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विश्लेषण: केंद्रीय राजनीति और नई सरकार के गठन में प्रभावहीन रहने वाली है दक्षिण की सियासत
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अमर उजाला
विस्तार
यदि वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव और दक्षिण भारतीय राजनीति का गहन विश्लेषण किया जाए, तो दो तथ्य सामने आते हैं। पहला, दक्षिण भारत के छह राज्यों में लोकसभा चुनाव के नतीजे केंद्र में नई सरकार के गठन के लिए प्रमुख कारक नहीं बनेंगे। दूसरा, इन छह राज्यों में लोकसभा चुनाव का नतीजा मिला-जुला और विभाजित रहेगा।
वर्ष 2019 से दक्षिण भारत के इन छह राज्यों में कई नए चेहरे उभरकर आए हैं। आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में आध्यात्मिक एवं सिनेमा जगत का प्रभाव राजनीति पर रहा है। आंध्र प्रदेश के पवन कल्याण और तमिलनाडु के जोसेफ विजय राजनीति के नए चेहरे हैं, जो सिनेमा की पृष्ठभूमि से आए हैं। दक्षिणी राज्यों की राजनीति बिल्कुल स्पष्ट है। इन छह राज्यों में लोकसभा चुनाव का नतीजा बंटा हुआ हो सकता है। बेशक राज्य स्तरीय दलों का कहना है कि दक्षिण की राजनीति में क्षेत्रीय क्षत्रप हावी हैं, लेकिन कांग्रेस या भाजपा का पूरी तरह सूपड़ा साफ नहीं होगा। तमिलनाडु एवं कर्नाटक को छोड़ दें तो, दक्षिण भारत के छह राज्यों में से बाकी चार राज्य एक-दूसरे से पूरी तरह अलग हैं। आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना, दोनों तेलुगू भाषी राज्य हैं, लेकिन तेलंगाना काफी आक्रामक है। पुदुचेरी और केरल की राजनीति भी अपनी तरह से चरम पर है।
आइए, सबसे पहले बात करते हैं तमिलनाडु की। इस राज्य में 2024 के लोकसभा चुनाव में एक बड़ा आश्चर्य होने वाला है। द्रविड़ राजनीति तेजी से खत्म हो रही है और यह तमिलनाडु के 2024 के नतीजों में दिख सकता है। तमिलनाडु के राजनीतिक इतिहास में पहली बार तीन नए चेहरे 2026 में होने वाले तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के विजेता का भाग्य तय करेंगे। द्रमुक और अन्नाद्रमुक के अलावा ये तीन नए चेहरे कौन हैं? भाजपा नेता के अन्नामलाई, नाम तमिलर काची के नेता और पूर्व अभिनेता सीमन और तीसरे हैं सिनेमा जगत के मिनी सुपरस्टार जोसेफ विजय। ये तीनों चेहरे पहली या दूसरी बार के मतदाताओं को रिझाएंगे। ये तीनों द्रविड़ पार्टियों से 25 से 30 फीसदी वोट छीन सकते हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में ये अगर इसमें सफल नहीं भी रहे, तो 2026 के विधानसभा चुनाव में तो निश्चित ही ये ऐसा करने वाले हैं।
तमिलनाडु में करुणानिधि और जयललिता जैसी कद्दावर शख्सियतों की कमी महसूस की जा रही है। यह स्थान कौन भरेगा? क्या नरेंद्र मोदी या भाजपा के राष्ट्रवादी दृष्टिकोण वाला कोई व्यक्ति या राहुल गांधी के समर्थन से मल्लिकार्जुन खरगे। यह ठीक है कि राजग से अन्नाद्रमुक के बाहर निकलने के बाद अन्नाद्रमुक द्वारा कांग्रेस को गठबंधन का प्रस्ताव दिया जा रहा है, लेकिन गठबंधन में पार्टी बदलने का इतना अहम फैसला संभव नहीं है। इसके लिए दिसंबर के पहले हफ्ते में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों का इंतजार करना होगा। लेकिन दिसंबर, 2023 से फरवरी, 2024 के बीच मात्र तीन महीने का समय रहता है, इसलिए गठबंधन में छेड़छाड़ या बदलाव नहीं किया जा सकता है।
आंध्र प्रदेश का राजनीतिक संघर्ष भी दिलचस्प है, जहां जगन रेड्डी अपनी पकड़ बनाए हुए हैं। अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी चंद्रबाबू नायडू को गिरफ्तार करने का उनका राजनीतिक निर्णय और समय इतना सही था कि जगन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस एक शक्तिशाली पार्टी के रूप में उभरी। तेलुगू देशम पार्टी के नेता नायडू ने मोदी से माफी मांगने के बजाय मोदी और भाजपा के समक्ष आत्म समर्पण कर दिया। आंध्र प्रदेश की राजनीति का भविष्य दो चेहरों के बीच बंटा हुआ है-एक हैं नरेंद्र मोदी और दूसरे हैं चंद्रबाबू नायडू। जाहिर है, जगन रेड्डी राज्य की राजनीति के केंद्र में हैं। कांग्रेस वहां कोई ताकत नहीं है, क्योंकि उसने एक दशक पहले राज्य को दो भागों में बांट दिया था। तेलंगाना में कांग्रेस की पकड़ है, लेकिन उसकी जगह को हड़पने की कोशिश में भाजपा लगी हुई है। बीआरएस के कद्दावर नेता को परास्त करने के लिए भाजपा के शीर्ष नेता लगातार तेलंगाना का दौरा कर रहे हैं।
केरल में माकपा एक प्रमुख ताकत है। लेकिन मुख्यमंत्री विजयन अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस से कैसे निपटेंगे? माकपा और वाम मोर्चा केरल में कांग्रेस को खत्म करना चाहते हैं। राहुल गांधी केरल के वायनाड से सांसद हैं। माकपा के दिग्गज नेता अच्युतानंदन ने कहा कि राहुल गांधी को माकपा 2024 के चुनाव में हरा देगी। अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि कट्टर कांग्रेसी नेता माकपा की ओर रुख कर रहे हैं। इन सबके बीच क्या भाजपा के लिए 2024 में कोई जगह बनेगी ? इस सवाल का जवाब संदिग्ध है।
कर्नाटक कांग्रेस के लिए अहम राज्य है, लेकिन क्या मुख्यमंत्री 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों को प्रभावित कर पाएंगे। जोरदार तरीके से इसका उत्तर ‘नहीं’ है। पार्टी के भीतर ही मुख्यमंत्री के कट्टर दुश्मन मौजूद हैं। राज्य कांग्रेस के चार गुट हैं, जो लोकसभा चुनाव से पहले सिद्धारमैया को अपदस्थ करना चाहते हैं। कर्नाटक में खरगे और गांधी परिवार की परीक्षा होने वाली है। जनता दल (एस) ने बेहद चतुराई से लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा से गठबंधन कर लिया है। जनता दल (एस) की ओर से कांग्रेस सरकार गिराने की कोशिशें हो रही हैं। चाहे जिस भी तरीके से आप देखें, कर्नाटक की 28 लोकसभा सीटें नई दिल्ली में सरकार गठन के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। कांग्रेस से मतदाताओं की निराशा के कारण भाजपा को अधिक फायदा मिलना तय है।
संक्षेप में कहें तो, या तो राहुल गांधी या नरेंद्र मोदी दक्षिण भारत की बंटी हुई राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन एक बात तय है कि अगले एक दशक में भाजपा दक्षिण भारत के चार प्रमुख राज्यों-तमिलनाडु, तेलंगाना, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में अपनी मजबूत पकड़ बनाने का दावा कर सकती है। पहली बार के मतदाता, जो 2002 में पैदा होने के बाद से नरेंद्र मोदी युग में जी रहे हैं, उन्होंने डिजिटल क्रांति देखी है। वर्ष 2024 का फैसला डिजिटल युवाओं के वोट बैंक, खासकर महिलाओं के वोट बैंक द्वारा होने वाला है।