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पाकिस्तान में कुछ नया-नया
मरिआना बाबर
Updated Thu, 15 Mar 2018 07:49 PM IST
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कृष्णा कोहली
पंद्रहवीं सदी की भक्तिरस की कवयित्री मीरा के कहरवा ताल में गाए एक भजन को 1980 के दशक की फिल्म सिलसिला में शामिल किया गया था, जिसे कवि हरिवंशराय बच्चन ने गीतबद्ध किया था। यह गीत इस महीने में तब कई जगह सुना गया, जब हिदुओं और मुस्लिमों ने होली मनाई ः रंग बरसे भीगी चुनर वाली रंग बरसे/ कीने मारी पिचकारी/ तोरी भीगी अंगिया/ ओ रंगरसिया...। दिलचस्प यह है कि यह गीत पाकिस्तान में खासा लोकप्रिय है और सिर्फ होली के मौके पर ही नहीं, बल्कि शादियों में इस गीत पर नृत्य होते हैं।
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मार्च के महीने में रंगों के त्योहार होली का जश्न सिंध के सुदूर क्षेत्रों, जहां हिंदू बहुतायत में हैं, से लेकर कराची, लाहौर और पेशावर तक पाकिस्तान के विभिन्न क्षेत्रों में मनाया गया। माशा अल्लाह भारत इतना बड़ा और धर्मनिरपेक्ष देश है कि वहां के दर्जनों सांस्कृतिक और धार्मिक उत्सवों को देखकर किसी का दम भर जाए। संपर्क बढ़ने, मीडिया की सक्रियता और व्यवसायीकरण तथा उदारता के चलते पाकिस्तानी अब भारतीय त्योहारों के बारे में अधिक से अधिक जान पा रहे हैं और फिर तनाव भरे इस दौर में हमें नाचने-गाने और उत्सव मानने का बहाना भी तो चाहिए।
यही वजह है कि सांसदों, राजनीतिकों के साथ ही आम लोगों ने भी जमकर रंगों के इस उत्सव में शिरकत की और आनंद उठाया। कराची के एक मुस्लिम लड़के वाहिद खान का यह किस्सा कई जगह दोहराया गया। होली के रंगों से सराबोर वाहिद जब एक सार्वजनिक परिवहन की बस से कहीं जा रहा था, तब एक सहयात्री ने उससे पूछा कि उसने खुद पर इतना रंग क्यों डाल रखा है, तो उसने कहा, भाई यदि रंग हिंदुओं और मुस्लिम बच्चों को करीब ला सकते हैं और वे मिलकर जश्न मना सकते हैं, तो आप बीच में मजहब को क्यों लाते हो? वाकई यह एक बड़ी बात है।
लेकिन सिंध स्थित थार के रेगिस्तान का वास्तविक रंग पाकिस्तानी संसद में तब नजर आया, जब एक पूर्व बाल वधु सिंध की 39 वर्षीय दलित हिंदू कृष्णा कुमारी कोहली ने बेनजीर भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के टिकट पर सीनेट का चुनाव जीत लिया। जैसा कि टेलीविजन कैमरों ने दिखाया, कोहली अपनी मां के साथ मौजूद थीं, दोनों ने चमकीला स्थानीय थारी परिधान पहन रखा था और उनके दोनों हाथों में कलाई से लेकर कोहनी तक सफेद रंग की चूड़ियां थीं। कोहली अपनी खुशी छिपा नहीं पा रही थीं। उन्होंने मीडिया से कहा, मैं बहुत गौरवान्वित महसूस कर रही हूं और अब मैं थारपारकर के अपने गांव से अपने समुदाय को आगे ले जाने की कोशिश करूंगी। उन्होंने कहा कि मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दिन मैं सीनेटर (सांसद) बन जाऊंगी। चार बच्चों की मां कोहली ने इसके साथ यह भी कहा, 'ऑनर किलिंग, बाल मजदूरी और बाल विवाह को रोकने के लिए ढेर सारे कानून हैं, जरूरत है इन पर अमल करने की और मैं इसका प्रयास करूंगी।' कोहली बाल वधु जरूर थीं, लेकिन उनके पति लाल चंद ने उन्हें निरंतर पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रेरित किया, जिससे उन्होंने समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर की डिग्री ली। लाल चंद कहते हैं, 'वह काफी समय से लोगों के अधिकारों के लिए, खासतौर से महिलाओं के अधिकार के लिए संघर्ष कर रही हैं। पर्दा नहीं मानने और लोगों के अधिकारों के लिए सड़कों पर प्रदर्शन करने के कारण अक्सर उनके रिश्तेदार उन्हें प्रताड़ित करते थे।' उनके साथ मौजूद कृष्णा कोहली ने मुस्कराते हुए कहा, 'लेकिन अब वही लोग मुझे फोन कर बधाई दे रहे हैं।'
पाकिस्तान के एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक द डॉन ने राजनीति में महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए पीपीपी की तारीफ की। खासकर इसलिए, क्योंकि इस पार्टी ने धर्म और जाति को दरकिनार कर महिलाओं को तवज्जो दी है। सरकार को भी इस बात का संज्ञान लेना चाहिए। अखबार ने लिखा, 'देश में मानव विकास सूचकांक की बदतर स्थिति से उबरने के लिए सभी राजनीतिक दलों को लैंगिक समावेश की राजनीति को बढ़ावा देना चाहिए। राजनीतिक दलों के घोषणा पत्रों में यह दर्ज होना चाहिए कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई जाएगी और सामान्य सीटों से अधिक से अधिक महिलाओं को नामांकित किया जाएगा। यह बात उल्लेखनीय है कि महिला राजनीतिज्ञ वायदों को पूरा करने में आगे रहती हैं, इसलिए उनका समर्थन करने से मानवाधिकार, शिक्षा, न्याय और आर्थिक विकास की स्थिति बेहतर होगी।'
पाकिस्तान के सिख समुदाय के लिए भी एक अच्छी खबर है। पंजाब (पाकिस्तानी) में होने वाली सिखों की हर शादी अब विशेष अधिनियम के तहत पंजीबद्ध होगी। ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी प्रांतीय सरकार ने सिख समुदाय को अपने पारिवारिक कानूनों और परंपराओं के संरक्षण का अधिकार दिया है। इसके तहत आनंद कारज रजिस्ट्रार का पद सृजित किया जाएगा। आनंद कारज रजिस्ट्रार को सिख दंपति को आनंद कारज सर्टिफिकेट जारी करने का अधिकार होगा। पंजाब सरकार के इस कदम से सिख समुदाय खुश है। सिख समुदाय का कहना है कि इससे उन्हें अपने पारिवारिक मामलों की रक्षा करने में मदद मिलेगी।
पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) के सांसद रमेश सिंह अरोरा का कहना है कि सिख समुदाय को पारिवारिक कानूनों के मामले में यहां तक कि भारत में भी पृथक पहचान नहीं मिल सकी है। ऐसा पहली बार हुआ है, जब पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में सिखों के पारिवारिक कानूनों को मान्यता दी गई है। उनका कहना है कि सिख विवाह को नियंत्रित करने के लिए कानून को परिभाषित करना जरूरी था। पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष सरदार तारा सिंह कहते हैं कि पाकिस्तान में सिख समुदाय के लिए अलग से कोई कानून नहीं था, लेकिन अब उनके पारिवारिक मामलों को सुलझाने के लिए समुचित कानून उपलब्ध होगा। उनके मुताबिक, इसके अभाव में सिख समुदाय को कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता था।