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दिलो-दिमाग के गीत

Sat, 05 Jul 2014 11:14 PM IST
Updated Sat, 05 Jul 2014 11:14 PM IST
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songs of mind and heart

यश मालवीय के गीतों से गुजरते हुए एक किस्म के अपनत्व का बोध होता है, क्योंकि इनके शब्द अपनों के बीच के होते हैं। एक बानगी देखिए-

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बहुत नीली, बहुत गहरी, बहुत गाढ़ी
नींद कागज की तरह सौ बार फाड़ी।

ये पंक्तियां उनके नए गीत संग्रह `नींद कागज की तरह' से हैं। गीत संग्रह की खासियत है उसकी कविताओं के विषयों का विस्तार। संग्रह में पाठक को दिल और दिमाग, दोनों के संवाद मिलेंगे। उदाहरण के लिए इस संग्रह का गीत `उतरती सर्दियां हैं' ही लें।

यहां दिल की गहराइयों में बसी प्रिय की स्मृतियां सर्दी के बहाने उभर आती हैं, तो दूसरी ओर `कंप्यूटर पासवर्ड मांग रहा है' जैसा गीत भी है, जो आज के दौर की विडंबना पर विचार करने को विवश करता है। संग्रह के पैंसठ गीतों में हरेक गीत आज के संदर्भ में जीवन जी रहा है। कुछ गीत दिल के तार छेड़ जाते हैं, तो कुछ दिमाग को झकझोर जाते हैं। गीतों में एक ताजगी का अहसास है। 
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लिखने की जरूरत पर

songs of mind and heart

मेरे जज्बात को स्याही का रंग मिलना जरूरी है
मुझे रहना हो गर जिंदा, तो फिर लिखना जरूरी है
सोनरूपा विशाल अपने गजल संग्रह `लिखना जरूरी है' में कुछ अपनी बात कहती हैं तो कुछ दूसरे की सुनती हैं।

खुद कहती हैं, ‘इस संग्रह का शीर्षक कलमकार के अंदर की उस हसरत पर बात करता है, जिसको उसे कह देना जरूरी लगता है।’ संग्रह में शेर-ओ-शायरी के प्रशंसकों के लिए विविध विषयों पर गजलें मिलेंगी। लेखिका ने संग्रह अपने पिता को समर्पित किया है-’पिता मेरे मुकम्मल थे, हर इक अंदाज में बेशक। तो थोड़ा इल्म उनका भी मुझे मिलना जरूरी है। ‘

कुल-मिलाकर इस संग्रह से गुजरते हुए एक किस्म के नएपन का अहसास होता है, क्योंकि सोनरूपा के पास कई नए बिंब मिलते हैं, जैसे कि उनके संग्रह की आखिरी नज्म `कालीन’ की पंक्तियां हैं-`घर भर के मेहमानों को नींद की गोद देता हुआ कालीन।’

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