और रचनात्मक होना, हर चीज और हर व्यक्ति को थोड़ा बेहतर बनाना, जिससे आप संपर्क करते हैं।

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