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इदन्न मम: कभी-कभी थोड़ा पलायन बहुत स्वस्थ होता है... क्षणों के इस अनंत प्रवाह में अपनी पूजानत अंजलि डाल दो

Wed, 20 Nov 2024 06:53 AM IST
दीपक कुमार शर्मा धर्मवीर भारती
धर्मवीर भारती Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Wed, 20 Nov 2024 06:53 AM IST
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सार
मन के चंदन कपाट खोल दो और जो भी लहराती झकोर आ रही है उसे आने दो और अपने पूजा गीत की वह पंक्ति मत भूलो... ‘अर्पित होने के अतिरिक्त और राह नहीं।’
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Sometimes little escape is healthy... offer everything to infinite flow of moments
कभी-कभी थोड़ा पलायन बहुत स्वस्थ होता है. - फोटो : अमर उजाला / एएनआई

विस्तार

जब आप जिंदगी के भीड़-भाड़ वाले राजमार्ग पर थके-हारे, भीड़ की लहरों में धक्के खाते हुए, विवश आगे धकेले जा रहे हों और आपको अकस्मात एक छोटी पगडंडी रास्ते से फूटती दिखाई दे, जो परिचित हरीतिमा को गुदगुदाती हुई किसी अपरिचित ठिकाने की ओर जा रही हो, तो मैं आपसे आग्रह करता हूं कि बिना कुछ भी सोचे-समझे, जल्दी से तमाम जरूरी से जरूरी काम छोड़कर उस पगडंडी पर मुड़ जाइए। कभी-कभी थोड़ा पलायन बहुत स्वस्थ होता है।



इसका एहसास मुझे तब हुआ, जब मैंने अपने को भटकते-भटकते उस चर्च के अहाते में पाया, जब सूरज डूब रहा था। और अकस्मात मीनार पर घंटे बजने लगे और हम दोनों मरियम की मूर्ति के सामने खड़े थे। बड़ी शीतलता थी। नीचे नम धरती पर एक खास तरह की घास जमाई गई थी हरी, छोटी-छोटी हथेलियों जैसी, जमीन को छाए हुए, और तुम उदास थीं और मैं चुप और अंदर से भरा-भरा। और बिना कुछ बोले जैसे मैं तुम्हारे मन को टटोल रहा था। सांत्वना दे रहा था, और बिना कुछ बोले तुम अपरिचित ममता से मुझे कण-कण, भरे दे रही थीं। और न मैंने तुम्हारी ओर देखा न तुमने मेरी ओर... हम दोनों मरियम की मूर्ति की ओर देख रहे थे और लगता था, जैसे-वहां हम मिल रहे हों, एक-दूसरे में घुल रहे हों और डूबते सूरज की हल्की सिंदूरी छांह में मैं जैसे नहाकर ताजा हो उठा था...सच यह है कि कई बार यह कंबख्त जिंदगी इतनी कृत्रिम और अस्वाभाविक लगती है कि मन घुटने लगता है। धीरे-धीरे वे क्षण बिल्कुल दुर्लभ हो जाते हैं, जब हम जीवन जीते हैं, गहराई में जीते हैं। अब मैंने सोचा है कि सार्वजनिक हलचल भरी जिंदगी को जरा श्रद्धापूर्वक प्रणाम करूंगा। और अपनी जिंदगी फिर पहले जैसी बनाऊंगा...फूल, प्यार, और सुख-दुख के गहरे हिलकोरों वाली। खुशनुमा, उज्ज्वल, पवित्र और रंगारंग। पावसी की शाम को बादलों में हजारों रंग की फुलझड़ियां खिल आती हैं न...बिल्कुल वैसी ही।


अकारण क्यों विश्लेषण किया जाए और क्यों तर्क-वितर्क किया जाए और क्यों उधेड़बुन की जाए और क्यों मन के चारों ओर रेखाएं खींची जाएं? मन के चंदन कपाट खोल दो और जो भी लहराती झकोर आ रही है, उसे आने दो और अपने पूजा गीत की वह पंक्ति मत भूलो... ‘अर्पित होने के अतिरिक्त और राह नहीं।’ क्षणों के इस अनंत प्रवाह में अपनी पूजानत अंजलि डाल दो और जो कुछ बहता हुआ चला आ रहा है, उससे हाथ मत खींचो, उसे दुलार से उठाकर कृतज्ञतापूर्वक माथे से लगा लो और फिर उसी बहाव में डाल दो, जिसने वह दिया था...इदन्न मम। और इन क्षणों की अथाह नीलिमा में सिर्फ डूब जाओ... जैसे कोई किसी प्रभाती के अलाप में डूब जाए गहरे, और गहरे... और उसमें से निकले, तो आंसू में घुला हुआ, अमृत में नहाया हुआ, जिसका हर स्पर्श ज्योति का स्पर्श हो और हर आलिंगन ऐसा परम, ऐसा एब्सोल्यूट जैसे संगीत का स्वर तारों में लिपटा सोया रहता है। क्षणों की अथाह नीलिमा। नीले रंग के साथ एक आसंग (एसोसिएशन) है न...कितना पुराना और बार-बार दोहराने वाला।

सूत्र: हमेशा महकते रहें
मैंने कभी मृत्यु के बारे में नहीं सोचा, पर कभी-कभी जरूर सोचता हूं कि जिए जाने वाले क्षणों की यह जो अंतर्ग्रथित शृंखला है, इसका कहीं न कहीं तो अंत होगा ही। और जब होगा, तब कुछ खास नहीं होगा... मैं तो, स्वर्ण पराग-सा उसी तरह महकता रहूंगा, और फिर सब शांत हो जाएगा।

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